2nd Class Railway: भारतीय रेलवे में यात्रियों के सम्मान, सुरक्षा और व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अदालत ने रेलवे के दस्तावेजों में इस्तेमाल होने वाले ‘सेकंड क्लास पैसेंजर’ (द्वितीय श्रेणी यात्री) शब्द पर आपत्ति जताई और इसे संविधान की समानता की भावना के विपरीत बताया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि श्रेणी का संबंध यात्री से नहीं, बल्कि उस कोच से होना चाहिए जिसमें वह यात्रा कर रहा है।
‘सेकंड क्लास पैसेंजर’ शब्द पर कोर्ट की सख्ती
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि भारत के सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ में किसी व्यक्ति को “सेकंड क्लास” कहना उचित नहीं है। अदालत ने सुझाव दिया कि भविष्य में रेलवे दस्तावेजों और रिकॉर्ड में श्रेणी का उल्लेख केवल कोच या डिब्बे के संदर्भ में किया जाए, न कि यात्री के लिए।
2nd Class Railway: रेलवे में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे सुरक्षा और यात्रियों की सुविधा को लेकर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि रेलवे मैनुअल के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए स्टेशनों और ट्रेनों में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाना आवश्यक है। इससे न केवल यात्रियों की सुरक्षा बेहतर होगी, बल्कि युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

टिकट नहीं मिलने से यात्री गैर-टिकटधारी नहीं
अदालत ने एक मुआवजा मामले में रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि केवल टिकट बरामद न होने के आधार पर किसी व्यक्ति को बिना टिकट यात्री नहीं माना जा सकता। यदि परिस्थितियां यह साबित करती हैं कि वह ट्रेन में यात्रा कर रहा था, तो उसके अधिकार खत्म नहीं होते।
2nd Class Railway: मृतक की पत्नी को 8 लाख रुपये मुआवजा
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि दुर्घटना के दौरान मृतक का बैग गुम हो गया था, जिसमें टिकट रखा हुआ था। पत्नी के हलफनामे और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अदालत ने माना कि मृतक वैध यात्री था। कोर्ट ने रेलवे को निर्देश दिया कि मृतक की पत्नी को ब्याज सहित 8 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। यह फैसला यात्रियों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।








