TMC PARTY SYMBOL FREEZE: अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) में संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर ममता बनर्जी और रितब्रत बनर्जी के पक्ष आमने-सामने हैं। विवाद राष्ट्रीय कार्यसमिति के कार्यकाल, संगठनात्मक नियुक्तियों और 22 जून 2026 को हुए कथित विशेष अधिवेशन में अरूप राय को राष्ट्रीय कार्यसमिति का अध्यक्ष चुने जाने के दावे से जुड़ा है। दोनों पक्षों ने निर्वाचन आयोग के सामने अपने-अपने दस्तावेज और दलीलें रखीं। विवाद के बीच आयोग ने अंतरिम व्यवस्था के तहत दोनों पक्षों को फिलहाल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और पारंपरिक ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया है। दोनों गुटों से नए नाम और चुनाव चिह्न के तीन-तीन विकल्प मांगे गए हैं। अब सवाल यह है कि आखिर टीएमसी में विवाद कहां से शुरू हुआ, आयोग के सामने मामला क्या है और चुनाव चिह्न फ्रीज करने की ऐसी व्यवस्था पहले किन राजनीतिक दलों के मामले में देखने को मिली है?
TMC में संगठन को लेकर विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
विवाद का मुख्य केंद्र टीएमसी की राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल और उसके बाद लिए गए संगठनात्मक फैसले हैं। रितब्रत बनर्जी के पक्ष का दावा है कि राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल 11 फरवरी 2025 को समाप्त हो गया था। उनके अनुसार इसके बाद पुरानी कार्यसमिति के नाम पर की गई नियुक्तियों और लिए गए फैसलों को पार्टी संविधान के तहत अधिकार प्राप्त नहीं था।

वहीं, ममता बनर्जी के पक्ष ने इन दावों को खारिज किया। आयोग के सामने दाखिल जवाब में उनके पक्ष ने कहा कि शिकायतकर्ताओं का दावा पार्टी संविधान के अनुरूप नहीं है और उनके द्वारा किए गए चुनाव तथा नियुक्तियां वैध नहीं हैं। यानी विवाद की मूल वजह यह है कि पार्टी संविधान के मुताबिक संगठनात्मक अधिकार किसके पास था और महत्वपूर्ण फैसले लेने की वैध प्रक्रिया क्या थी।
TMC PARTY SYMBOL FREEZE: 22 जून के विशेष अधिवेशन में क्या हुआ?
रितब्रत बनर्जी के पक्ष के मुताबिक संगठनात्मक स्थिति स्पष्ट करने के लिए 22 जून 2026 को कोलकाता के नोवोटेल होटल में विशेष अधिवेशन आयोजित किया गया। उनके दावे के अनुसार इसमें पार्टी के निर्वाचक मंडल के सदस्य और वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हुए। इसी अधिवेशन में अरूप राय को राष्ट्रीय कार्यसमिति का अध्यक्ष चुने जाने का दावा किया गया। इस पक्ष ने अधिवेशन की कार्यवाही, पदाधिकारियों की सूची, राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्यों की सूची और अरूप राय के नमूना हस्ताक्षर सहित कई दस्तावेज निर्वाचन आयोग को सौंपे। हालांकि, ममता बनर्जी के पक्ष ने इस पूरी प्रक्रिया की वैधता पर ही सवाल उठाया है।
ममता बनर्जी के पक्ष ने क्या जवाब दिया?
ममता बनर्जी की ओर से आयोग के सामने दाखिल जवाब में रितब्रत बनर्जी के दावों को गलत और पार्टी संविधान से असमर्थित बताया गया। उनके पक्ष का कहना है कि अध्यक्ष सहित जिन पदाधिकारियों के चुनाव का दावा किया गया है, वह प्रक्रिया पार्टी संविधान के अनुरूप नहीं है। इसलिए 22 जून के विशेष अधिवेशन और उसके आधार पर पेश किए गए दस्तावेजों को मान्यता नहीं दी जानी चाहिए। इस तरह दोनों पक्षों के दावे एक-दूसरे के विपरीत हैं। एक पक्ष 22 जून के अधिवेशन को अपने संगठनात्मक दावे का आधार बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष उसी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठा रहा है।
TMC PARTY SYMBOL FREEZE: मामला चुनाव आयोग तक कैसे पहुंचा?
दोनों पक्षों के दावों के बाद विवाद निर्वाचन आयोग के सामने पहुंचा। रितब्रत बनर्जी के पक्ष ने आयोग को संगठनात्मक दावे से जुड़े दस्तावेज सौंपे, जबकि ममता बनर्जी के पक्ष ने इन दावों का जवाब दाखिल किया। 24 जून को डेरेक ओ’ब्रायन की ओर से आयोग से पार्टी का नवीनतम संविधान और अद्यतन पदाधिकारी एवं राष्ट्रीय कार्यसमिति की सूची आयोग की वेबसाइट पर अपलोड करने का अनुरोध भी किया गया था। 29 जून को ममता बनर्जी और TMC की ओर से अधिवक्ता अभिनव सिंह ने कैविएट दाखिल कर किसी भी अंतरिम या अंतिम आदेश से पहले नोटिस और सुनवाई का अनुरोध किया। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच दस्तावेजों और जवाबों का आदान-प्रदान हुआ।
बैंक खातों का मुद्दा भी विवाद में क्यों आया?
