Shaurya Commandos: भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव की खबरें एक बार फिर सामने आई हैं। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने 22 अक्टूबर को कहा कि अरुणाचल प्रदेश में कई जगहों पर भारतीय और चीनी सैनिक आमने-सामने हैं। उन्होंने बताया कि इन परिस्थितियों में आईटीबीपी की नई शौर्य कमांडो टीमें बेहतर काम कर रही हैं।आखिर शौर्य कमांडो कौन हैं? ये भारतीय सेना की घातक प्लाटून से कैसे अलग हैं? क्या चीन अरुणाचल प्रदेश में अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा है और भारत इससे निपटने के लिए क्या तैयारियां कर रहा है? आइए, इन सभी सवालों को विस्तार से समझते हैं।
Shaurya Commandos: शौर्य कमांडो कौन हैं?
शौर्य कमांडो भारत-तिब्बत सीमा पुलिस यानी आईटीबीपी की विशेष लड़ाकू इकाई है। इसे खास तौर पर चीन से लगी सीमा के ऊंचे और बर्फीले इलाकों में मुश्किल परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार किया गया है।भारत और चीन के बीच 20 अक्टूबर 1962 को युद्ध शुरू हुआ था। इसके चार दिन बाद आईटीबीपी का गठन किया गया। शुरुआत में इस बल का काम ऊंचे और बर्फीले इलाकों में खुफिया जानकारी जुटाना था। जरूरत पड़ने पर जवानों को गुरिल्ला युद्ध यानी दुश्मन पर अचानक छापामार हमला करने के लिए भी तैयार किया जाता था।वर्ष 2004 से भारत-चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की सुरक्षा की जिम्मेदारी आईटीबीपी के पास है। अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में भी यही बल सीमा की निगरानी करता है। फिलहाल आईटीबीपी में करीब एक लाख जवान हैं।
Shaurya Commandos: गलवान झड़प के बाद विशेष दस्ते की जरूरत
जून 2020 में गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। इस घटना में भारत के 20 जवान शहीद हो गए थे। इसके बाद चीन से लगी सीमा पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच आमने-सामने की झड़प का खतरा बना रहा।ऐसे हालात में आईटीबीपी को महसूस हुआ कि नियमित गश्त करने वाली बटालियनों के अलावा एक ऐसे विशेष दस्ते की जरूरत है, जो अत्यधिक ऊंचाई और कड़ाके की ठंड में भी प्रभावी ढंग से काम कर सके। इसके लिए चुस्त-दुरुस्त और कठिन मौसम में काम करने में सक्षम जवानों को चुना गया। उन्हें विशेष प्रशिक्षण देकर शौर्य कमांडो की टीमों में शामिल किया गया।फिलहाल आईटीबीपी की हर बटालियन में एक शौर्य टीम तैनात है और दो नई टीमें बनाई जा रही हैं। आईटीबीपी के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर के मुताबिक, जल्द ही शौर्य कमांडो की एक पूरी बटालियन तैयार करने की योजना है। इसके लिए बल की ऑपरेशन विंग काम कर रही है। इस बटालियन को खास तौर पर ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात किया जाएगा।

Shaurya Commandos: शौर्य कमांडो और घातक प्लाटून में क्या अंतर है?
