Tiger Shroff case: बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर हमले की साजिश में कथित तौर पर शामिल बिश्नोई गैंग के शूटरों पर महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट (MCOCA) लगाया गया है। इसके साथ ही महाराष्ट्र का यह सख्त कानून एक बार फिर चर्चा में आ गया है। साल 1999 में लागू हुए मकोका ने मुंबई अंडरवर्ल्ड के खिलाफ पुलिस को बड़ी ताकत दी थी। दाऊद इब्राहिम और छोटा शकील जैसे गैंगस्टरों के नेटवर्क पर शिकंजा कसने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया। हालांकि, इस कानून की कहानी केवल गैंगस्टरों तक सीमित नहीं रही। फिल्म फाइनेंसर, निर्माता, पत्रकार, जज और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी तक इसके दायरे में आए। आइए जानते हैं मकोका का इतिहास और इसकी खासियतें।
Tiger Shroff case: टाडा के खत्म होने के बाद आया मकोका
साल 1995 में आतंकवादी और विध्वंसक गतिविधि निरोधक कानून यानी टाडा (TADA) की अवधि समाप्त हो गई। इसके बाद संगठित अपराध सिंडिकेट के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पुलिस के पास वैसा सख्त कानून नहीं बचा था। टाडा एक कड़ा कानून था, जिसका इस्तेमाल मुंबई पुलिस आतंकवाद से जुड़े मामलों के अलावा अंडरवर्ल्ड के खिलाफ भी करती थी। 1993 के मुंबई सीरियल बम धमाकों के मामले में याकूब मेमन और संजय दत्त समेत कई आरोपियों पर टाडा के तहत मुकदमा चलाया गया था। इस कानून में जमानत हासिल करना मुश्किल था और पुलिस को कई असाधारण अधिकार मिले हुए थे। हालांकि, मानवाधिकार संगठनों ने टाडा के प्रावधानों की आलोचना की थी। इसके दुरुपयोग को लेकर उठे सवालों के बीच इस कानून को आगे नहीं बढ़ाया गया।
टाडा की अवधि समाप्त होने के बाद संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई करना पुलिस के लिए चुनौती बन गया। इसी दौरान मुंबई में अंडरवर्ल्ड की गतिविधियां भी चिंता का विषय बनी हुई थीं। पुलिस ने कथित गैंगस्टरों के खिलाफ एनकाउंटर की नीति अपनाई, लेकिन इस पर भी सवाल उठे। ऐसे में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री गोपीनाथ मुंडे के नेतृत्व में महाराष्ट्र सरकार ने संगठित अपराध से निपटने के लिए एक नया सख्त कानून लाने का फैसला किया।
Tiger Shroff case: मकोका ने अपराधियों की नींद उड़ा दी
साल 1999 में महाराष्ट्र में मकोका लागू किया गया। इसका उद्देश्य संगठित अपराध और आपराधिक गिरोहों की गतिविधियों पर लगाम लगाना था। इस कानून ने पुलिस को जांच और कार्रवाई के लिए कई विशेष अधिकार दिए।
मकोका के तहत पुलिस अधीक्षक (SP) या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी के सामने दर्ज आरोपी का इकबालिया बयान कुछ शर्तों के अधीन अदालत में सबूत के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। सामान्य कानूनी प्रक्रिया की तुलना में इस कानून के तहत जमानत हासिल करना भी अधिक कठिन है।
मकोका के तहत अग्रिम जमानत पर रोक है। इसके अलावा, आरोपी की पुलिस हिरासत अधिकतम 30 दिनों तक बढ़ाई जा सकती है, जबकि सामान्य आपराधिक मामलों में पुलिस हिरासत की अवधि आमतौर पर 15 दिनों तक सीमित होती है।
इस कानून के तहत जांच एजेंसी को आरोपपत्र दाखिल करने के लिए भी अधिक समय मिल सकता है। सामान्य मामलों में लागू समयसीमा के मुकाबले मकोका के तहत विशेष परिस्थितियों और कानूनी मंजूरी के अधीन यह अवधि 180 दिनों तक हो सकती है।
इसके अलावा, कानून में निर्धारित प्रक्रिया और मंजूरी के अधीन फोन कॉल इंटरसेप्शन जैसे उपायों की भी अनुमति है। इन प्रावधानों का उद्देश्य संगठित अपराध से जुड़े नेटवर्क, उनकी बातचीत और आपराधिक गतिविधियों की जांच में मदद करना है।
मकोका की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें कुछ परिस्थितियों में सामान्य आपराधिक कानूनों से अलग साक्ष्य संबंधी प्रावधान लागू होते हैं। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर मामले में आरोपी को तब तक दोषी माना जाता है, जब तक वह खुद को निर्दोष साबित न कर दे। आरोप साबित करने की जिम्मेदारी और संबंधित कानूनी मानक मामले के तथ्यों तथा लागू प्रावधानों पर निर्भर करते हैं।
