Home » नई दिल्ली » SIR पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, बोला फ्री एंड फेयर चुनाव से बड़ा कुछ नहीं!

SIR पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, बोला फ्री एंड फेयर चुनाव से बड़ा कुछ नहीं!

SIR पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, बोला फ्री एंड फेयर चुनाव से बड़ा कुछ नहीं!

SIR Supreme Court Verdict: देश की चुनावी राजनीति से जुड़े सबसे अहम मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (27 मई) को बड़ा फैसला सुनाते हुए बिहार में चल रही SIR यानी “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन” प्रक्रिया को वैध और संवैधानिक करार दे दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि चुनाव आयोग ने अपनी संवैधानिक शक्तियों के दायरे में रहकर काम किया है और पूरी प्रक्रिया को गैर-संवैधानिक नहीं कहा जा सकता।चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने कहा कि निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव लोकतंत्र की सबसे बड़ी जरूरत है और मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि “फ्री एंड फेयर इलेक्शन लोकतंत्र की आत्मा है।

क्या है SIR और क्यों शुरू हुआ विवाद?

बिहार में चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR शुरू किया था। इस प्रक्रिया का मकसद वोटर लिस्ट को अपडेट करना और यह सुनिश्चित करना था कि सूची में केवल पात्र और वैध मतदाता ही शामिल रहें।
लेकिन इस प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि चुनाव आयोग अपनी सीमाओं से आगे बढ़कर लोगों से नागरिकता साबित करवाने की कोशिश कर रहा है। उनका कहना था कि 2002 या 2003 की पुरानी वोटर लिस्ट में नाम न होने वाले लोगों पर अतिरिक्त दस्तावेजों का दबाव डाला जा रहा है, जिससे गरीब, प्रवासी और कमजोर वर्ग प्रभावित हो सकते हैं।

SIR Supreme Court Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के पक्ष में क्या कहा?

लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने का पूरा अधिकार है और SIR उसी प्रक्रिया का हिस्सा है।
अदालत ने कहा कि सिर्फ इसलिए किसी प्रक्रिया को अवैध नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह सामान्य रिवीजन प्रक्रिया से अलग है। कोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग ने अपनी संवैधानिक शक्तियों के भीतर रहकर कदम उठाए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि दस्तावेजों की जांच करना और उनकी विश्वसनीयता के आधार पर फैसला लेना चुनाव आयोग का अधिकार है। अगर दस्तावेज संदिग्ध लगते हैं तो आयोग किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में शामिल करने से इनकार कर सकता है और इसे मनमाना फैसला नहीं कहा जा सकता।

SIR Supreme Court Verdict: नाम कटना नियम विरुद्ध नहीं

सुनवाई के दौरान यह दलील भी दी गई कि SIR के दौरान लोगों के नाम गलत तरीके से काटे जा रहे हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपने पुराने निवास स्थान से कहीं और चला गया है, तब भी उसके रिकॉर्ड की जांच पुरानी सूची के आधार पर की जा सकती है।कोर्ट ने साफ कहा कि SIR प्रक्रिया में नाम हटाए जाने को अपने आप में नियम विरुद्ध नहीं माना जा सकता। अदालत के मुताबिक चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए कदम जरूरत के मुताबिक थे और उनका उद्देश्य वोटर लिस्ट को अधिक विश्वसनीय बनाना था।सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग का काम किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करना नहीं है। अदालत ने कहा कि आयोग केवल मतदाता सूची की वैधता सुनिश्चित करता है।
हालांकि कोर्ट ने यह जरूर कहा कि अगर किसी मामले में गंभीर संदेह हो तो चुनाव आयोग उसे केंद्र सरकार के पास भेज सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं लगाया जा सकता कि चुनाव आयोग खुद नागरिकता तय कर रहा है।

संविधान की कसौटी पर खरा उतरा SIR

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि SIR प्रक्रिया संविधान और RP एक्ट की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती है। अदालत के मुताबिक इतनी बड़ी और विस्तृत प्रक्रिया को लागू करने के लिए चुनाव आयोग को नियम और प्रक्रिया तय करने का अधिकार है।
कोर्ट ने माना कि लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए मतदाता सूची की शुद्धता बेहद जरूरी है और चुनाव आयोग इस दिशा में जरूरी कदम उठा सकता है।सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को चुनाव आयोग के लिए बड़ी कानूनी राहत माना जा रहा है। वहीं विपक्षी दलों और याचिकाकर्ताओं को इससे बड़ा झटका लगा है।इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव सबसे ऊपर है और अगर मतदाता सूची को साफ और विश्वसनीय बनाने के लिए चुनाव आयोग विशेष प्रक्रिया अपनाता है तो उसे केवल राजनीतिक विवाद बनाकर खारिज नहीं किया जा सकता।

ये भी पढ़े: बिहार SIR पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी मुहर, EC की कार्रवाई को बताया पूरी तरह वैध

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments