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भारत में आज भी क्यों होता है बैलेट पेपर से मतदान? जानिए EVM के बजाय इसका इस्तेमाल कहां और क्यों होता है

EVM और बैलेट पेपर में क्या है अंतर? जानिए वजह
EVM और बैलेट पेपर में क्या है अंतर? जानिए वजह

EVM vs Ballot Paper: भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि देश में बैलेट पेपर से मतदान की व्यवस्था पूरी तरह खत्म हो गई है। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव के साथ-साथ राज्यसभा और विधान परिषद (MLC) के चुनावों में आज भी बैलेट पेपर का इस्तेमाल होता है। इसके अलावा पंचायत और नगर निकाय चुनावों में भी कुछ राज्यों में इसी तरीके से वोटिंग कराई जाती है।ऐसे में सवाल उठता है कि जब आम चुनावों में EVM का इस्तेमाल हो रहा है, तो कुछ चुनावों में बैलेट पेपर की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या इसकी वजह मतदान की अलग प्रक्रिया है या इसके पीछे कोई कानूनी प्रावधान है? आइए समझते हैं।

EVM vs Ballot Paper: क्या भारत में बैलेट पेपर का इस्तेमाल पूरी तरह बंद हो गया है?

लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदान के लिए EVM के साथ वोटर वेरिफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन कागजी मतपत्रों की व्यवस्था अभी भी मौजूद है।कुछ विशेष श्रेणियों के मतदाताओं को पोस्टल बैलेट के जरिए वोट डालने की सुविधा दी जाती है। इनमें पात्र सेवा मतदाता, चुनाव ड्यूटी में तैनात कर्मचारी और चुनाव आयोग की ओर से निर्धारित अन्य श्रेणियों के मतदाता शामिल हैं।इसके अलावा, तय नियमों और पात्रता के आधार पर वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांग मतदाताओं को भी पोस्टल बैलेट से मतदान करने की सुविधा मिल सकती है।

राष्ट्रपति चुनाव में EVM की जगह बैलेट पेपर का इस्तेमाल

भारत में राष्ट्रपति का चुनाव आम नागरिक सीधे अपने वोट से नहीं करते। इस चुनाव में निर्वाचित सांसद और राज्यों के साथ-साथ दिल्ली और पुडुचेरी की संबंधित विधानसभाओं के निर्वाचित विधायक मतदान करते हैं।राष्ट्रपति चुनाव में EVM की जगह बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी मुख्य वजह इस चुनाव की अलग मतदान प्रक्रिया है। इसमें मतदाताओं को उम्मीदवारों के लिए अपनी पसंद के क्रम में वोट देना होता है।

EVM vs Ballot Paper: उम्मीदवारों के सामने लिखना होता है 1, 2 और 3

राष्ट्रपति चुनाव में मतदाता अपनी पहली पसंद के उम्मीदवार के नाम के सामने ‘1’ लिखता है। इसके बाद वह चाहे तो दूसरी पसंद के उम्मीदवार के सामने ‘2’ और तीसरी पसंद के उम्मीदवार के सामने ‘3’ लिख सकता है।इस चुनाव में वोटों की गिनती भी इसी प्राथमिकता के आधार पर होती है। चूंकि यहां सामान्य चुनावों की तरह केवल उम्मीदवार के सामने एक विकल्प चुनने की प्रक्रिया नहीं होती, इसलिए बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है।

EVM vs Ballot Paper: EVM के बावजूद कहां और क्यों होता है बैलेट पेपर?
EVM के बावजूद कहां और क्यों होता है बैलेट पेपर?
राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव में भी बैलेट पेपर

