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कांग्रेस के इस एक फैसले ने उड़ाई मायावती की नींद? कांशीराम जयंती के बहाने दलित वोटबैंक पर कब्जे की तैयारी में राहुल!

UP Election 2027

UP Election 2027: उत्तर प्रदेश में होने वाले 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए सियासी दलों ने अपनीअपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। इसी कड़ी में कांग्रेस ने बहुजन आंदोलन के बड़े नेता कांशीराम की जयंती के जरिए दलित और पिछड़े वोटबैंक तक पहुंच बनाने की तैयारी की है। पार्टी ने फैसला किया है कि 15 मार्च को कांशीराम के जन्मदिन को सामाजिक परिवर्तन दिवस के रूप में मनाया जाएगा और इसके तहत एक सप्ताह तक विभिन्न सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। आपको बता दें कि इस अभियान की शुरुआत 13 मार्च को लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के जुपिटर हॉल में होने वाले कार्यक्रम से होगी। इस कार्यक्रम में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी मुख्य वक्ता के रूप में हिस्सा लेंगे। कार्यक्रम में दलित और पिछड़े समाज के विचारकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को भी आमंत्रित किया गया है।

दलित वोटबैंक को साधने की कोशिश

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक कांग्रेस का यह कार्यक्रम सीधे तौर पर 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव की रणनीति से जुड़ा हुआ माना जा रहा है। पार्टी को लगता है कि बहुजन राजनीति के जनक माने जाने वाले कांशीराम की विचारधारा से जुड़े मतदाताओं को फिर से अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है। कांग्रेस का मानना है कि मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी पिछले कुछ समय से काफी कम सक्रिय दिखाई दे रही है। ऐसे में दलित वोटबैंक का एक बड़ा हिस्सा नई राजनीतिक दिशा की तलाश में हो सकता है, जिसे कांग्रेस अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है।

UP Election 2027: जिसकी जितनी संख्या भारी का मुद्दा

राहुल गांधी पिछले कुछ समय से जातिगत जनगणना और जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी जैसे मुद्दों को लगातार उठा रहे हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि इन मुद्दों के जरिए वह दलित और पिछड़े वर्ग के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर सकेगी। लोकसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने यह भी कहा था कि अगर भारतीय जनता पार्टी को 400 से ज्यादा सीटें मिलती हैं तो संविधान में बदलाव की कोशिश हो सकती है। इस मुद्दे को भी विपक्ष ने चुनावी अभियान में जोरशोर से उठाया था।

कांशीराम की जयंती को लेकर अन्य दल भी सक्रिय हो गए हैं। समाजवादी पार्टी ने ऐलान किया है कि वह इस दिन को बड़े स्तर पर पीडीए दिवस (पिछड़ादलितअल्पसंख्यक) के रूप में मनाएगी। हालांकि मायावती ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव की आलोचना की है और इसे राजनीतिक नाटक बताया है। मायावती का कहना है कि समाजवादी पार्टी का रवैया हमेशा बहुजन समाज के नेताओं और प्रतीकों के प्रति सम्मानजनक नहीं रहा है।

यूपी की राजनीति में कांशीराम की अहमियत

साल 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना करने वाले कांशीराम को उत्तर प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में दलित और पिछड़े समुदायों को एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में संगठित करने का श्रेय दिया जाता है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उनकी जयंती को लेकर बढ़ती राजनीतिक गतिविधियां यह संकेत दे रही हैं कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की सियासत में दलित वोटबैंक सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है।

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