2 जुलाई 2026 को रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने निर्वाचन आयोग से मुलाकात की। इस दौरान कई दस्तावेज सौंपे गए। इन दस्तावेजों में इंडियन बैंक और एचडीएफसी बैंक की शाखाओं को भेजे गए पत्र भी शामिल थे। पत्रों में पार्टी के मौजूदा बैंक खातों को आगे की सूचना तक फ्रीज करने का अनुरोध किया गया था। इससे विवाद केवल संगठनात्मक पद और पार्टी की पहचान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पार्टी के प्रशासनिक और वित्तीय संचालन से जुड़े सवाल भी सामने आए।
TMC PARTY SYMBOL FREEZE: आयोग ने दोनों पक्षों को कितना समय दिया?
2 जुलाई को निर्वाचन आयोग ने दोनों पक्षों की ओर से जमा किए गए दस्तावेज एक-दूसरे के साथ साझा किए और जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया। ममता बनर्जी के पक्ष ने 6 जुलाई को जवाब दाखिल किया। वहीं रितब्रत बनर्जी के पक्ष ने जवाब के लिए अतिरिक्त समय मांगा। आयोग ने पहले 10 जुलाई और बाद में 25 जुलाई तक समय दिया। 25 जुलाई को रितब्रत बनर्जी के पक्ष ने फिर 10 दिन का अतिरिक्त समय मांगते हुए 4 अगस्त तक जवाब दाखिल करने का अनुरोध किया। 29 जुलाई को ममता बनर्जी के पक्ष ने आयोग से कहा कि उन्हें रितब्रत बनर्जी की ओर से जवाब दाखिल किए जाने की जानकारी नहीं मिली है। साथ ही, यदि जवाब दाखिल किया गया है तो उसकी प्रति उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया।
चुनाव आयोग के सामने असली सवाल क्या है?
पूरे विवाद को मुख्य रूप से तीन सवालों में समझा जा सकता है। पहला-11 फरवरी 2025 के बाद राष्ट्रीय कार्यसमिति की स्थिति क्या थी? दूसरा- 5 जून 2025 को किए गए संगठनात्मक फैसलों और नियुक्तियों की पार्टी संविधान के तहत क्या वैधता थी? तीसरा- 22 जून 2026 को आयोजित विशेष अधिवेशन और उसमें अरूप राय को राष्ट्रीय कार्यसमिति का अध्यक्ष चुने जाने के दावे को पार्टी संविधान और लागू नियमों के संदर्भ में किस तरह देखा जाएगा? इन सवालों पर दोनों पक्षों के दस्तावेज, पार्टी संविधान और संगठनात्मक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होंगे।
TMC PARTY SYMBOL FREEZE: चुनाव आयोग की भूमिका यहां क्यों अहम है?
टीएमसी एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है और उसके लिए चुनाव चिह्न से जुड़ी स्थिति निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आती है। ‘चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968’ के पैरा 15 में मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के भीतर प्रतिद्वंद्वी समूहों के बीच पार्टी के प्रतिनिधित्व को लेकर विवाद की स्थिति में आयोग की भूमिका निर्धारित की गई है। ऐसे मामलों में आयोग संबंधित पक्षों को सुनता है और उपलब्ध तथ्यों एवं परिस्थितियों के आधार पर यह तय कर सकता है कि कौन-सा समूह पार्टी का मान्यता प्राप्त संगठन है या किसी समूह को मान्यता नहीं दी जाए। इसी प्रक्रिया के तहत TMC के दोनों पक्ष अपने संगठनात्मक दावों और दस्तावेजों के साथ आयोग के सामने हैं।
फिर ‘फूल-घास’ सिंबल क्यों फ्रीज हुआ?
विवाद के बीच निर्वाचन आयोग ने अंतरिम व्यवस्था के तहत दोनों पक्षों को ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और पार्टी के पारंपरिक ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने से रोक दिया है। आयोग ने दोनों पक्षों से तीन-तीन वैकल्पिक नाम और चुनाव चिह्न सुझाने को कहा है। यानी अंतिम फैसला आने तक दोनों पक्ष मूल पार्टी नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अंतिम फैसला नहीं बल्कि अंतरिम व्यवस्था है। पार्टी के नाम, संगठनात्मक नियंत्रण और चुनाव चिह्न पर अंतिम स्थिति आयोग के आगे के आदेश से स्पष्ट होगी।
TMC PARTY SYMBOL FREEZE: क्या चुनाव आयोग के पास सिंबल फ्रीज करने का कानूनी आधार है?