राज्यसभा और विधान परिषद (MLC) के चुनावों में भी बैलेट पेपर का इस्तेमाल होता है। इन चुनावों में विधायक मतदान करते हैं और सिंगल ट्रांसफरेबल वोट (Single Transferable Vote) प्रणाली अपनाई जाती है।इस व्यवस्था में मतदाता उम्मीदवारों को अपनी पसंद के अनुसार प्राथमिकता देते हैं। इसी वजह से इन चुनावों में कागजी मतपत्रों के जरिए मतदान कराया जाता है।हाल ही में अक्टूबर 2026 में उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों के लिए चुनाव हुए। इन चुनावों में भी बैलेट पेपर के जरिए वोटिंग कराई गई।

EVM vs Ballot Paper: पंचायत और नगर निकाय चुनावों में भी होता है इस्तेमाल

पंचायत और नगर निकाय चुनावों की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग की होती है। इन चुनावों में मतदान की प्रक्रिया पूरे देश में एक जैसी नहीं है।हर राज्य अपने कानूनों और नियमों के अनुसार स्थानीय निकाय चुनाव कराता है। कुछ राज्यों में इन चुनावों के लिए EVM का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि कुछ जगहों पर मतदाता बैलेट पेपर के जरिए अपना वोट डालते हैं।इसलिए स्थानीय निकाय चुनावों में मतदान का तरीका संबंधित राज्य की चुनाव व्यवस्था पर निर्भर करता है।

भारत में कब हुई थी EVM की शुरुआत?

भारत में पहला आम चुनाव 1951-52 में बैलेट पेपर के जरिए कराया गया था। उस समय मतदान करने का तरीका आज से काफी अलग था।शुरुआती दो आम चुनावों में हर उम्मीदवार के लिए अलग-अलग मतपेटियां रखी जाती थीं। मतदाता अपनी पसंद के उम्मीदवार की मतपेटी में वोट डालते थे। इसके बाद मतपत्र पर निशान लगाकर मतदान करने की व्यवस्था शुरू हुई।भारत में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल मई 1982 में केरल के परूर विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में किया गया था।इसके बाद धीरे-धीरे चुनावों में EVM का इस्तेमाल बढ़ता गया। साल 2004 के लोकसभा चुनाव में पहली बार देश की सभी 543 लोकसभा सीटों पर EVM के जरिए मतदान कराया गया। इसके बाद लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बैलेट पेपर की जगह EVM का इस्तेमाल आम हो गया।

EVM vs Ballot Paper: आखिर क्यों जरूरी है बैलेट पेपर की व्यवस्था?

भारत में हर चुनाव की प्रक्रिया एक जैसी नहीं होती। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, उसे विजेता घोषित किया जाता है।वहीं राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में प्राथमिकता के आधार पर मतदान और वोटों की गिनती होती है। इसी तरह राज्यसभा और विधान परिषद के चुनावों में भी अलग मतदान प्रणाली अपनाई जाती है।दूसरी ओर, पंचायत और नगर निकाय चुनावों का तरीका संबंधित राज्यों के कानूनों और नियमों के अनुसार तय होता है।यही वजह है कि देश के सभी चुनावों में EVM का इस्तेमाल अनिवार्य नहीं है। अलग-अलग संवैधानिक पदों और संस्थाओं के चुनाव के लिए अलग मतदान प्रक्रियाएं निर्धारित हैं। ऐसे में बैलेट पेपर आज भी भारतीय चुनाव व्यवस्था का एक जरूरी हिस्सा बना हुआ है।

क्या भविष्य में बैलेट पेपर से ही होंगे चुनाव?

भारत में EVM की जगह दोबारा बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग को लेकर कई बार सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई हैं। हालांकि, ऐसी कई याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं।वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि EVM सुरक्षित हैं और VVPAT के जरिए मतदाता अपने वोट की पुष्टि भी कर सकते हैं।मौजूदा चुनाव व्यवस्था में जहां उम्मीदवारों को प्राथमिकता के आधार पर वोट देना जरूरी होता है, वहां बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि देश से बैलेट पेपर पूरी तरह खत्म हो जाएंगे। इनका इस्तेमाल चुनाव की प्रक्रिया और लागू कानूनी नियमों के अनुसार जारी रह सकता है।