Politics: भारत में आज दलबदल विरोधी कानून लोकतंत्र को स्थिर बनाए रखने का एक अहम आधार माना जाता है, लेकिन इसके पीछे एक लंबा और उथल-पुथल भरा इतिहास रहा है। देश ने एक ऐसा दौर भी देखा है जब सरकारें लगातार गिर रही थीं और जनता के मन में लोकतंत्र की स्थिरता को लेकर सवाल खड़े होने लगे थे। 1967 से 1971 के बीच का समय राजनीतिक अस्थिरता का चरम था, जब केवल चार वर्षों में 45 सरकारें बनीं और बिगड़ीं। इस दौरान 16 बार राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा और 1800 से अधिक विधायकों ने दल बदल लिए। कई मामलों में दलबदल करने वाले नेताओं को मंत्री पद देकर पुरस्कृत किया गया, जिससे राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ जैसी स्थिति पैदा हो गई।
गठबंधन दौर और अस्थिर राजनीति की शुरुआत
1967 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस कई राज्यों में बहुमत खो बैठी, जिसके बाद विभिन्न दलों के गठबंधन से सरकारें बनीं। इन ‘संविद सरकारों’ में वैचारिक रूप से बिल्कुल अलग-अलग दल शामिल थे, जिनमें दक्षिणपंथी और वामपंथी पार्टियां एक साथ थीं। विचारधारा में इस टकराव के कारण सरकारों में स्थिरता नहीं रही और अंतर्विरोध बढ़ते गए। केंद्र में बैठी सरकार पर भी आरोप लगे कि उसने राज्यपालों के माध्यम से इन सरकारों को अस्थिर करने में भूमिका निभाई, जिससे दलबदल को और बढ़ावा मिला।
Politics: हरियाणा से शुरू हुआ ‘आया राम, गया राम’ का दौर
दलबदल की राजनीति का सबसे चर्चित उदाहरण हरियाणा से सामने आया, जहां 1967 में विधायक गया लाल ने कुछ ही घंटों में तीन बार पार्टी बदली। इस घटना के बाद ‘आया राम, गया राम’ मुहावरा भारतीय राजनीति में प्रचलित हो गया। इसी दौरान कई नेताओं ने सत्ता पाने के लिए अपनी ही पार्टी तोड़ दी और नई सरकारें बना लीं। यह दौर इतना अस्थिर था कि कई सरकारें कुछ दिनों या महीनों में ही गिर गईं।
Politics: बिहार से पंजाब तक एक जैसी स्थिति
इस अवधि में बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में सरकारें बार-बार बदलीं। बिहार में 1967 से 1971 के बीच नौ बार मुख्यमंत्री बदले गए, जबकि उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में भी बार-बार सत्ता परिवर्तन हुआ। विधायकों के दल बदलने का सिलसिला इतना तेज था कि कई बार वे सुबह एक पार्टी में होते और शाम तक दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते। इससे शासन व्यवस्था पर गहरा असर पड़ा और प्रशासनिक स्थिरता पूरी तरह कमजोर हो गई।
राजनीति में पद और सत्ता का खेल
उस समय दलबदल सिर्फ राजनीतिक विचारधारा का मामला नहीं रहा, बल्कि सत्ता और पद हासिल करने का जरिया बन गया। आंकड़े बताते हैं कि दलबदल करने वाले लगभग हर आठवें विधायक को मंत्री पद मिला। इससे साफ हो गया कि राजनीतिक निष्ठा से ज्यादा महत्व सत्ता और लाभ को दिया जा रहा था। इसी कारण सरकारें बार-बार गिरती रहीं और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल उठने लगे।
एंटी-डिफेक्शन कानून का जन्म
Politics: लगातार अस्थिरता और दलबदल की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए 1968 में एक समिति का गठन किया गया, जिसने इस पर सख्त कानून बनाने की सिफारिश की। इन सिफारिशों के आधार पर 1985 में राजीव गांधी सरकार ने दलबदल विरोधी कानून लागू किया, जिसे बाद में 2003 में संशोधित कर और मजबूत बनाया गया। आज यह कानून राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, हालांकि हाल के राजनीतिक घटनाक्रम यह दिखाते हैं कि दलबदल का मुद्दा अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।