ऐसे संगठनात्मक विवादों में चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 का पैरा 15 महत्वपूर्ण कानूनी आधार है। जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के भीतर दो या अधिक प्रतिद्वंद्वी समूह पार्टी पर अपना दावा करते हैं, तो आयोग विवाद का निपटारा करने की प्रक्रिया अपना सकता है। ऐसे मामलों में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे, प्रतिनिधियों के समर्थन, निर्वाचित सदस्यों की स्थिति, पार्टी संविधान और संबंधित दस्तावेजों को देखा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी पैरा 15 के तहत ऐसे विवादों में निर्वाचन आयोग की भूमिका को मान्यता दी है।
हालांकि, TMC के मौजूदा मामले में चुनाव चिह्न पर लगी अंतरिम रोक को आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन से जोड़ना सही नहीं होगा। उपलब्ध घटनाक्रम के अनुसार मौजूदा विवाद का मुख्य आधार पार्टी के संगठनात्मक नियंत्रण और दोनों पक्षों के दावे हैं।
पहले किन बड़े दलों के सिंबल फ्रीज हो चुके हैं?
TMC का मौजूदा मामला ऐसा पहला उदाहरण नहीं है, जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के भीतर संगठनात्मक विवाद के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर अंतरिम व्यवस्था की गई हो।
शिवसेना: 2022 में ‘धनुष-बाण’ पर रोक
2022 में महाराष्ट्र की शिवसेना में उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुटों के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद हुआ। निर्वाचन आयोग ने अंतरिम व्यवस्था में दोनों पक्षों को मूल ‘शिवसेना’ नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया था। दोनों गुटों को अलग नाम और चुनाव चिह्न दिए गए। बाद की प्रक्रिया में निर्वाचन आयोग ने शिंदे गुट के पक्ष में पार्टी के नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न को लेकर फैसला किया।
LJP: 2021 में ‘बंगला’ हुआ फ्रीज
2021 में लोक जनशक्ति पार्टी में चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस के गुटों के बीच पार्टी पर नियंत्रण को लेकर विवाद सामने आया। इस विवाद के दौरान निर्वाचन आयोग ने LJP के पारंपरिक ‘बंगला’ चुनाव चिह्न को फ्रीज कर दिया था। इसके बाद दोनों पक्षों के लिए अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न की व्यवस्था की गई। यानी शिवसेना और LJP के मामलों में भी पार्टी के भीतर दो दावेदार गुटों के सामने आने के बाद मूल चुनाव चिह्न के इस्तेमाल को लेकर अंतरिम व्यवस्था देखने को मिली थी।
TMC PARTY SYMBOL FREEZE: TMC के मामले में अब आगे क्या होगा?
फिलहाल दोनों पक्षों के सामने तत्काल सवाल वैकल्पिक नाम और चुनाव चिह्न का है। निर्वाचन आयोग ने दोनों गुटों से तीन-तीन विकल्प मांगे हैं। इसके साथ ही मूल विवाद पर आयोग की प्रक्रिया जारी रहेगी। आयोग दोनों पक्षों की ओर से पेश दस्तावेजों, पार्टी संविधान, संगठनात्मक प्रक्रिया और दावों की जांच करेगा। यानी फिलहाल ‘फूल-घास’ चिह्न का फ्रीज होना TMC के संगठनात्मक विवाद का अंतिम निष्कर्ष नहीं है। यह चुनावी प्रक्रिया के दौरान दोनों पक्षों के दावों को लेकर बनाई गई अंतरिम व्यवस्था है।
फिलहाल पूरी तस्वीर क्या है?
TMC में विवाद की शुरुआत राष्ट्रीय कार्यसमिति के कार्यकाल और संगठनात्मक फैसलों को लेकर उठे सवालों से हुई। रितब्रत बनर्जी के पक्ष ने 22 जून 2026 के विशेष अधिवेशन और उसमें अरूप राय को राष्ट्रीय कार्यसमिति का अध्यक्ष चुने जाने के दावे को अपने संगठनात्मक पक्ष का आधार बनाया। ममता बनर्जी के पक्ष ने इस प्रक्रिया और दावों की वैधता को चुनौती दी।
मामला निर्वाचन आयोग तक पहुंचा तो दोनों पक्षों ने दस्तावेज और जवाब पेश किए। विवाद के बीच आयोग ने फिलहाल दोनों गुटों को ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और पारंपरिक ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया है और नए नाम एवं चिह्न के विकल्प मांगे हैं। अब नजर आयोग की आगे की कार्यवाही पर है। अंतिम तौर पर पार्टी का नाम, चुनाव चिह्न और संगठनात्मक नियंत्रण किस व्यवस्था के तहत तय होगा, यह आयोग के अंतिम निर्णय से स्पष्ट होगा।
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