भारतीय सेना में घातक प्लाटून एक विशेष लड़ाकू इकाई है। इसी तरह की अवधारणा पर आईटीबीपी में शौर्य कमांडो तैयार किए गए हैं। हालांकि, दोनों की जिम्मेदारियों और काम करने के क्षेत्रों में अंतर है।घातक प्लाटून के एक दस्ते में करीब 20 जवान होते हैं। इन्हें लगभग डेढ़ महीने तक कर्नाटक के बेलगावी स्थित कमांडो ट्रेनिंग स्कूल में प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके बाद ऊंचाई वाले इलाकों में युद्ध करने के लिए जम्मू-कश्मीर के हाई-एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल और आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों या जंगलों में अभियान चलाने के लिए सिक्किम के काउंटर इंसर्जेंसी एंड जंगल वॉरफेयर स्कूल में प्रशिक्षण दिया जाता है।घातक प्लाटून का काम मैदानी और बर्फीले इलाकों में सैन्य मोर्चे पर सबसे आगे रहना, दुश्मन की गतिविधियों का पता लगाना और जरूरत पड़ने पर हमला करना है। वहीं, शौर्य कमांडो को खास तौर पर अत्यधिक ठंड और ऊंचाई वाले सीमावर्ती इलाकों में आगे रहकर मोर्चा संभालने और दुश्मन की गतिविधियों का जवाब देने के लिए तैयार किया जाता है।
Shaurya Commandos: शौर्य कमांडो के तीन प्रमुख काम
बर्फीले इलाकों में मोर्चा संभालना
चीन से लगी सीमा पर आईटीबीपी की चौकियां करीब 9,000 से 19,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं। सर्दियों में यहां तापमान माइनस 45 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है। इन इलाकों में ऑक्सीजन की कमी, बर्फीली आंधियां और हिमस्खलन जैसी चुनौतियां रहती हैं। शौर्य कमांडो को ऐसे कठिन हालात में भी अग्रिम मोर्चे पर तैनात रहने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
आमने-सामने की झड़प से निपटना
शौर्य कमांडो को ऐसी परिस्थितियों से निपटने की ट्रेनिंग भी दी जाती है, जब सीमा पर चीनी सैनिकों से सीधे सामना हो जाए और बिना गोली चलाए स्थिति को संभालना जरूरी हो। इसके लिए सेना की प्रशिक्षण इकाई ने ‘स्ट्राइक’ नाम का विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया है। इसमें मार्शल आर्ट, हाथापाई से निपटने की तकनीक और अलग-अलग रणनीतियां सिखाई जाती हैं। इसका उद्देश्य गलवान जैसी हिंसक घटनाओं की आशंका को कम करना है।
ड्रोन और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल
सीमा पर निगरानी बेहतर बनाने के लिए शौर्य कमांडो को ड्रोन चलाने का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। सीमावर्ती इलाकों में तैनात बटालियनों के भीतर ड्रोन प्लाटून बनाई गई हैं। आईटीबीपी को आधुनिक बनाने के लिए 400 करोड़ रुपये का फंड मिला है। इसमें से 70 प्रतिशत राशि ड्रोन जैसे आधुनिक उपकरणों और हथियारों पर खर्च करने की योजना बताई गई है।मार्च 2026 में शौर्य कमांडो ने सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के साथ संयुक्त प्रशिक्षण भी किया था। यह सैन्य इकाई लद्दाख के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में सैन्य अभियानों की जिम्मेदारी संभालती है।
Shaurya Commandos: क्या चीन अरुणाचल प्रदेश में अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा है?
चीन अरुणाचल प्रदेश के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है। वह इस क्षेत्र को दक्षिणी तिब्बत या ‘जांगनान’ कहता है। हाल के महीनों में इस क्षेत्र के आसपास चीनी सैनिकों की गतिविधियों, निर्माण कार्यों और स्थानों के नाम बदलने को लेकर तीन प्रमुख तरह की खबरें सामने आई हैं।
भारतीय क्षेत्र में चीनी सैनिकों के टेंट लगाने का दावा
अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ ने सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया कि जुलाई 2026 के आखिरी दिनों से अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबानसिरी जिले में तनाव बना हुआ है। तकसिंग क्षेत्र में भारतीय सेना और चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जवान आमने-सामने बताए गए हैं।रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हल्की झड़प हुई थी। इसके बाद जवान पीछे हट गए, लेकिन कुछ दिनों बाद चीनी सैनिक बड़ी संख्या में फिर लौट आए। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चीनी सैनिकों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा से करीब 6 से 7 किलोमीटर अंदर भारतीय क्षेत्र में टेंट लगा दिए। इसके जवाब में भारत ने भी इलाके में अपनी सैन्य तैनाती बढ़ाई।अरुणाचल प्रदेश के तागिन समुदाय के छात्र संगठन ऑल तागिन स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष तडक पाकबा ने कहा कि क्षेत्र में इस तरह की चीनी घुसपैठ पहले कभी नहीं देखी गई थी। उनके मुताबिक, सीमावर्ती गांवों में डर का माहौल है।तनाव कम करने के लिए 6 सितंबर को दोनों देशों के बीच कोर कमांडर स्तर की बैठक भी हुई। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद भी स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई।
