Taslima Nasrin Kolkata Visit: निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन करीब 20 साल बाद कोलकाता लौटीं। सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होने के दौरान उन्होंने कहा कि उनकी वापसी इस बात का संदेश है कि अन्याय लंबे समय तक चल सकता है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं रहता। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में किसी भी लेखक को अपने विचारों और लेखन के कारण अपना देश या शहर छोड़ने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा।
कोलकाता लौटकर हुईं भावुक
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए तसलीमा नसरीन ने कहा कि कोलकाता लौटना उनके लिए भावुक क्षण है। उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे वे अपने जीवन के उस हिस्से में लौट आई हैं, जिसे वर्षों पहले परिस्थितियों के कारण छोड़ना पड़ा था। उन्होंने कहा कि उनका सपना है कि किसी भी लेखक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कारण निर्वासन का जीवन न जीना पड़े।
Taslima Nasrin Kolkata Visit: ‘राजनीति नहीं, महिलाओं के अधिकारों की बात करने आई हूं’
तसलीमा नसरीन ने स्पष्ट किया कि उनकी यात्रा का कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है। उन्होंने कहा कि वे किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध के लिए नहीं, बल्कि महिलाओं के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर अपनी बात रखने आई हैं। उन्होंने कहा कि यूरोप ने उन्हें नागरिकता और रहने की जगह दी, लेकिन बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में उन्हें स्थायी ठिकाना नहीं मिल सका।
शुभेंदु अधिकारी ने सुरक्षा का भरोसा दिया
कार्यक्रम में मौजूद पश्चिम बंगाल के मुंख्यमत्री शुभेंदु अधिकारी ने तसलीमा नसरीन का स्वागत करते हुए कहा कि जब भी वे पश्चिम बंगाल आएंगी, उन्हें पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने कहा कि राज्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान होना चाहिए।
Taslima Nasrin Kolkata Visit: 2007 में छोड़ना पड़ा था कोलकाता
तसलीमा नसरीन वर्ष 2004 से 2007 तक कोलकाता में रहीं। उनकी आत्मकथा ‘द्विखंडितो’ के कुछ अंशों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए थे। इसके बाद तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया था और कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए नवंबर 2007 में उन्हें कोलकाता छोड़ना पड़ा।
1994 से निर्वासन का जीवन
तसलीमा नसरीन को वर्ष 1994 में बांग्लादेश में अपने लेखन को लेकर इस्लामी कट्टरपंथियों से धमकियां मिलने के बाद देश छोड़ना पड़ा था। तब से वह विभिन्न देशों में निर्वासन का जीवन जी रही हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर लगातार आवाज उठाती रही हैं।
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