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नेपाल के बाद अब भूटान में बाढ़ का कहर, हिमालय में बन रही खतरनाक झीलें 

Natural Disaster: नेपाल के बाद अब भूटान में बाढ़ का कहर, हिमालय में बन रही खतरनाक झीलें 
Natural Disaster: नेपाल के बाद अब भूटान में बाढ़ का कहर, हिमालय में बन रही खतरनाक झीलें 
Natural Disaster: गुरुवार 29 अक्टूबर की रात को भूटान के गासा जिले में शिंताफू ग्लेशियर झील (Shintaphu Lake) ग्लेशियर झील फट गई। झील का पानी संकोष नदी में तक्तसिमाखांग इलाके तक पहुंच गया। एहतियात के तौर पर बंगाल के अलीपुर द्वार व असम के धुबरी जिले में भी प्रशासन अलर्ट मोड में है।15 हजार लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है।यह कोई पहली ऐसी आपदा नहीं है, बल्कि इसी वर्ष यानी 2026 के अगस्त माह में तिब्बत-नेपाल सीमा के पास लंगटांग और रसवा क्षेत्र में एक विशाल ग्लेशियर और चट्टानी हिस्से का अचानक टूटकर नीचे गिर जाना भीषण तबाही का कारण बना। भोटकोशी, त्रिशुली और नारायणी-गंडकी नदियों में अचानक भीषण सैलाब आ गया। करीब 1,400 से लोगों की मौतें हुई। इसके बाद अक्टूबर माह में भी गोरखा जिले के चुमनुबरी और बूढ़ी गंडकी नदी के इलाकों में अचानक बाढ़ आई, जिससे जनजीवन और प्रभावित हुआ है। नेपाल में बाढ़ के कारण करीब एक लाख लोग किसी न किसी रूप से प्रभावित हुए।
 

ग्लेशियरों के पिघलने के कारण बनीं 28,000 झीलें

हाल की ये त्रासदियां कोई अंतिम नहीं हैं, बल्कि हिमालयी क्षेत्रों को भविष्य में भी बाढ़ का कहर झेलने को विवश होना पड़ेगा। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का सीधा असर हिमालय के ग्लेशियरों पर पड़ रहा है।ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और इसके कारण नई-नई ग्लेशियर झीलों का निर्माण हो रहा है।भारी बारिश, बादलों के फटने और भूस्खलन की स्थिति में इन झीलों के टूटने का खतरा रहता है।नेपाल में आई भयंकर बाढ़ के बाद इन संवेदनशील झीलों के कारण चिंताएं बढ़ जानी स्वाभाविक हैं। हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण 28,000 से अधिक ग्लेशियर झीलें बन चुकी हैं। वर्ष 2016 में विश्व बैंक की सहायता से शुरू किए गए नेशनल हाइड्रोलॉजी प्रोजेक्ट (National Hydrology Project – NHP) के तहत ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन, गंगा नदी बेसिन और सिंधु नदी बेसिन में की गई रिसर्च के अनुसार इन तीनों नदी बेसिन में लगभग 28043 ग्लेशियर झीलें हैं।

Natural Disaster:  बेहद संवेदनशील हैं कई झीलें

हिमालय क्षेत्र में कई झीलें बेहद संवेदनशील श्रेणी में आती हैं, जिनके फटने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) यानी हिमनद झील के फटने से अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बना रहता है।17 जून 2013 को उत्तराखंड में हुई भारी बारिश हुई और भूस्खलन (Landslides) के कारण केदारनाथ के ऊपर स्थित चोराबाड़ी झील में भारी मात्रा में पानी और ग्लेशियर का मलबा भर गया था। इसका दबाव सहन न कर पाने के कारण झील टूट गयी और झील का सारा पानी, मलबा और बड़ी चट्टानें तेज गति से बहती हुई केदारनाथ और मंदाकिनी नदी में आ गई। इस अचानक आई बाढ़ (Flash Flood) ने केदार घाटी में सब कुछ तबाह कर दिया था। कई गांव और कस्बे उजड़ गए। हजारों लोगों एवं मवेशियों की जानें चली गई थी।विकास योजनाओं को भी भारी क्षति पहुंची थी। 

समय रहते समझना होगा

देश के हिमालयी राज्यों की बात करें तो अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, हिमाचल और उत्तराखंड में सैकड़ों की संख्या में ऐसी झीलें हैं, जो भविष्य में खतरनाक रूप ले सकती हैं।दिक्कत यह है कि एक ओर जहाँ जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय में नई-नई ग्लेशियर झीलों का निर्माण हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ अनियंत्रित निर्माण और नदियों के किनारे अवैध व असुरक्षित बस्तियों के बसने से नदियों का प्राकृतिक जल प्रवाह बाधित हो जाता है।ये इंसानी भूलें आपदा की स्थिति में और विनाशकारी साबित हो जाती हैं।जानकारों के मुताबिक जंगलों में प्रतिवर्ष लगने वाली भयंकर आग से उत्सर्जित होने वाला ब्लैक कार्बन ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का कारण बन रहा है। इसके अलावा हिमालयी में बने बांधों की झीलों को भी कार्बन उत्सर्जन का कराण माना जाता है।कार्बन उत्सर्जन से ग्लेशियरों के पिघलने में तेजी आ रही है और नई झीलें आकार ले रही हैं।अगर समय रहते ही इस दिशा में विचार नहीं किया गया, तो भविष्य में हिमालयी क्षेत्र खतरे में पड़ जाएगा। समय रहते हिमालय को समझना होगा।