Oil Crisis: कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और तेल कंपनियों पर बढ़ते दबाव के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर 10 रुपए प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी घटाने का फैसला लिया है। इस कदम से जहां आम लोगों को महंगाई से कुछ राहत मिलने की उम्मीद है, वहीं सरकार के राजस्व पर बड़ा असर पड़ सकता है। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी हुई हैं।
आम लोगों और कंपनियों को कैसे मिलेगा फायदा
सरकार के इस फैसले से तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) को बढ़ती लागत से राहत मिलेगी। इससे वे तुरंत कीमतें बढ़ाए बिना संतुलन बनाए रख सकेंगी। आम उपभोक्ताओं के लिए इसका सीधा फायदा यह होगा कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अचानक उछाल से बचाव होगा। चूंकि ईंधन की कीमतें परिवहन लागत को प्रभावित करती हैं, इसलिए इससे रोजमर्रा की चीजों की महंगाई पर भी कुछ हद तक नियंत्रण संभव है।
Oil Crisis: सरकार के राजस्व पर पड़ेगा बड़ा असर
पेट्रोलियम सेक्टर सरकार के लिए आय का बड़ा स्रोत है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के अनुसार, 2023-24 में इस सेक्टर से 7.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक टैक्स रेवेन्यू मिला। इसमें केंद्र को एक्साइज ड्यूटी से करीब 2.7 से 3 लाख करोड़ और राज्यों को वैट से 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की आय हुई। अनुमान है कि एक्साइज ड्यूटी में प्रति लीटर 1 रुपए की कटौती से 14,000 से 16,000 करोड़ रुपए का नुकसान होता है। ऐसे में 10 रुपए की कटौती से करीब 1.5 लाख करोड़ रुपए के राजस्व पर असर पड़ सकता है।
टैक्स ढांचा और राज्यों की चिंता
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में केंद्र और राज्य दोनों के टैक्स शामिल होते हैं। केंद्र एक्साइज ड्यूटी और सेस लगाता है, जबकि राज्य वैट या सेल्स टैक्स वसूलते हैं। दिल्ली जैसे शहरों में पेट्रोल की कीमत में लगभग 43 प्रतिशत और डीजल में करीब 37 प्रतिशत हिस्सा केंद्रीय टैक्स का होता है।
हालांकि, एक्साइज ढांचे में सेस और सरचार्ज का हिस्सा बढ़ने से राज्यों को मिलने वाला हिस्सा सीमित हो गया है, जिसे लेकर वे चिंता जताते रहे हैं।
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