Darbhanga MLC Election: बिहार विधान परिषद की दरभंगा स्नातक सीट पर RJD के अनिल कुमार झा ने BJP के मौजूदा MLC सर्वेश कुमार को करीब 4,010 वोटों से हरा दिया। पहली वरीयता के वोटों से लेकर दूसरी पसंद की गिनती तक, इस मुकाबले में जातीय समीकरण और वोट ट्रांसफर की अहम भूमिका बताई जा रही है। आखिर BJP की बढ़त जीत में क्यों नहीं बदल सकी? समझिए पूरा चुनावी गणित।
दरभंगा MLC चुनाव में क्या हुआ?
बिहार विधान परिषद की आठ सीटों पर हुए चुनाव में दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का मुकाबला सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। यहां RJD के अनिल कुमार झा ने BJP के मौजूदा MLC सर्वेश कुमार को लगभग 4,010 वोटों से हरा दिया। मतगणना 56 घंटे से अधिक समय तक चली। कई दौर की गिनती और उम्मीदवारों के बाहर होने के बाद दूसरी वरीयता के वोटों ने नतीजे की तस्वीर बदल दी।
Darbhanga MLC Election: पहली पसंद के वोटों में क्या था समीकरण?
पहली वरीयता के वोटों में मुकाबला काफी दिलचस्प रहा। इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार इम्तियाज नूरानी को 10 हजार से अधिक वोट मिलने की बात सामने आई। इसे मुस्लिम मतदाताओं के बीच वोटों के बंटवारे के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, केवल किसी निर्दलीय उम्मीदवार को मिले वोटों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि मुस्लिम मतदाताओं का पूरा वोट बैंक RJD से दूर हो गया। इसके लिए उम्मीदवारवार और क्षेत्रवार आंकड़ों की जरूरत है।
क्या RJD का MY समीकरण कमजोर पड़ा?
बिहार की राजनीति में मुस्लिम-यादव यानी MY समीकरण लंबे समय से RJD की ताकत माना जाता रहा है। लेकिन दरभंगा के इस चुनाव ने इस पारंपरिक समीकरण पर चर्चा तेज कर दी है। चुनावी विश्लेषण में यह सवाल उठ रहा है कि क्या मुस्लिम मतदाताओं के एक हिस्से ने RJD के बजाय निर्दलीय या दूसरे विकल्पों को चुना? वरिष्ठ पत्रकार सुभाष शर्मा के मुताबिक, बिहार में मुस्लिम वोटों का बिखराव पहले भी देखने को मिला है। उनके विश्लेषण में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को भी एक संभावित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

Darbhanga MLC Election: यादवों के वोट से कैसे जीते अनिल झा?
इस चुनाव का सबसे अहम पहलू दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती को माना जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रह्मदेव यादव और रवींद्र यादव जैसे उम्मीदवारों के मुकाबले से बाहर होने के बाद उनके मतदाताओं की दूसरी पसंद के वोट अनिल कुमार झा के पक्ष में गए। यहीं से चुनावी गणित बदलने की बात कही जा रही है। पहली वरीयता में अलग-अलग उम्मीदवारों के बीच बंटे वोट दूसरी वरीयता की गिनती में अनिल झा को फायदा पहुंचा सकते थे। इस तरह RJD के ब्राह्मण उम्मीदवार को यादव मतदाताओं की दूसरी पसंद का समर्थन मिलने की राजनीतिक व्याख्या सामने आई। हालांकि, यह दावा कि यादव समाज के वोट एकमुश्त अनिल झा को मिले, वास्तविक उम्मीदवारवार ट्रांसफर आंकड़ों से ही साबित हो सकता है।
दूसरी वरीयता के वोट क्या होते हैं?
स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के MLC चुनाव में एकल संक्रमणीय मत प्रणाली यानी सिंगल ट्रांसफरेबल वोट (STV) का इस्तेमाल होता है। इसमें मतदाता उम्मीदवारों को अपनी पसंद के क्रम में वोट देते हैं। पहली पसंद के उम्मीदवार को प्राथमिकता मिलती है। यदि कोई उम्मीदवार जरूरी कोटा हासिल नहीं कर पाता और मुकाबले से बाहर हो जाता है, तो नियमों के अनुसार उसके मतपत्रों पर दर्ज अगली वरीयता के वोट दूसरे उम्मीदवारों को मिल सकते हैं। यही वजह है कि ऐसे चुनावों में केवल पहली पसंद के वोटों से जीत-हार तय नहीं होती। दूसरी और आगे की वरीयताओं के वोट भी निर्णायक बन सकते हैं।
Darbhanga MLC Election: मतगणना के दौरान क्यों हुआ विवाद?
मतगणना के दौरान RJD ने चुनाव आयोग और जिला प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए। पार्टी का दावा था कि करीब 10 प्रतिशत बैलेट पेपर जानबूझकर अवैध घोषित किए गए। लहेरियासराय मतगणना केंद्र पर RJD कार्यकर्ताओं ने विरोध भी किया। हालांकि, ये पार्टी के आरोप हैं। इन्हें प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। इस मामले में आरोपों की पुष्टि के लिए आधिकारिक जांच या संबंधित चुनावी दस्तावेजों की जानकारी जरूरी है।
BJP की हार से बिहार की राजनीति को क्या संदेश मिला?
दरभंगा MLC चुनाव का नतीजा बताता है कि वरीयता आधारित चुनावों में पहली पसंद के वोटों के साथ दूसरी पसंद का गणित भी बेहद अहम होता है। RJD ने ब्राह्मण उम्मीदवार को मैदान में उतारा और अंतिम दौर में मिले समर्थन ने उसे जीत दिलाई। इस परिणाम को RJD के लिए सामाजिक समीकरणों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। वहीं BJP के लिए यह सवाल खड़ा हुआ है कि पहली वरीयता के वोटों में मिली बढ़त अंतिम नतीजे में क्यों नहीं बदल सकी। इस चुनाव का सबसे बड़ा सबक यही है कि MLC चुनाव में केवल जातीय समीकरण या पहली पसंद के वोट नहीं, बल्कि मतपत्र पर दर्ज अगली पसंद भी जीत-हार तय कर सकती है।








