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सुप्रीम कोर्ट का फैसला, पितृत्व अवकाश को मान्यता देने की सिफारिश

Supreme court: देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार से कहा है कि पितृत्व अवकाश (पैटरनिटी लीव) को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने पर विचार किया जाए। अदालत ने जोर देकर कहा कि बच्चे की परवरिश सिर्फ मां की जिम्मेदारी नहीं है, पिता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है और उसे नजरअंदाज करना अन्याय होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी ऐसे समय की जब उसने गोद लेने वाले बच्चों के मामलों में मातृत्व अवकाश से जुड़ा एक पुराना नियम रद्द किया। अब अदालत के अनुसार, चाहे बच्चा किसी भी उम्र का क्यों न हो, गोद लेने वाली मां को 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलेगा।

Supreme court: लैंगिक समानता और साझा जिम्मेदारी

न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और आर महादेवन की बेंच ने कहा कि पितृत्व अवकाश लैंगिक भूमिकाओं को तोड़ने, पिता को बच्चे की देखभाल में सक्रिय भूमिका निभाने और परिवार व कार्यस्थल में समानता बढ़ाने में मदद करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे के भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक विकास में मां की भूमिका निस्संदेह अहम है, लेकिन पिता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे की परवरिश साझा जिम्मेदारी है, जिसे केवल मां या पिता अकेले नहीं निभा सकते। समाज अक्सर मां को बच्चे के जीवन में सबसे जरूरी मानता है, जबकि पिता की भूमिका को अक्सर कम आंकता है। अदालत ने इस सोच को बदलने पर जोर दिया।

पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा का दर्जा

Supreme court: अदालत ने सरकार से अनुरोध किया कि पितृत्व अवकाश को एक सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में लागू किया जाए। साथ ही यह सुझाव दिया कि अवकाश की अवधि इस तरह निर्धारित की जाए कि यह माता-पिता और बच्चे दोनों की जरूरतों के अनुकूल हो।

 

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