दाऊद के शूटरों को सुनाई गई थी मौत की सजा
मकोका लागू होने के शुरुआती वर्षों में ही इसका इस्तेमाल मुंबई अंडरवर्ल्ड से जुड़े मामलों में होने लगा था। मुंबई के पूर्व मेयर मिलिंद वैद्य पर गोलीबारी के मामले में दाऊद इब्राहिम गिरोह के तीन शूटरों के खिलाफ मकोका के तहत कार्रवाई की गई थी।
इस हमले में मिलिंद वैद्य बच गए थे, लेकिन उनके कुछ कार्यकर्ताओं की जान चली गई थी। इस मामले में निचली अदालत ने आरोपियों को मौत की सजा सुनाई थी। जांच की निगरानी करने वाले डीसीपी प्रदीप सावंत को भी बेहतर जांच के लिए सम्मानित किया गया था।
हालांकि, बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया था। इस घटनाक्रम ने दिखाया कि मकोका जैसे सख्त कानून के तहत भी अदालतों की जांच और न्यायिक समीक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
फिल्म फाइनेंसर से पत्रकार तक पहुंचे मकोका के दायरे में
मकोका उस समय देशभर में चर्चा का विषय बन गया, जब बॉलीवुड के बड़े फिल्म फाइनेंसर भरत शाह को इस कानून के तहत गिरफ्तार किया गया। उन पर अंडरवर्ल्ड से जुड़े लोगों के संपर्क और फिल्म ‘चोरी चोरी चुपके चुपके’ में कथित तौर पर अपराध से जुड़े धन के निवेश के मामले में आरोप लगे थे।
इस मामले में फिल्म निर्देशक नाजिम रिजवी और अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया गया था। केस की सुनवाई के दौरान कई फिल्मी हस्तियों को गवाही के लिए बुलाया गया। इस प्रकरण ने बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के कथित संबंधों को लेकर व्यापक चर्चा छेड़ दी थी।
मुंबई पुलिस ने अंडरवर्ल्ड से जुड़े नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई के दौरान पत्रकार का भेष धारण कर क्राइम ब्रांच की इमारत को बम से उड़ाने की कथित साजिश रचने वाले सलीम शेख उर्फ सलीम एसटीडी के खिलाफ भी मकोका का इस्तेमाल किया था।
इस कानून का दायरा एक मामले में न्यायपालिका तक भी पहुंचा। छोटा शकील के साथ कथित टेलीफोन बातचीत सामने आने के बाद सेशंस कोर्ट के एक जज के खिलाफ भी मकोका के तहत कार्रवाई की गई थी। इन घटनाओं ने दिखाया कि संगठित अपराध से जुड़े मामलों में इस कानून का इस्तेमाल कई अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों के खिलाफ हुआ।
जब पुलिस कमिश्नर स्तर के अधिकारी भी हुए गिरफ्तार
मकोका के इतिहास में साल 2003 का तेलगी घोटाला एक अहम मोड़ साबित हुआ। करोड़ों रुपये के फर्जी स्टांप पेपर से जुड़े इस मामले की जांच के दौरान पुलिस के कई अधिकारियों पर भी कार्रवाई हुई।
इस मामले में सब-इंस्पेक्टर से लेकर पुलिस कमिश्नर स्तर तक के अधिकारियों को मकोका के तहत गिरफ्तार किया गया था। इन अधिकारियों पर लगे आरोपों और उनके खिलाफ हुई कार्रवाई ने कानून के इस्तेमाल को लेकर नई बहस छेड़ दी।
इस घटनाक्रम ने यह भी दिखाया कि जिस कानून का इस्तेमाल पुलिस संगठित अपराध के खिलाफ करती थी, उसी के तहत पुलिस अधिकारियों को भी जांच का सामना करना पड़ सकता है।
मुंबई में संगठित अपराध के खिलाफ फिर चर्चा में मकोका
मुंबई में लंबे समय तक अंडरवर्ल्ड की गतिविधियां पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रहीं, लेकिन हाल के वर्षों में संगठित आपराधिक गिरोहों की गतिविधियों को लेकर फिर चिंता बढ़ी है। टाइगर श्रॉफ पर हमले की साजिश से जुड़े मामले में बिश्नोई गैंग के कथित शूटरों पर मकोका लगाए जाने के बाद यह कानून एक बार फिर सुर्खियों में है।
1999 में लागू हुआ यह कानून महाराष्ट्र पुलिस को संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए विशेष अधिकार देता है। हालांकि, इसके सख्त प्रावधानों के कारण इसके इस्तेमाल पर कानूनी और मानवाधिकार संबंधी बहस भी होती रही है।
मकोका का इतिहास बताता है कि यह कानून केवल गैंगस्टरों के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई हाई-प्रोफाइल मामलों में भी इस्तेमाल हुआ है। अब टाइगर श्रॉफ केस में इसका इस्तेमाल एक बार फिर इस सवाल को चर्चा में ले आया है कि संगठित अपराध के बदलते स्वरूप से निपटने में मकोका की भूमिका कितनी अहम है।
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