Opinion: एक राजनेता की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि वह कैसे विषम से विषम परिस्थितियों में भी अपने साथियों को एकजुट रख सकता है। नेतृत्व को समझना होता है कि वह मुद्दों पर संघर्ष की रणनीति तय करने में सहयोगियों को कैसे विश्वास में ले? विडंबना ही है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी देश में NDA गठबंधन के खिलाफ विपक्षी दलों के INDIA गंठबंधन को खड़ा करने की कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन उन्हें इसमें अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। इंडिया गठबंधन तो छोडिये उन्हें कांग्रेस कुनबे को संभालने की परेशानी से भी जूझना पड़ रहा है। क्या राहुल गांधी विचार कर पाएंगे कि ऐसा क्यों हो रहा है? बताया जाता है कि 6 अक्टूबर 2026 को चुनाव आयोग के खिलाफ आयोजित INDIA ब्लॉक के विरोध मार्च में शामिल होने के लिए द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) आम आदमी पार्टी(AAP) को भी निमंत्रण भेजा गया था, लेकिन दोनों ही नहीं पहुंची।
काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती
AAP का तो समझ में आता है कि उसका अगला लक्ष्य पंजाब विधानसभा चुनाव है और वहां कांग्रेस उसके सामने होगी।असली सवाल यह है कि राहुल गांधी DMK से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह उनके ध्वज तले खड़ी हो जाए? हालांकि राजनीति में पुराने मतभेद भुला दिये जाने की परंपरा है, लेकिन कहते हैं कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। क्या राहुल गांधी अहसास कर पाएंगे कि आज उन्हीं की वजह से DMK जैसी बड़ी पार्टी INDIA ब्लॉक से दूरी बनाए हुए है? यदि कांग्रेस ने तमिलनाडु में विजय थलपति सरकार में शामिल होने का लालच छोड़ दिया होता, तो आज द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) भी INDIA ब्लॉक में होती।नेता की सोच में दूरदर्शिता होनी चाहिए कि आखिर लंबी रेस में बने रहने के लिए क्या जरूरी होता है? उसे तय करना होता है कि किसे छोड़ना उचित रहेगा और किसे पकड़े रखना जरूरी है?
Opinion: राहुल को नेता नहीं मानते!
यह बात भी किसी से छिपी हुई नहीं है कि इंडिया ब्लॉक के दल राहुल गांधी को अपना सर्वमान्य नेता मानने को तैयार नहीं हैं। स्थिति यह है कि आज ममता बनर्जी के पास खोने को बहुत ज्यादा नहीं बचा हुआ है, लेकिन हाल में जब उनसे राहुल के नेतृत्व को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने भी बड़े राजनीतिक कौशल से उस सवाल को टाल दिया। सपा प्रमुख अखिलेश यादव कैसे उन्हें नेता मान लेंगे, वे तो यूपी में कांग्रेस को सीटें भी अपनी शर्तों पर देना चाहते हैं? राहुल गांधी के लिए मंथन का विषय है कि आखिर वे सहयोगी दलों में अपने प्रति विश्वास क्यों नहीं पैदा कर पाए हैं?
कांग्रेस के भीतर समन्वय का अभाव
INDIA ब्लॉक के बाद अब कांग्रेस संगठन की मजबूती पर बात करें, तो यहां भी कांग्रेस नेतृत्व कमजोर साबित हो रहा है। हालांकि कांग्रेस आलाकमान तर्क दे सकता है कि हाल में आम आदमी पार्टी की मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़, उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री श्याम सुंदर शर्मा सरीखे नेताओं ने उसका दामन थामा है। कहा जा सकता है कि कांग्रेस का कुनबा बढ़ रहा है, लेकिन देखने की बात यह भी है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान कांग्रेस के कितने बड़े दिग्गज नेता पार्टी छोड़कर चले गए। इन नेताओं में से कुछ को यह शिकायत रही कि राहुल गांधी ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। आज की स्थिति यह है कि केंद्रीय नेता राज्यों से समन्वय हीं बिठा पा रहे हैं। ताजा उदाहरण उत्तराखंड कांग्रेस की प्रभारी शैलजा कुमारी और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बीच मचा घमासान है। शैलजा रावत को चेतावनी दे चुकी हैं कि वे पार्टी कार्यक्रमों के समानंतर कार्यक्रम न करें, लेकिन रावत बगावती मूड में दिखाई देते हैं।उन्होंने अपने कार्यक्रम जारी रखे हुए हैं। रावत कांग्रेस के बहुत पुराने नेता हैं, यदि वाकई उनके नेतृत्व में बगावत होती है, तो फिर राज्य में कांग्रेस कहां बचेगी? राहुल गांधी को सोचना होगा कि विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उत्तराखंड जैसे राज्य में कांग्रेस किस हाल में है और क्यों है?









