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आजादी की लड़ाई से POK तक कैसे पहुंची ‘सरफरोशी की तमन्ना’? जानिए इस क्रांतिकारी गजल की पूरी कहानी

Sarfaroshi ki tamanna history: ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है।’ ये पंक्तियां करीब एक सदी से अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वालों में जोश भरती रही हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ प्रतिरोध की पहचान बनी यह गजल आज भी छात्र आंदोलनों, राजनीतिक प्रदर्शनों और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग करने वाले मंचों पर सुनाई देती है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए हालिया प्रदर्शनों में भी इसकी गूंज सुनाई दी। आखिर किसने लिखी थी यह गजल, इसका क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल से क्या रिश्ता है और यह विरोध की पहचान कैसे बनी? जानिए पूरी कहानी।

‘सरफरोशी की तमन्ना’ किसने लिखी थी?

‘सरफरोशी की तमन्ना’ को लेकर सबसे बड़ा सवाल इसके रचनाकार के नाम को लेकर है। आमतौर पर बहुत से लोग इसे क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल की रचना मानते हैं। हालांकि, इस मशहूर गजल के मूल रचनाकार उर्दू शायर बिस्मिल अजीमाबादी थे।

बिस्मिल अजीमाबादी का जन्म बिहार के पटना में हुआ था। पटना को ऐतिहासिक रूप से अजीमाबाद भी कहा जाता था। उनका मूल नाम सैयद शाह मोहम्मद हसन बताया जाता है। उन्होंने शायरी की दुनिया में ‘बिस्मिल’ उपनाम अपनाया। उनका संबंध उर्दू साहित्य की समृद्ध परंपरा से था। परिवार के साहित्यिक माहौल और उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों ने उनकी रचनात्मकता को दिशा दी। उनकी यह गजल आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों की आवाज बन गई।

Sarfaroshi ki tamanna history: जलियांवाला बाग हत्याकांड से क्या था गजल का संबंध?

‘सरफरोशी की तमन्ना’ की पृष्ठभूमि को समझने के लिए 1919 के घटनाक्रम को जानना जरूरी है। उस समय ब्रिटिश शासन के खिलाफ देशभर में असंतोष बढ़ रहा था। रॉलेट एक्ट के विरोध ने आंदोलन को तेज किया और इसी दौर में 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में भयावह हत्याकांड हुआ। बैसाखी के दिन जलियांवाला बाग में बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए थे। ब्रिटिश अधिकारी जनरल रेजिनाल्ड डायर के आदेश पर सैनिकों ने वहां मौजूद निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलाईं। इस घटना में बड़ी संख्या में लोग मारे गए और घायल हुए।

जलियांवाला बाग हत्याकांड ने देशभर में आक्रोश पैदा किया। ब्रिटिश शासन के दमन, नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध और आजादी की आकांक्षा ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी। इसी ऐतिहासिक माहौल में बिस्मिल अजीमाबादी की गजल ने प्रतिरोध, साहस और बलिदान की भावना को शब्द दिए। हालांकि, इस रचना की पृष्ठभूमि और इसके लिखे जाने की परिस्थितियों के विवरण को ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर समझना चाहिए।

 गजल कब लिखी गई और कैसे लोकप्रिय हुई?

बिस्मिल अजीमाबादी ने यह गजल 1920 के आसपास लिखी थी। इसका संबंध उस दौर के राष्ट्रवादी माहौल और ब्रिटिश शासन के खिलाफ बढ़ते विरोध से था। इसकी पंक्तियों में अन्याय के सामने झुकने से इनकार और संघर्ष के लिए तैयार रहने का भाव दिखाई देता है। यही वजह थी कि यह रचना साहित्यिक दायरे से निकलकर राजनीतिक प्रतिरोध की आवाज बन गई।

समय के साथ स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारियों और कार्यकर्ताओं के बीच इसकी लोकप्रियता बढ़ी। इसकी भाषा सरल, प्रभावशाली और जोश पैदा करने वाली थी। इसे सार्वजनिक सभाओं और आंदोलनों में पढ़ा जाने लगा। इस गजल की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण यह भी था कि इसकी पंक्तियां किसी एक घटना तक सीमित नहीं थीं। इन्हें अन्याय और दमन के खिलाफ संघर्ष के व्यापक संदेश के रूप में भी समझा जा सकता था।

Sarfaroshi ki tamanna history: राम प्रसाद बिस्मिल के नाम से क्यों जुड़ गई यह गजल?

इस गजल के रचनाकार को लेकर भ्रम की सबसे बड़ी वजह बिस्मिल अजीमाबादी और क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के उपनाम का एक जैसा होना है।राम प्रसाद बिस्मिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारियों में शामिल थे। वे क्रांतिकारी गतिविधियों के साथ-साथ लेखन और कविता से भी जुड़े थे। काकोरी ट्रेन कार्रवाई के मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया और 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में फांसी दे दी गई।

राम प्रसाद बिस्मिल और उनके साथियों के संघर्ष ने इस गजल के क्रांतिकारी तेवरों को और लोकप्रिय बनाया। उनकी शहादत के बाद भी यह रचना स्वतंत्रता और बलिदान की भावना से जुड़ी रही। धीरे-धीरे आम लोगों के बीच गजल और क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल का संबंध इतना मजबूत हो गया कि इसके वास्तविक रचनाकार को लेकर भ्रम पैदा हो गया। गजल के रचनाकार बिस्मिल अजीमाबादी थे, जबकि राम प्रसाद बिस्मिल ने क्रांतिकारी आंदोलन में अपनी भूमिका और शहादत के जरिए ऐसी रचनाओं को व्यापक लोकप्रियता दिलाने में योगदान दिया।

Sarfaroshi ki tamanna history
                                                        Sarfaroshi ki tamanna history
‘सरफरोशी की तमन्ना’ का मतलब क्या है?

‘सरफरोशी’ का अर्थ है सिर कटाने या प्राण न्योछावर करने के लिए तैयार रहना। इस संदर्भ में यह शब्द किसी उद्देश्य के लिए साहसपूर्वक बलिदान देने की भावना को व्यक्त करता है। गजल की मशहूर पंक्ति-

‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है।’

का भाव यह है कि संघर्ष करने वाले अन्याय के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं। वे चुनौती स्वीकार करते हुए अपने संकल्प और साहस का प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी तेवर ने इस रचना को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान प्रभावशाली बनाया। यह केवल देशभक्ति की भावना व्यक्त करने वाली कविता नहीं रही, बल्कि दमनकारी सत्ता को चुनौती देने और अपने अधिकारों के लिए खड़े होने का प्रतीक बन गई।

Sarfaroshi ki tamanna history: आज के विरोध प्रदर्शनों में क्यों गूंजती हैं इसकी पंक्तियां?

आजादी के बाद भी ‘सरफरोशी की तमन्ना’ की लोकप्रियता खत्म नहीं हुई। समय के साथ इसका इस्तेमाल विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में होने लगा। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान भी इसकी पंक्तियां सुनाई दीं। छात्र आंदोलनों और दूसरे विरोध प्रदर्शनों में भी यह गजल प्रतिरोध के सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में सामने आती रही है। हाल के दिनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों में भी इस गजल को गाया गया।

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा ने प्रदर्शन के दौरान इसकी पंक्तियां गाईं। इस तरह गजल का इस्तेमाल केवल किसी एक राजनीतिक दल या संगठन तक सीमित नहीं रहा। अलग-अलग विचारधाराओं और मुद्दों से जुड़े प्रदर्शनकारी इसे अपने संघर्ष और असहमति की अभिव्यक्ति के रूप में अपनाते रहे हैं।

POK समेत अलग-अलग जगहों पर कैसे पहुंची यह गजल?

‘सरफरोशी की तमन्ना’ का उल्लेख भारत के विभिन्न हिस्सों में हुए प्रदर्शनों के संदर्भ में किया जाता रहा है। इसके अलावा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) समेत दूसरे क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान भी इस तरह की क्रांतिकारी पंक्तियों के इस्तेमाल की चर्चा होती रही है।

इसका कारण यह है कि गजल की भाषा किसी एक समय या घटना तक सीमित नहीं है। अन्याय, दमन और अधिकारों के लिए संघर्ष जैसे विषय अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में लोगों को इससे जोड़ते हैं। लेकिन POK समेत हर क्षेत्र में इसके इस्तेमाल की व्यापकता या किसी खास प्रदर्शन में इसकी मौजूदगी के दावे की जा रही होगी।

Sarfaroshi ki tamanna history: फिल्मों ने भी बढ़ाई ‘सरफरोशी की तमन्ना’ की लोकप्रियता

हिंदी सिनेमा ने स्वतंत्रता आंदोलन और क्रांतिकारी विचारों से जुड़ी कविताओं को नई पीढ़ियों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है। देशभक्ति और क्रांतिकारी संघर्ष पर बनी फिल्मों ने ऐसी रचनाओं की लोकप्रियता को लंबे समय तक बनाए रखा। ‘शहीद’ (1965), ‘सरफरोश’ (1999), ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ (2002) और ‘रंग दे बसंती’ (2006) जैसी फिल्मों में क्रांतिकारी भावना और देशभक्ति से जुड़े गीतों व कविताओं को प्रमुखता मिली। हालांकि, इन फिल्मों में किसी रचना के इस्तेमाल और मूल गजल के पूरे पाठ या उसकी ऐतिहासिक रचना-प्रक्रिया के बीच अंतर समझना जरूरी है। सिनेमा ने क्रांतिकारी साहित्य की लोकप्रियता बढ़ाई, लेकिन इस गजल का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौर तक जाता है।

एक गजल, जो समय के साथ विरोध की आवाज बन गई

‘सरफरोशी की तमन्ना’ की यात्रा एक उर्दू शायर की रचना से शुरू होकर स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी प्रतीक और आधुनिक विरोध प्रदर्शनों की आवाज बनने तक पहुंची है। बिस्मिल अजीमाबादी की इस गजल को राम प्रसाद बिस्मिल के नाम से जोड़कर देखा जाना इसके इतिहास का एक दिलचस्प पहलू है। वहीं, अलग-अलग दौर में आंदोलनों के दौरान इसका इस्तेमाल बताता है कि साहित्य और कविता राजनीतिक प्रतिरोध की अभिव्यक्ति कैसे बन सकते हैं।

करीब एक सदी बाद भी इसकी पंक्तियां लोगों को आकर्षित करती हैं, क्योंकि इनमें साहस, बलिदान और अन्याय के सामने खड़े होने का भाव है। यही वजह है कि ‘सरफरोशी की तमन्ना’ आज भी इतिहास की किताबों से निकलकर विरोध प्रदर्शनों में सुनाई देती है।

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