Home » ओपिनियन » हिंदी के देश में हिंदी के विरोध की राजनीति क्यों, प्रतिभाओं को कौन अवसर देगा?

हिंदी के देश में हिंदी के विरोध की राजनीति क्यों, प्रतिभाओं को कौन अवसर देगा?

New Delhi: हिंदी के देश में हिंदी के विरोध की राजनीति क्यों, प्रतिभाओं को कौन अवसर देगा?
New Delhi: सर्वोच्च न्यायालय ने बहुत उचित कहा है कि तमिलनाडु सरकार को हिंदी के प्रति अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है।समझ में नहीं आता है कि हिंदी के इस देश में कुछ क्षेत्रीय पार्टियां हिंदी के विरोध की आड़ में कब तक अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकती रहेंगी? आखिर तमिलनाडु में नवोदय विद्यालयों के खुल जाने से राज्य को क्या नुकसान हो जाएगा? आश्चर्यजनक है कि मद्रास हाईकोर्ट ने राज्य के हर जिले में नवोदय विद्यालय शुरू करने का आदेश दिया, तो तमिलनाडु सरकार उसे चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट में जा पहुंची।हालांकि सर्वोच्च अदालत से राज्य सरकार को ऐसा झटका लगा है कि वह अब चाहकर भी हिंदी के रास्ता का रोड़ा नहीं बन पाएगी। 

राजनीतिक स्वार्थों के लिए प्रतिभाओं से अन्याय क्यों?

नई शिक्षा नीति में त्रि-भाषा फॉर्मूला (Three-Language Formula) के तहत हिंदी को बढ़ावा देने के प्रयासों को राज्यों पर भाषा थोपने के  नजरिये से नहीं देखा जा सकता है और न ही इसके नाम पर राजनीति उचित होगी।सच तो यह है कि आज के समय में यदि किसी भी राज्य का नेतृत्व हिंदी का विरोध करता है, तो यही समझा जाएगा कि वह अपने राजनीतिक स्वार्थों के वशीभूत होकर अपने छात्र-छात्राओं के साथ अन्याय कर रहा है। देखना होगा कि आज भारत दुनिया के लिए एक बड़ा बाजार है।दुनियाभर के लोग व्यापारिक, व्यावसायिक और व्यावहारिक दृष्टि से हिंदी सीख रहे हैं।अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी हिंदी का प्रयोग हो रहा है।ऐसे में किसी भी राज्य की प्रतिभाओं को द्वि-भाषा नीति (Two-Language Policy) की दलील देकर हिंदी सीखने से वंचित किया जाना क्या सही है?  

New Delhi: हिंदी के विरोध की राजनीति

दरअसल, कुछ राजनीतिक दलों ने हिंदी के विरोध की सोच पाली हुई है, तो इसकी एक ठोस पृष्ठभूमि है।1937 में  सी. राजगोपालाचारी ने स्कूलों में हिंदी अनिवार्य की, तो उस समय मद्रास प्रांत में इसका भयंकर विरोध हुआ था।इसके बाद 1965 में केंद्र ने हिंदी को मुख्य राजभाषा बनाने के प्रयास किये, तो तमिलनाडु में उग्र आंदोलन हुए। इस तरह के आंदोलनों को सफलता मिली तो कुछ राजनीतिक दलों ने हिंदी के विरोध को अपने स्वार्थ साधने या अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का हथियार ही बना लिया।

New Delhi: हिंदी के स्वभाव को जानिए

राजनेता भूल जाते हैं कि देश की आजादी के तमाम नायकों ने हिंदी को संवाद की प्रमुख भाषा बनाए जाने पर बल दिया था। उन्हें अहसास नहीं होता कि भारत के करोड़ों लोग हिंदी को  अपनी मातृभाषा मानते हैं।हास्यास्पद है कि हिंदी का विरोध करने वाले राजनेताओं को संपर्क भाषा के तौर पर अंग्रेजी से कभी कोई परहेज नहीं रहा, लेकिन इस देश के करोड़ों लोगों की भाषा हिंदी को वे क्षेत्रीय भाषाओं और पहचान के लिए बड़ा खतरा मानते रहे हैं, जबकि हिंदी का स्वभाव जोड़ने का है, तोड़ने का नहीं।

New Delhi: हिंदी की महत्ता को समझें

कुछ दक्षिणी राज्यों के जो राजनेता हिंदी का विरोध कर अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति करते रहे हैं, उन्हें गंभीरता से सोचना होगा कि इस तरह की राजनीति के बूते वे सिर्फ एक सीमा तक ऊंचे उठ सकते हैं। इसके बजाए वे हिंदी को संपर्क भाषा के तौर पर अपनाएं तो उनके लिए अच्छा होगा। हिंदी के जरिये वे देश के करोड़ों लोगों तक आसानी से संवाद कायम कर सकते हैं।स्वर्गीय प्रधानमंत्री नरसिंह राव हिंदी जानते थे, तो उन्हें देश की करोड़ों जनता तक अपनी बात पहुंचाने में दिक्कत नहीं हुई। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण विषयों पर जनता के नाम हिंदी में संबोधन दिये तो इसी से हिंदी की महत्ता और व्यापकता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

New Delhi: प्रतिभाओं को विकास का अवसर दें

स्वर्गीय प्रधानमंत्री एचडी देवगौडा बेशक हिंदी नहीं जानते थे, लेकिन वे विशेष अवसरों पर जनता को हिंदी भाषा में ही संबोधित करते थे।यदि नवोदय विद्यालयों में तमिलनाडु की नवोदित प्रतिभाओं को हिंदी सीखने का अवसर मिलता है, तो इससे राज्य सरकार को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। उसे इन प्रतिभाओं को विकास का हर अवसर  उपलब्ध कराना चाहिए।यदि वे हिंदी सीखेंगे तो राजनीति, ज्ञान-विज्ञान, शिक्षा, फिल्म, समाज सेवा, जन आंदोलन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक रूप से संवाद बना सकेंगे। इससे उन्हें निरंतर सफलता के ऊँचे मुकाम भी हासिल होते रहेंगे।