सैटेलाइट तस्वीरों में नए निर्माण की जानकारी
12 सितंबर 2026 को ब्रिटिश अखबार ‘द इंडिपेंडेंट’ ने सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर रिपोर्ट दी कि चीन अरुणाचल प्रदेश के आसपास तेजी से बुनियादी ढांचा विकसित कर रहा है। इसमें नई सड़कें, इमारतें और हेलीपैड शामिल बताए गए।ओपन-सोर्स खुफिया कंपनी जेन्स के अनुसार, तिब्बत के ल्हुन्जे काउंटी के उत्तरी हिस्से में कई विवादित क्षेत्रों के पास नए निर्माण किए गए हैं। इस इलाके के ठीक दक्षिण में भारत का अपर सुबानसिरी जिला स्थित है।रिपोर्ट के मुताबिक, यहां 2019 की शुरुआत में भी नई इमारतें दिखाई दी थीं। अब इस क्षेत्र में समतल जमीन, नए निर्माण, इंजीनियरिंग कार्यों में इस्तेमाल होने वाले वाहन और एक सीमेंट प्लांट की मौजूदगी भी सामने आई है। अगस्त 2026 में अमेरिकी सैटेलाइट कंपनी वैनटोर की नई तस्वीरों से पता चला कि यहां निर्माण कार्य जारी है। जानकारों का मानना है कि इन निर्माणों की प्रकृति सैन्य अड्डे जैसी हो सकती है।तिब्बत में वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास स्थित एक गांव की नवंबर 2022 और जनवरी 2026 की सैटेलाइट तस्वीरों में भी समय के साथ हुए बदलावों को दिखाया गया है।
अरुणाचल प्रदेश के स्थानों के नाम बदलने का मामला
चीन समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न स्थानों के नाम बदलने की सूची जारी करता रहा है। वर्ष 2017 में चीन ने 6 स्थानों, 2021 में 15 स्थानों और 2023 में 11 स्थानों के नए नाम जारी किए थे।भारत ने इन कदमों पर हर बार कड़ा विरोध जताया। इसके जवाब में अगस्त 2026 में भारत ने अरुणाचल प्रदेश के 27 स्थानों के नाम और उनकी विशेषताओं को अपने आधिकारिक मानचित्र पर दर्ज किया।
Shaurya Commandos: सीमा पर तनाव को लेकर विदेश मंत्रालय का बयान
आईटीबीपी के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने 22 अक्टूबर को कहा था कि अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच आमना-सामना जारी है।इसके अगले दिन, 23 अक्टूबर को भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर समय-समय पर तनाव तब बढ़ता है, जब चीनी सेना गश्त से जुड़े तय नियमों और तौर-तरीकों से हटकर काम करती है।उन्होंने यह भी बताया कि दोनों देश सीमा प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर अपनी समझ बढ़ाने पर बातचीत करने के लिए सहमत हैं।
Shaurya Commandos: चीन से निपटने के लिए भारत को किन तैयारियों की जरूरत?
आईटीबीपी के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने सीमा पर सुरक्षा मजबूत करने के लिए चार प्रमुख जरूरतों पर जोर दिया है। इनमें विशेष पर्वतीय लड़ाकू बल, आधुनिक हथियार, जमीन के नीचे सुरक्षित ठिकाने और ड्रोन युद्ध की तैयारी शामिल हैं।
विशेष पर्वतीय लड़ाकू बल
शत्रुजीत कपूर के मुताबिक, मौजूदा समय में भारत को केवल गुरिल्ला युद्ध की रणनीति पर निर्भर रहने के बजाय विशेष रूप से प्रशिक्षित पर्वतीय लड़ाकू बल की जरूरत है। इसी दिशा में ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में युद्ध करने में सक्षम एक विशेष बल तैयार किया जा रहा है। यह सेना से अलग होगा और कठिन पर्वतीय परिस्थितियों में सैन्य अभियान चलाने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा।
आधुनिक हथियारों की जरूरत
आईटीबीपी के महानिदेशक ने हथियारों को आधुनिक बनाने पर भी जोर दिया। उनके मुताबिक, 50 साल से अधिक उम्र के आईटीबीपी जवानों ने अपने करियर के दौरान ऐसे हथियारों का इस्तेमाल किया है, जो उनके बल में शामिल होने के समय भी मौजूद थे। बीच में हथियारों में कुछ बदलाव जरूर हुए, लेकिन उनकी बुनियादी प्रकृति काफी हद तक समान रही है। बदलती सैन्य जरूरतों को देखते हुए आधुनिक हथियारों और उपकरणों में निवेश जरूरी है। इसके लिए बड़े स्तर पर प्रावधान किए गए हैं।
सीमा चौकियों पर जमीन के नीचे सुरक्षित ठिकाने
आधुनिक युद्ध में जमीन पर मौजूद सैनिकों और ठिकानों को आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। ऐसे में अंडरग्राउंड शेल्टर यानी जमीन के नीचे सुरक्षित ठिकाने बनाना जरूरी माना जा रहा है।शत्रुजीत कपूर के अनुसार, तेजी से बदलते युद्ध के तरीकों को देखते हुए बड़े पैमाने पर ऐसे ढांचे तैयार करने की जरूरत है। फिलहाल प्रायोगिक परियोजना के तहत आईटीबीपी की कुछ कंपनियों ने अपनी सीमा चौकियों पर जमीन के नीचे सुरक्षित ढांचे बनाना शुरू कर दिया है।
ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम पर जोर
शत्रुजीत कपूर ने रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान-अमेरिका के बीच संघर्ष का उदाहरण देते हुए ड्रोन की बढ़ती भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यूक्रेन ने रूस जैसी बड़ी सैन्य शक्ति को चुनौती दी है और ईरान ने भी ड्रोन के जरिए अमेरिका को चुनौती दी है। उनके बयान में रूस के 10 से 15 हजार सैनिकों के मारे जाने का भी उल्लेख किया गया।उनके मुताबिक, भारत को ड्रोन के साथ-साथ एंटी-ड्रोन सिस्टम विकसित करने पर भी ध्यान देना होगा, ताकि दुश्मन के ड्रोन का पता लगाकर उन्हें निष्क्रिय किया जा सके। उन्होंने बताया कि 4,000 करोड़ रुपये की आधुनिकीकरण योजना में से 1,000 करोड़ रुपये ड्रोन के लिए रखे गए हैं।
Shaurya Commandos: भारत और चीन के बीच सीमा पर बुनियादी ढांचे की तुलना
सीमा पर सैन्य तैयारियों में हथियारों के साथ-साथ सड़कें, रेल नेटवर्क, सुरंगें, गांव और निगरानी प्रणाली भी अहम भूमिका निभाते हैं। इस मामले में भारत और चीन दोनों अपनी क्षमताएं बढ़ा रहे हैं।
सड़क और रेल नेटवर्क
चीन ने तिब्बत में जी219 और जी318 जैसे हर मौसम में इस्तेमाल किए जा सकने वाले एक्सप्रेसवे बनाए हैं। इसके अलावा, सिचुआन-तिब्बत रेलवे जैसे तेज रेल नेटवर्क और आधुनिक सुरंग बनाने वाली मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, चीन पहाड़ी क्षेत्रों में प्रतिदिन 10 से 15 किलोमीटर तक सड़क बना सकता है।भारत ने भी अटल टनल, सेला टनल और डीएसडीबीओ जैसे रणनीतिक राजमार्ग तैयार किए हैं। हालांकि, जमीन अधिग्रहण, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और तकनीकी चुनौतियों के कारण भारत में निर्माण की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है।
सीमावर्ती गांवों का विकास
चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा के आसपास करीब 628 शियाओकांग मॉडल गांव बसाए हैं। ये गांव रिहायशी बस्तियों के साथ सैन्य चौकियों और निगरानी केंद्रों के रूप में भी काम कर सकते हैं।भारत सरकार ने भी वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम के तहत सीमा के पास स्थित गांवों के विकास पर काम शुरू किया है। इस योजना के तहत 19 जिलों के 2,967 गांवों में विकास कार्य किए जाने हैं।
निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक
चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा के आसपास बड़ी संख्या में निगरानी ड्रोन, एंटी-ड्रोन नेटवर्क और स्वचालित सेंसर तैनात किए हैं। भारत भी सीमा पर ड्रोन, थर्मल कैमरे और सेंसर जैसे उपकरणों की तैनाती बढ़ा रहा है, ताकि सैनिकों को दुश्मन की गतिविधियों का समय रहते पता चल सके।
सीमा सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीक और विशेष प्रशिक्षण जरूरी
अरुणाचल प्रदेश में सैनिकों के आमने-सामने होने की खबरों और चीन की ओर से सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विस्तार के दावों ने सीमा सुरक्षा को फिर चर्चा में ला दिया है। ऐसे हालात में शौर्य कमांडो जैसे विशेष प्रशिक्षित दस्ते भारत की सुरक्षा व्यवस्था में अहम भूमिका निभा सकते हैं।इन जवानों को कठिन मौसम में काम करने, आमने-सामने की झड़पों से निपटने और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने के लिए तैयार किया जा रहा है। इसके साथ ही आधुनिक हथियारों, सुरक्षित सैन्य ठिकानों, बेहतर सड़क संपर्क, ड्रोन और निगरानी प्रणालियों को मजबूत करना भी जरूरी है।भारत के लिए चुनौती केवल सीमा पर सैनिकों की मौजूदगी बनाए रखना नहीं है, बल्कि कठिन परिस्थितियों में तेजी से कार्रवाई करना और बदलती सैन्य तकनीक के अनुरूप अपनी तैयारियों को लगातार बेहतर बनाना भी है।








