Home » राष्ट्रीय » इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व निर्माण में बचपन और परिवार की क्या भूमिका रही

इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व निर्माण में बचपन और परिवार की क्या भूमिका रही

Indira Gandhi

Indira Gandhi: इंदिरा गांधी का जन्म ऐसे दौर में हुआ था, जब दुनिया प्रथम विश्व युद्ध की विभीषिका से गुजर रही थी और भारत ब्रिटिश शासन से आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। 19 नवंबर 1917 को जन्मी इंदिरा ने बचपन से ही अपने घर में राष्ट्रीय आंदोलन का माहौल देखा। पिता जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे, जबकि मां कमला नेहरू अक्सर बीमार रहती थीं। ऐसे माहौल ने इंदिरा के व्यक्तित्व, सोच और राजनीतिक दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया।

आजादी की लड़ाई ने बचपन से जगाया राष्ट्रवाद

इंदिरा अपने माता-पिता की इकलौती संतान थीं। घर में लगातार स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों का आना-जाना और महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहा संघर्ष उनके लिए किसी पाठशाला से कम नहीं था। 13वें जन्मदिन पर पिता को लिखे पत्र में उन्होंने आजादी मिलने के बाद के भविष्य की बात करते हुए कहा था कि तब तक सभी के लिए एक ही काम है—आजादी के लिए लड़ना। कम उम्र में ही उनमें राष्ट्रवाद की भावना मजबूत हो चुकी थी।

Indira Gandhi: पिता जेल में, मां बीमार; इंदिरा ने झेला अकेलापन

जवाहरलाल नेहरू लंबे समय तक जेल में रहे और कमला नेहरू की तबीयत भी खराब रहती थी। इसका असर इंदिरा की पढ़ाई और निजी जीवन पर पड़ा। उन्होंने अलग-अलग जगहों पर शिक्षा हासिल की। शांति निकेतन में रहते हुए उनकी कला और नृत्य में रुचि बढ़ी। नेहरू जेल से भी उन्हें पत्र लिखकर इतिहास, साहित्य और दुनिया की घटनाओं से परिचित कराते रहे।

बीमारी के कारण पढ़ाई अधूरी रह गई

1936 में कमला नेहरू के निधन के बाद इंदिरा ने विदेश में पढ़ाई की तैयारी की और ब्रिस्टल के बैडमिंटन स्कूल के बाद ऑक्सफोर्ड के समरविले कॉलेज में अध्ययन किया। उन्होंने इतिहास के साथ राजनीति, तर्कशास्त्र और अर्थशास्त्र में भी रुचि लेने की कोशिश की, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण पढ़ाई पूरी नहीं कर सकीं। 1939 में उन्हें टीबी का पता चला और इलाज के लिए स्विट्जरलैंड जाना पड़ा।

Indira Gandhi:  नेहरू के साथ रहकर सीखी राजनीति की बारीकियां

1947 में नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा अपने पिता के साथ प्रधानमंत्री निवास में रहने लगीं। उन्होंने उनकी देखभाल के साथ-साथ कई जिम्मेदारियां संभालीं और विदेश यात्राओं में उनके साथ गईं। इस दौरान उनकी मुलाकात दुनिया के कई नेताओं से हुई और उन्हें अंतरराष्ट्रीय राजनीति को करीब से समझने का अवसर मिला। 1955 में वह कांग्रेस कार्यकारिणी समिति में शामिल हुईं। यहीं से इंदिरा का राजनीतिक सफर तेजी से आगे बढ़ा और आगे चलकर वह देश की प्रधानमंत्री बनीं।

ये भी पढ़ें…पाकिस्तान सेना पर BLA का बड़ा वार, 52 जवानों के मारे जाने का दावा