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TMC में बढ़ा सियासी संकट, ममता गुट ने आठ बागी विधायकों को पार्टी से निकाला

Mamata Banerjee:

Mamata Banerjee: पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक कलह अब खुलकर सामने आ गई है। पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर छिड़ी लड़ाई ने बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने मंगलवार को पूर्व मंत्री फिरहाद हकीम समेत आठ बागी विधायकों को पार्टी से निष्कासित कर दिया। यह कार्रवाई उस घटनाक्रम के एक दिन बाद हुई, जब बागी नेताओं ने ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने और वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को नया अध्यक्ष घोषित करने का दावा किया था।

बागी नेताओं पर पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप

तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक गुट ने बागी नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। पार्टी का आरोप है कि संबंधित नेता जानबूझकर संगठन विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे हैं और पार्टी की एकता को नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। नोटिस के कुछ घंटों बाद ही फिरहाद हकीम, जावेद अहमद खान, अरूप रॉय, रथिन घोष, बिप्लब मित्रा, सबीना यास्मीन, अरूप बिस्वास और स्नेहाशीष चक्रवर्ती को पार्टी से बाहर कर दिया गया।

Mamata Banerjee: बागी खेमे ने घोषित किया नया नेतृत्व

सोमवार को विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बागी गुट ने एक विशेष बैठक आयोजित कर नए नेतृत्व ढांचे की घोषणा की। इस दौरान अरूप रॉय को सर्वसम्मति से पार्टी का नया अध्यक्ष चुने जाने का दावा किया गया। साथ ही पूर्व मंत्री फिरहाद हकीम और अरूप बिस्वास को उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दिए जाने की घोषणा की गई। बागी नेताओं ने एक 30 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारी समिति के गठन का भी ऐलान किया।

समर्थन को लेकर बागी नेताओं का बड़ा दावा

बागी खेमे का दावा है कि उन्हें तृणमूल कांग्रेस के 80 में से कम से कम 60 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। इसके अलावा पार्टी के कई सांसदों के भी उनके साथ होने का दावा किया गया है। बागी नेताओं का कहना है कि आने वाले दिनों में जिला स्तर पर भी नई समितियों और नेतृत्व संरचना का गठन किया जाएगा।

Mamata Banerjee: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल

तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ते इस टकराव ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। एक ओर ममता बनर्जी का गुट संगठन पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर बागी नेता खुद को पार्टी के वास्तविक प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह विवाद आगे बढ़ता है तो इसका असर राज्य की राजनीति और तृणमूल कांग्रेस की संगठनात्मक स्थिति पर पड़ सकता है।

 

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