Brijbhushan Sharan Statement: उत्तर प्रदेश में बढ़ते वायु प्रदूषण के बीच बीजेपी के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने एक बार फिर सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। इस बार उनके निशाने पर पराली जलाने की घटनाएं हैं। उन्होंने दावा किया कि पराली जलाने से निकलने वाला धुआं दिवाली के पटाखों, वाहनों और औद्योगिक गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण के मुकाबले कहीं ज्यादा खतरनाक है। उन्होंने यहां तक कहा कि पराली जलाने से होने वाला प्रदूषण 100 गुना तक अधिक है। साथ ही सवाल उठाया कि रोक लगाने के लिए कानून और निगरानी की व्यवस्था होने के बावजूद खेतों में पराली क्यों जलाई जा रही है?
बृजभूषण का बयान कई बार पार्टी के खिलाफ दे चुके है
बृजभूषण का यह बयान इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वह पहले भी कई मुद्दों पर सरकार और पार्टी से जुड़े नेताओं के सामने अपनी अलग राय रख चुके हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वह बार-बार सरकारों की कार्यप्रणाली पर सवाल क्यों उठाते हैं? क्या यह उनकी बेबाक राजनीतिक शैली है या फिर इसके पीछे कोई सियासी संदेश भी छिपा है? आइए समझते हैं पूरा मामला।
Brijbhushan Sharan Statement: पराली जलाने पर क्या बोले बृजभूषण शरण सिंह?
गोंडा में मीडिया से बातचीत के दौरान बृजभूषण शरण सिंह ने पराली जलाने की घटनाओं पर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि हेलीकॉप्टर से यात्रा के दौरान उन्हें बस्ती, गोरखपुर और गोंडा समेत प्रदेश के कई इलाकों में खेतों में पराली जलती दिखाई दी। उनका कहना था कि जब पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए कानून मौजूद हैं और ड्रोन के जरिए निगरानी का प्रावधान भी है, तो फिर इस पर प्रभावी नियंत्रण क्यों नहीं हो पा रहा है? उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिम्मेदार अधिकारी इस समस्या को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। उनके मुताबिक, प्रशासन चाहे तो पराली जलाने की घटना के 15 से 20 दिन बाद भी यह पता लगा सकता है कि किस खेत में फसल के अवशेष जलाए गए थे।
बृजभूषण ने फैक्ट्रियों, वाहनों और ईंट-भट्ठों से निकलने वाले धुएं पर भी कार्रवाई की जरूरत बताई। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारों का ध्यान पराली जलाने की समस्या पर उतना नहीं है, जितना होना चाहिए। हालांकि, पराली के धुएं को 100 गुना ज्यादा प्रदूषक बताने वाला उनका दावा है, इसे प्रमाणित वैज्ञानिक आंकड़े के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
आखिर क्या है पराली जलाने की समस्या?
धान की फसल कटने के बाद खेतों में उसके डंठल और दूसरे अवशेष बच जाते हैं। इन्हें पराली कहा जाता है। अगली फसल की बुवाई के लिए खेत को जल्दी तैयार करने के उद्देश्य से कुछ किसान इन अवशेषों को जला देते हैं। इससे निकलने वाला धुआं वातावरण में प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ाता है।
सर्दियों की शुरुआत में यह समस्या ज्यादा गंभीर हो सकती है। इस दौरान हवा की गति कम होने और मौसम की परिस्थितियों के कारण प्रदूषक कण लंबे समय तक वातावरण में बने रह सकते हैं। इसका असर हवा की गुणवत्ता के साथ-साथ लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। पराली जलाने से केवल वायु प्रदूषण ही नहीं बढ़ता, बल्कि मिट्टी में मौजूद जैविक पदार्थ और पोषक तत्व भी प्रभावित होते हैं। इसलिए कृषि विशेषज्ञ पराली को जलाने के बजाय उसका प्रबंधन करने की सलाह देते हैं। इसके लिए हैप्पी सीडर, सुपर सीडर और अन्य कृषि यंत्रों की मदद ली जा सकती है। इनसे फसल के अवशेषों को खेत में ही उपयोग करने के विकल्प मिलते हैं।
Brijbhushan Sharan Statement: सरकारों पर सवाल उठाना बृजभूषण की पुरानी शैली?
बृजभूषण शरण सिंह का ताजा बयान कोई पहला मौका नहीं है, जब उन्होंने अपनी पार्टी या सरकार से जुड़े किसी मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से अलग राय रखी हो। वह अपने बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं। कई बार उनके बयान राजनीतिक चर्चा का विषय बने हैं।
जनवरी 2026 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए दिशानिर्देशों को लेकर भी उन्होंने खुलकर विरोध जताया था। उन्होंने इन दिशा-निर्देशों को भारतीय परंपराओं के अनुरूप नहीं बताते हुए अपनी आपत्ति जाहिर की थी। इस बयान के जरिए उन्होंने एक बार फिर यह संकेत दिया कि कुछ नीतिगत मुद्दों पर वह अपनी अलग राय सार्वजनिक करने से पीछे नहीं हटते। हालांकि, किसी नीति या सरकारी फैसले का विरोध करना अपने आप में पार्टी से दूरी या राजनीतिक मतभेद का प्रमाण नहीं है। बृजभूषण के बयानों को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि वह किस मुद्दे पर बोल रहे हैं और उनकी आपत्ति का आधार क्या है।

योगी सरकार से रिश्तों को लेकर भी रही चर्चा
बृजभूषण शरण सिंह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संबंध भी समय-समय पर राजनीतिक चर्चा में रहे हैं। जुलाई 2025 में दोनों नेताओं की करीब 31 महीने बाद मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात के बाद बृजभूषण ने कहा था कि जनवरी 2023 से उनकी मुख्यमंत्री से बातचीत नहीं हुई थी। उन्होंने मुलाकात को व्यक्तिगत बताया और कहा कि इसमें राजनीतिक चर्चा नहीं हुई।
इस मुलाकात से पहले भी दोनों नेताओं के संबंधों को लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएं होती रही थीं। मीडिया रिपोर्टों में इसे प्रदेश की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तौर पर देखा गया था। हालांकि, मुलाकात के बाद बृजभूषण ने किसी राजनीतिक विवाद की पुष्टि नहीं की थी। यही वजह है कि जब भी वह सरकार या प्रशासन पर सवाल उठाते हैं, तो उनके बयान को राजनीतिक संदर्भ में भी देखा जाने लगता है। लेकिन हर आलोचना को मुख्यमंत्री या सरकार से नाराजगी का संकेत मानना सही नहीं होगा।
क्या सरकारों की आलोचना करना राजनीतिक रणनीति है?
बृजभूषण शरण सिंह के बयानों को लेकर एक सवाल यह भी उठता है कि क्या वह जानबूझकर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाकर अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाए रखना चाहते हैं? इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब उनके हालिया बयान से नहीं मिलता। उनकी राजनीति का एक पहलू यह है कि वह लंबे समय से गोंडा और आसपास के क्षेत्रों में सक्रिय रहे हैं।
स्थानीय मुद्दों, प्रशासनिक कामकाज और जनसमस्याओं पर उनकी टिप्पणियां अक्सर चर्चा में रहती हैं। ऐसे में पराली जलाने का मुद्दा भी उनके लिए स्थानीय अनुभव और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा हो सकता है। दूसरी ओर, सार्वजनिक जीवन में किसी नेता का अपनी ही पार्टी की सरकार के फैसलों या कामकाज पर सवाल उठाना राजनीतिक संदेश भी दे सकता है। लेकिन इसके पीछे किसी खास रणनीति या नाराजगी का दावा करने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी हैं। फिलहाल बृजभूषण ने अपने बयान में प्रदूषण और पराली जलाने पर कार्रवाई की कमी को ही मुख्य मुद्दा बनाया है।
पराली पर रोक के लिए क्या कर सकती हैं सरकारें?
पराली जलाने की समस्या का समाधान केवल किसानों पर कार्रवाई करने से नहीं होगा। इसके लिए सरकार, प्रशासन और किसानों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है। किसानों को फसल अवशेषों के प्रबंधन के लिए पर्याप्त मशीनें और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है। प्रशासन को गांव स्तर पर निगरानी व्यवस्था मजबूत करनी होगी। जिन क्षेत्रों में पराली जलाने की घटनाएं अधिक होती हैं, वहां किसानों को जागरूक करने के साथ वैकल्पिक उपायों की जानकारी भी दी जानी चाहिए। ड्रोन और अन्य तकनीकों से निगरानी तभी प्रभावी होगी, जब उसके आधार पर समय पर कार्रवाई भी हो।
इसके अलावा पराली को पशुचारे, जैविक खाद और ऊर्जा उत्पादन जैसे विकल्पों में इस्तेमाल करने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। इससे किसानों को फसल अवशेषों से निपटने का व्यावहारिक विकल्प मिलेगा और खेतों में आग लगाने की जरूरत कम हो सकती है।
Brijbhushan Sharan Statement: बृजभूषण के बयान से फिर क्यों शुरू हुई चर्चा?
बृजभूषण शरण सिंह के ताजा बयान ने दो मुद्दों को एक साथ चर्चा में ला दिया है। पहला, उत्तर भारत में बढ़ता वायु प्रदूषण और पराली जलाने की समस्या। दूसरा, अपनी पार्टी से जुड़े नेताओं द्वारा सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाना।
उनके बयान का राजनीतिक अर्थ क्या है, यह स्पष्ट नहीं है। लेकिन उन्होंने जिन सवालों को उठाया है, वे प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े हैं। कानून होने के बावजूद पराली जलाने की घटनाएं क्यों जारी हैं? निगरानी व्यवस्था का इस्तेमाल कितना प्रभावी है? किसानों को पराली प्रबंधन के विकल्प कितनी आसानी से मिल रहे हैं? इन सवालों का जवाब सरकार और प्रशासन को देना होगा। फिलहाल बृजभूषण शरण सिंह का बयान एक बार फिर सुर्खियों में है। यह देखना अहम होगा कि सरकार और प्रशासन पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाते हैं। क्योंकि प्रदूषण का मुद्दा किसी एक राजनीतिक दल या नेता तक सीमित नहीं, बल्कि आम लोगों की सेहत और पर्यावरण से जुड़ा सवाल है।
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