Pallet Gun: दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए सीजेपी (कॉकरोच जनता पार्टी) के प्रदर्शन के बाद पैलेट गन को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। प्रदर्शन में शामिल कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया, जबकि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने इन आरोपों से साफ इनकार किया है। हालांकि कुछ घायल प्रदर्शनकारियों के शरीर पर छोटे-छोटे छर्रों जैसे निशान मिलने के बाद यह मामला चर्चा का विषय बन गया है। इसी के साथ लोगों के मन में यह सवाल भी उठने लगा कि आखिर पैलेट गन क्या है, इसका इतिहास कितना पुराना है और भारत में इसका इस्तेमाल कब शुरू हुआ।
करीब 500 साल पुराना है पैलेट गन का इतिहास
पैलेट गन का इतिहास आधुनिक दौर से कहीं अधिक पुराना माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, दुनिया की पहली मैकेनिकल एयर गन का निर्माण लगभग वर्ष 1580 के आसपास यूरोप में हुआ था। उस दौर की एक ऐतिहासिक एयर गन आज भी स्वीडन के स्टॉकहोम स्थित लिवरुस्टकामरेन संग्रहालय में संरक्षित है।इसके बाद 18वीं शताब्दी में ऑस्ट्रिया के प्रसिद्ध घड़ीसाज बार्टोलोमियो गिराडोर्नी ने “विंडबुचसे” नामक 20 राउंड वाली रिपीटिंग एयर राइफल विकसित की। उस समय ऑस्ट्रियाई सेना इस हथियार का उपयोग करती थी। बाद में 19वीं शताब्दी के अंत में डेजी जैसी कंपनियों ने एयर गन और पैलेट गन को खेल और मनोरंजन के उद्देश्य से आम लोगों तक पहुंचाया, जिससे आधुनिक पैलेट गन के विकास को नई दिशा मिली।
Pallet Gun: उत्तरी आयरलैंड से शुरू हुआ भीड़ नियंत्रण में इस्तेमाल
पैलेट गन का उपयोग केवल खेल या सैन्य प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहा। वर्ष 1970 के दशक में उत्तरी आयरलैंड में भड़के नागरिक दंगों के दौरान ब्रिटिश सेना ने पहली बार भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पैलेट फायरिंग शॉटगन का इस्तेमाल किया। इसके बाद ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने रबर और प्लास्टिक से बने विशेष बैटन और पैलेट राउंड विकसित किए, जिन्हें “काइनेटिक इम्पैक्ट राउंड” के रूप में जाना गया।
बाद के वर्षों में इजरायल ने भी 1987 से 1993 के बीच हुए जनआंदोलनों के दौरान इस हथियार का इस्तेमाल किया। इसके बाद कई देशों की सुरक्षा एजेंसियों ने इसे भीड़ नियंत्रण के एक विकल्प के रूप में अपनाया।
Pallet Gun: भारत में कब हुई पैलेट गन की एंट्री
भारत में पैलेट गन का इस्तेमाल पहली बार वर्ष 2010 में जम्मू-कश्मीर में शुरू हुआ। उस समय सीआरपीएफ ने 12-गेज पंप-एक्शन शॉटगन के जरिए पैलेट कारतूस का उपयोग किया था। इसे उस समय पत्थरबाजी और हिंसक प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए गैर-घातक हथियार के रूप में पेश किया गया था।
हालांकि इसके इस्तेमाल के बाद बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने और खासतौर पर आंखों की गंभीर चोटों के मामलों ने इसे लगातार विवादों के केंद्र में बनाए रखा।
कैसे काम करती है पैलेट गन और क्यों मानी जाती है खतरनाक
पैलेट गन से दागे जाने वाले कारतूस में कई छोटे-छोटे धातु के छर्रे भरे होते हैं। ट्रिगर दबाते ही ये छर्रे तेज गति से फैल जाते हैं और एक बड़े क्षेत्र में बिखर जाते हैं। एक बार छर्रे निकलने के बाद उनकी दिशा पर नियंत्रण नहीं रहता, जिससे लक्ष्य के अलावा आसपास मौजूद अन्य लोग भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।ये छर्रे त्वचा को चीरते हुए शरीर के भीतर तक पहुंच सकते हैं। यदि ये आंख, चेहरा या शरीर के किसी संवेदनशील हिस्से पर लग जाएं तो स्थायी चोट, दृष्टि खोने जैसी गंभीर स्थितियां भी पैदा हो सकती हैं। इसी वजह से इसे गैर-घातक हथियार की श्रेणी में रखा जाने के बावजूद अत्यधिक जोखिम वाला हथियार माना जाता है।
Pallet Gun: मानवाधिकार संगठनों की चिंता लगातार बनी रही
संयुक्त राष्ट्र और कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने समय-समय पर भीड़ नियंत्रण में पैलेट गन के इस्तेमाल पर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यह हथियार नागरिकों को स्थायी शारीरिक नुकसान पहुंचा सकता है और इसका प्रभाव कई बार असंगत तथा अनियंत्रित होता है।जम्मू-कश्मीर में पैलेट गन के इस्तेमाल के दौरान भी संयुक्त राष्ट्र ने इस पर चिंता व्यक्त करते हुए नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और ऐसे हथियारों के प्रयोग की समीक्षा करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि भीड़ नियंत्रण के दौरान ऐसे साधनों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जिनसे लोगों को स्थायी नुकसान पहुंचने की आशंका न्यूनतम हो।
विवाद के बीच फिर उठे पुराने सवाल
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए हालिया प्रदर्शन के बाद पैलेट गन एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई है। हालांकि इस मामले में सुरक्षा एजेंसियों ने पैलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया है और आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भीड़ नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले हथियार कितने सुरक्षित हैं और इनके उपयोग की सीमा क्या होनी चाहिए। आने वाले दिनों में जांच और आधिकारिक तथ्यों के सामने आने के बाद ही इस पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
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