MP News : शादी टूट रही थी। वो अलग रह रही थीं। और इसी बीच पता चला कि वो 13 हफ्ते की गर्भवती हैं। अब सवाल था कि इस रिश्ते के साथ इस गर्भ का क्या करें। पति चाहता था बच्चा रहे। पत्नी नहीं चाहती थीं। इस उलझन का जवाब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने 23 जून को दे दिया। कोर्ट ने साफ कहा, फैसला महिला का होगा। हाईकोर्ट ने 13 हफ्ते की गर्भवती महिला को गर्भपात की इजाजत दे दी। साथ में एक लाइन जोड़ी जो आगे के लिए नजीर बनेगी।

किसी महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ गर्भ रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। गर्भ जारी रखना है या नहीं, ये सिर्फ महिला तय करेगी। इसमें पति की सहमति जरूरी नहीं है कोर्ट ने कहा कि महिला की गरिमा, उसका मानसिक स्वास्थ्य और उसकी निजी आजादी संविधान से मिले अधिकार हैं।
MP कोर्ट का मामला
ये इंदौर के एक हाई प्रोफाइल दंपती का केस है। शादी को दो साल हुए थे। मतभेद बढ़े तो पत्नी अलग रहने लगी। अलग होने के बाद पता चला कि वो प्रेग्नेंट हैं। रिश्ता पहले ही खत्म हो चुका था। इसलिए महिला ने तय किया कि वो इस गर्भावस्था को आगे नहीं ले जाना चाहती, लेकिन कानूनन इजाजत के लिए वो हाईकोर्ट पहुंचीं।
क्या कहता है कानून?
कोर्ट ने MTP एक्ट 1971 का हवाला दिया। इस कानून के मुताबिक 24 हफ्ते तक महिला खुद तय कर सकती है कि वो गर्भ रखना चाहती है या नहीं। इस महिला की गर्भावस्था 13 हफ्ते और एक दिन की थी। यानी वो कानूनी सीमा के अंदर थी। इसलिए अधिकृत डॉक्टर अब कानून के अनुसार प्रक्रिया कर सकते हैं। कोर्ट ने ये भी कहा कि अनचाही गर्भावस्था का शारीरिक और मानसिक असर सबसे ज्यादा महिला पर ही पड़ता है। इसलिए आखिरी फैसला भी उसी का होना चाहिए।
इस फैसले से क्या बदलेगा?
ये फैसला सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं है। ये हर उस महिला के लिए है जो रिश्ते, हालात या अपनी मर्जी की वजह से मां नहीं बनना चाहती। HC ने आज ये साफ कर दिया कि शरीर महिला का है। तो उस पर हक भी उसी का है। मां बनना एक अधिकार है, कोई मजबूरी नहीं।
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Written By : Mansi Sharma








