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Prayagraj News: हिंदू से मुस्लिम बनीं दो बहनों को पिता ने किया कैद! हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

Prayagraj News: हिंदू से मुस्लिम बनीं दो बहनों को पिता ने किया कैद! हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

Prayagraj News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपनाने वाली दो बालिग बहनों को उनके पिता द्वारा कथित तौर पर अवैध हिरासत में रखे जाने के मामले में सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने दोनों युवतियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानते हुए उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार रहने और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ जीवन बिताने की पूरी आजादी दी है। साथ ही कोर्ट ने युवतियों के मौलिक अधिकारों के हनन के लिए उनके पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।

अपनी जिंदगी और धर्म चुनने की आजादी पर हाईकोर्ट का जोर

न्यायमूर्ति संदीप जैन ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट किया कि किसी बालिग नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर केवल पारिवारिक दबाव, सामाजिक सोच या माता-पिता की असहमति के आधार पर रोक नहीं लगाई जा सकती। संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपनी पसंद का धर्म चुनने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।अदालत ने कहा कि बालिग होने के बाद व्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता पारिवारिक अधिकारों और सामाजिक दबाव से ऊपर होती है। कोई भी माता-पिता अपनी संतान को केवल उसके धार्मिक विचारों या व्यक्तिगत फैसलों से असहमति के कारण घर में कैद नहीं कर सकते।

Prayagraj News: 2020 और 2021 में धर्म परिवर्तन का दावा

मामला आगरा के सदर बाजार क्षेत्र से जुड़ा है। कोर्ट के सामने पेश हुईं दो बहनों में बड़ी बहन की उम्र करीब 35 वर्ष बताई गई है, जबकि छोटी बहन की उम्र करीब 20 वर्ष है और वह इंटरमीडिएट की छात्रा बताई गई। दोनों ने अदालत के सामने अपने बयान दर्ज कराते हुए कहा कि उन्होंने वर्ष 2020 और 2021 में बिना किसी डर, लालच, दबाव या प्रलोभन के अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया था।अदालत ने दोनों युवतियों के बयानों को गंभीरता से लिया और उनकी इच्छा को महत्व देते हुए कहा कि किसी बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने से रोकना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।याचिका में आरोप लगाया गया था कि दोनों बहनों को उनके पिता द्वारा उनकी इच्छा के विरुद्ध घर में रखा गया था। मामले की सुनवाई के दौरान दोनों युवतियां अदालत के समक्ष उपस्थित हुईं और उन्होंने अपनी स्थिति स्पष्ट रूप से बताई।हाईकोर्ट ने पूरे मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि बालिग नागरिक को उसकी इच्छा के विरुद्ध घर में बंद रखना संवैधानिक स्वतंत्रता के खिलाफ है। अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस और प्रशासन का दायित्व नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है, न कि ऐसी परिस्थितियों में निष्क्रिय बने रहना।अदालत ने राज्य सरकार और पुलिस तंत्र के रवैये पर भी गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि जब किसी नागरिक की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहे हों, तब पुलिस को पीड़ित व्यक्ति को राहत दिलाने के लिए सक्रिय कदम उठाने चाहिए।हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में कथित अवैध हिरासत को जारी रहने देना और पीड़ितों को समय पर राहत न मिलना गंभीर संवैधानिक चिंता का विषय है। इसी आधार पर अदालत ने मुआवजे का आदेश दिया।

Prayagraj News: बालिग होने के बाद फैसला खुद लेने का अधिकार

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में व्यक्तिगत स्वायत्तता को संवैधानिक अधिकारों का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। अदालत के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति बालिग हो जाता है तो उसके जीवन के महत्वपूर्ण फैसले लेने का अधिकार उसी के पास होता है।धर्म का चुनाव हो या अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ जीवन बिताने का फैसला, किसी बालिग व्यक्ति की इच्छा को केवल परिवार या समाज की पसंद के आधार पर दबाया नहीं जा सकता। अदालत ने साफ किया कि संविधान व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करता है।मामले में अदालत ने दोनों युवतियों के मौलिक अधिकारों के कथित उल्लंघन को गंभीरता से लेते हुए उनके पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह आदेश उस संवैधानिक सिद्धांत को रेखांकित करता है कि किसी भी बालिग नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को पारिवारिक दबाव या सामाजिक सोच के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।हाईकोर्ट का यह फैसला एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि बालिग व्यक्ति के जीवन, धर्म और व्यक्तिगत फैसलों पर आखिर अधिकार किसका है—परिवार का या स्वयं उस व्यक्ति का? अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट संकेत दिया है कि संविधान के तहत अंतिम प्राथमिकता व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों की है।

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