उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज गोरखपुर में गोशाला पहुंचकर गोसेवा की। गोरखनाथ मंदिर की गोशाला में गायों के बीच मुख्यमंत्री की मौजूदगी ने एक बार फिर गोवंश संरक्षण को लेकर उनकी व्यक्तिगत प्राथमिकता और सरकार की नीतियों को चर्चा में ला दिया। योगी आदित्यनाथ जब भी गोरखपुर प्रवास पर होते हैं, गोशाला में गोसेवा करना उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों का हिस्सा रहा है। लेकिन मुख्यमंत्री के तौर पर गोवंश संरक्षण की कहानी केवल गोशाला जाकर चारा खिलाने तक सीमित नहीं है। पिछले वर्षों में प्रदेश में गो-आश्रय स्थलों से लेकर पशु चिकित्सा, टीकाकरण, पशुपालकों को सहायता, नस्ल सुधार और गोशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने तक कई स्तरों पर योजनाएं लागू की गई हैं।
UP News: आज का गोशाला दौरा क्यों महत्वपूर्ण है?
योगी आदित्यनाथ के लिए गोसेवा कोई नया विषय नहीं है। गोरखनाथ मंदिर की परंपरा और उनकी सार्वजनिक भूमिका में गोसेवा लंबे समय से दिखाई देती रही है। मार्च 2026 में भी गोरखनाथ मंदिर की गोशाला में मुख्यमंत्री के गोसेवा करने की तस्वीरें सामने आई थीं। अगस्त 2026 में भी जनता दर्शन के बाद उन्होंने मंदिर की गोशाला में पहुंचकर गोवंश को अपने हाथों से चारा खिलाया था। आज का दौरा इसी निरंतरता में देखा जा सकता है। फर्क यह है कि अब इसके साथ उत्तर प्रदेश में पिछले वर्षों में तैयार किए गए गोवंश संरक्षण के सरकारी ढांचे को भी देखा जा सकता है। 7,717 गो-आश्रय स्थल तक पहुंचा सरकारी ढांचा उत्तर प्रदेश सरकार के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 7,717 गो-आश्रय स्थल हैं, जिनमें 12.52 लाख गोवंश संरक्षित हैं। सरकार के अनुसार इन पशुओं के भरण-पोषण के लिए प्रति गोवंश प्रतिदिन ₹50 की दर से व्यवस्था की गई है। इस हिसाब से प्रतिदिन करीब ₹7.5 करोड़ की राशि गोवंश के भरण-पोषण पर खर्च होने का सरकारी दावा है। यानी गोवंश संरक्षण को केवल स्थानीय स्तर की व्यवस्था न रखकर इसके लिए राज्य स्तर पर वित्तीय ढांचा तैयार किया गया है।
2019 में आई निराश्रित गोवंश संरक्षण नीति
योगी सरकार के कार्यकाल में 2 जनवरी 2019 को निराश्रित गोवंश संरक्षण नीति लागू की गई थी। इसका उद्देश्य निराश्रित गोवंश के लिए आश्रय और संरक्षण की व्यवस्था को एक नीति के तहत व्यवस्थित करना था। इसके बाद अस्थायी और स्थायी गो-आश्रय स्थलों के साथ वृहद गो-संरक्षण केंद्रों की व्यवस्था पर भी काम हुआ। सरकारी दस्तावेजों में वृद्ध गो-संरक्षण केंद्रों के निर्माण के लिए प्रति केंद्र ₹1.60 करोड़ तक की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।
UP News: सिर्फ गोशाला नहीं, पशु के इलाज पर भी जोर
गोवंश संरक्षण की दूसरी बड़ी कड़ी पशु स्वास्थ्य है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2017 के बाद प्रदेश में 2,202 पशु चिकित्सालयों के अलावा 39 नए पशु चिकित्सालय और 2,575 पशु सेवा केंद्र स्थापित किए गए। 2024-25 में 520 मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों ने लाखों पशुओं को उपचार उपलब्ध कराया। इस व्यवस्था का मकसद यह है कि पशु के बीमार पड़ने के बाद उसका इलाज केवल गोशाला या पशुपालक के स्तर पर निर्भर न रहे, बल्कि सरकारी पशु चिकित्सा नेटवर्क भी उपलब्ध हो।

लंपी बीमारी के खिलाफ बड़ा टीकाकरण अभियान
पशुओं में लंपी स्किन डिजीज के मामलों के बाद टीकाकरण भी सरकार की प्राथमिकताओं में रहा। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 1.52 करोड़ लंपी टीकाकरण किए गए। वर्ष 2024-25 में कुल पशुओं के लिए 1,648 लाख टीकाकरण किए जाने का भी सरकारी आंकड़ा सामने आया है। इसके साथ पशुपालकों के लिए मोबाइल पशु चिकित्सा सेवाएं और टोल-फ्री पशु चिकित्सा सहायता जैसी व्यवस्थाएं भी विकसित की गई हैं।
UP News: सड़क पर घूमते गोवंश से लेकर परिवारों तक पहुंचाने की योजना
गोशालाओं के अलावा सरकार ने निराश्रित गोवंश को इच्छुक परिवारों और पशुपालकों से जोड़ने की कोशिश भी की है। मुख्यमंत्री निराश्रित/बेसहारा गाय सहभागिता योजना के तहत परिवारों को गाय सौंपने और उनके रखरखाव के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार प्रति गाय ₹1,500 प्रतिमाह की सहायता की व्यवस्था की गई है। सरकारी आंकड़ों में लाखों गोवंश को किसानों और पशुपालक परिवारों से जोड़ने की जानकारी भी दी गई है। इस मॉडल में विचार यह है कि जहां संभव हो, पशु को केवल आश्रय स्थल में रखने के बजाय उसकी देखभाल परिवार के स्तर पर भी कराई जाए।
देसी नस्लों पर भी सरकार का फोकस
गोवंश संरक्षण का एक दूसरा पहलू नस्ल सुधार है। मुख्यमंत्री स्वदेशी गौ-संवर्धन योजना के जरिए साहीवाल, गिर और थारपारकर जैसी स्वदेशी नस्लों को बढ़ावा देने का प्रावधान है। इसके अलावा नंदिनी कृषक समृद्धि योजना के जरिए बड़े स्तर पर दुग्ध उत्पादन और बेहतर नस्ल के पशुओं को बढ़ावा देने की कोशिश की गई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इन योजनाओं के जरिए हजारों पशुपालकों को अनुदान और प्रोत्साहन राशि दी गई है।
UP News: गाय के साथ किसान भी नीति के केंद्र में
योगी सरकार के गोवंश मॉडल का एक हिस्सा यह भी है कि पशुपालन को केवल संरक्षण गतिविधि न मानकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाए। नंदिनी कृषक समृद्धि योजना में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए पशुपालकों को सहायता दी जाती है। उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार योजनाओं में महिलाओं की भागीदारी को भी लक्ष्य बनाया गया है। यानी एक तरफ निराश्रित गोवंश के लिए आश्रय व्यवस्था है, तो दूसरी तरफ दुधारू पशुओं, नस्ल सुधार और डेयरी गतिविधियों को बढ़ाने की कोशिश है।
गोबर से गो-दीप, गोकाष्ठ और जैविक खाद तक
गोशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में गोबर और गोमूत्र के उपयोग पर भी जोर दिया गया है। सरकारी और विभागीय प्रस्तुतियों में वर्मी कम्पोस्ट, गो-दीप, गोकाष्ठ, गोबर से बने गमले, धूपबत्ती और जैविक खाद जैसे उत्पादों का उल्लेख है। कुछ गोशालाओं में महिला स्वयं सहायता समूहों को भी इन गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश की गई है। इसका उद्देश्य गोशाला को केवल खर्च वाली व्यवस्था के बजाय स्थानीय स्तर पर कुछ आय पैदा करने वाली गतिविधियों से जोड़ना है। हालांकि इन गतिविधियों की सफलता हर गोशाला में समान नहीं है। इसलिए अलग-अलग सफल उदाहरणों को पूरे प्रदेश की स्थिति मानने के बजाय उन्हें विकसित हो रहे मॉडल के हिस्से के तौर पर देखना होगा।
UP News: गोचर भूमि और चारे की व्यवस्था पर भी काम
गोवंश के संरक्षण में सबसे जरूरी चीजों में चारा और जमीन भी शामिल है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हजारों हेक्टेयर गोचर भूमि को चिन्हित कर हरे चारे के उत्पादन से जोड़ने का काम किया गया है। चारा नीति के तहत नेपियर घास जैसे हरे चारे के उत्पादन को भी बढ़ावा दिया गया। इससे गोशालाओं के लिए चारे की उपलब्धता बढ़ाने और पशुपालन को चारा उत्पादन से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।
गोसेवा से डेयरी तक पहुंची नीति
उत्तर प्रदेश में पशुधन का आकार भी इस पूरी कहानी का बड़ा हिस्सा है। 2019 की पशुगणना के अनुसार राज्य में करीब 1.90 करोड़ गोवंश दर्ज किए गए थे। इसी वजह से प्रदेश के लिए गोवंश संरक्षण केवल कुछ हजार पशुओं की देखभाल का विषय नहीं, बल्कि करोड़ों पशुओं से जुड़ा बड़ा प्रशासनिक और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुद्दा है। इसी बड़े आधार को देखते हुए सरकार ने संरक्षण के साथ पशुपालन, नस्ल सुधार और दुग्ध उत्पादन को भी अपनी योजनाओं में जोड़ा है।
UP News: अब तस्वीर में सबसे बड़ा बदलाव क्या है?
आज जब योगी आदित्यनाथ गोशाला में जाकर गायों को चारा खिलाते हैं, तो सामने केवल एक मुख्यमंत्री की गोसेवा की तस्वीर नहीं होती। उसके पीछे पिछले वर्षों में तैयार हुआ एक बड़ा सरकारी ढांचा भी दिखाई देता है जिसमे गो-आश्रय स्थल, पशु चिकित्सा, टीकाकरण, पशुपालक सहायता, नस्ल सुधार, चारा व्यवस्था और गो-उत्पादों के इस्तेमाल के कार्य शामिल हैं। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 7,717 गो-आश्रय स्थलों में 12.52 लाख गोवंश का संरक्षण किया जा रहा है। वहीं पशु स्वास्थ्य के लिए हजारों चिकित्सालयों और सेवा केंद्रों का नेटवर्क, बड़े पैमाने पर टीकाकरण और मोबाइल पशु चिकित्सा सेवाएं भी इस व्यवस्था का हिस्सा हैं। यही वजह है कि आज की गोशाला यात्रा को केवल एक दिन की तस्वीर के रूप में देखने के बजाय उत्तर प्रदेश में पिछले वर्षों से चल रहे गोवंश संरक्षण मॉडल की एक झलक के तौर पर देखा जा सकता है।
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