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मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर अखिेलेश यादव तक, विकास के बजाय विवाद पर बहस क्यों हो? 

Opinion: मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर अखिेलेश यादव तक, विकास के बजाय विवाद पर बहस क्यों हो? 
Opinion: मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर अखिेलेश यादव तक, विकास के बजाय विवाद पर बहस क्यों हो? 
Opinion: दिसंबर 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने पीएम मोदी के लिए कहा था, “ये आदमी बहुत नीच किस्म का है, इसमें कोई सभ्यता नहीं है।”हालांकि इस बात को लेकर जब बवाल मचा तो, अय्यर ने सफाई दी कि हिंदी पर पूरी पकड़ न होने के कारण उनसे यह गलती हुई। उन्होंने इसके लिए खेद भी जताया था। राजनीतिक नुकसान को भांपते हुए तब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी कहा था कि ‘मणिशंकर अय्यर ने प्रधानमंत्री के लिए जिस भाषा और लहजे का इस्तेमाल किया है, मैं उसे ठीक नहीं मानता हूँ।’ दिक्कत यह है कि कांग्रेस के बड़े नेता निरंतर ऐसी भाषा बोलते आ रहे हैं जिसका कांग्रेस को फायदा नहीं, बल्कि नुकसान ही होता है। इस बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी पटना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वर्गीय पिता के लिए एक ऐसी बात कह दी जिसे लेकर देश की सियासत गरमा गई है। दरअसल, खड़गे पटना में जब मंच से तथाकथित वोट चोरों को जेल भेजने की बात कर रहे थे, तब भीड़ से एक आवाज आई कि ‘मोदी कहीं नहीं जाएगा’, इस पर खड़गे इतने झुंझला उठे कि उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि ‘मोदी तो क्या, मोदी का बाप भी जाएगा।’ कांग्रेस की ओर से पीएम मोदी के लिए पहले भी अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल होता रहा है। 

‘सेल्फ गोल’ क्यों करते हैं कांग्रेस नेता?

समझ में नहीं आता है कि कांग्रेस नेता जब महसूस करते हैं कि उनकी भाषा उन्हीं लिए भारी पड़ सकती है, तो वे क्यों बार-बार ‘सेल्फ गोल’ करने को विवश हो जाते हैं? इस बारे में भाजपा का तो यह दावा है कि कांग्रेसी नेता अपनी लगातार हो रही हार के चलते बौखला गए हैं, वे बेहद हताशा और निराशा में प्रधानमंत्री के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। अब कांग्रेस इस दावे को नजरंदाज करे या इसका जवाब दे, यह तो उसके रणनीतिकारों पर निर्भर करता है, लेकिन सच यही है कि इसका उसे नुकसान हो सकता है।राजनीति में जब बड़े नेता अमर्यादित बयान देते हैं और उनकी भाषा में अपने राजनीतिक विरोधियों के प्रति नफरत की झलक दिखाई देती है, तो इसका खामियाजा खुद उनकी पार्टी को भुगतना पड़ता है। इसका जनता में सीधा-सा संदेश जाता है कि जब चुनावी जंग में विरोधियों का मुकाबला करने में असमर्थ हैं, तो अमर्यादित भाषा का इस्तमेाल कर खीझ मिटा रहे हैं। 

Opinion: अखिलेश यादव की बौखलाहट

सवाल सिर्फ खड़गे तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बीच उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने उत्तराखंड के लोगों को उत्तर प्रदेश में घुसपैठिया बताकर एक नया विवाद खड़ा कर डाला है।अखिलेश भूल गए हैं कि उनके पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव जिन स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा को राजनीति में अपना आदर्श मानते थे, जिनकी छत्रछाया में मुलायम फले-फूले, वे मूल रूप से उत्तराखंड के ही थे। उन्हें इतना भी अहसास नहीं रहा कि खुद उनकी पत्नी एवं उनके छोटे भाई की पत्नी भी उत्तराखंड से ही हैं।अखिलेश यादव के बयान का जनता में यह संदेश गया है कि अखिलेश के पास यूपी चुनाव के लिए कोई मुद्दा नहीं रह गया है। राज्य में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में जो विकास कार्य हुए, जो सुशासन चल रहा है, उससे बौखलाकर अखिलेश ने हताशा और निराशा में विवादास्पद बयान दिया है। 

विषयों से हटकर विवादों पर बहस…

राजनीति में बड़े नेताओं को बहुत संयमित भाषा बोलनी जरूरी है। यदि छोटे नेता गलत भाषा का इस्तेमाल करें तो किसी हद तक उन्हें नजरंदाज किया जा सकता है, लेकिन जब कोई बड़ा नेता अमर्यादित भाषा का प्रयोग करता है, तो जनता और बुद्धिजीवी वर्ग के बीच उसी की पार्टी की नकारात्मक छवि बनती है।अमर्यादित टिप्पणियों और विवादास्पद बयानों का जनता को यह नुकसान होता है कि राजनीतिक बहस उसके हित के मूल विषयों से हटकर विवादों पर केंद्रित हो जाती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पटना में जो कहा उससे भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। इसके कारण फिलहाल राष्ट्रीय राजनीति में मूल विषय गौण हो गए हैं और पूरी राजनीति बयानबाजी या मोर्चेबंदी पर केंद्रित हो गई है। इसी तरह अखिलेश यादव ने विकास और सुशासन पर बात करने के बजाए विवादास्पद माहौल खड़ा करने की जो चाल चली, वह राष्ट्रहित में उचित नहीं है।