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भारतीय वायुसेना के वो 4 ऑपरेशन, जिन्होंने दुनिया को चौंकाया! ढाका से मालदीव और इस्लामाबाद तक की कहानी

Air Force Day: भारतीय वायुसेना की कहानी सिर्फ हवाई युद्ध और दुश्मन के विमानों को मार गिराने तक सीमित नहीं रही है। कई मौकों पर उसके सामने ऐसे मिशन आए, जहां कुछ ही मिनटों में फैसला लेना था, हजारों किलोमीटर दूर जाकर मदद पहुंचानी थी या फिर बेहद ऊंचाई पर उड़ते हुए खुफिया जानकारी जुटानी थी।

1971 में ढाका के गवर्नर हाउस पर हुआ हमला हो, 1987 में जाफना तक राहत सामग्री पहुंचाने का ऑपरेशन पूमलाई, 1988 में मालदीव में तख्तापलट नाकाम करने वाला ऑपरेशन कैक्टस या 1997 में पाकिस्तान के ऊपर MiG-25 की गुप्त उड़ान-इन चारों अभियानों की प्रकृति अलग थी। लेकिन एक बात समान थी- तेज फैसला, सटीक योजना और जोखिम के बीच मिशन को पूरा करना। वायुसेना दिवस के मौके पर जानिए भारतीय वायुसेना के इन चार चर्चित ऑपरेशनों की पूरी कहानी।

1. ढाका में 128 रॉकेट और कुछ मिनटों में बदल गया पूरा खेल

साल 1971। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध निर्णायक दौर में पहुंच चुका था। भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान में तेजी से आगे बढ़ रही थी और उसका लक्ष्य ढाका था। 14 दिसंबर को भारतीय पक्ष को पता चला कि पूर्वी पाकिस्तान के गवर्नर एएम मलिक के नेतृत्व में एक अहम कैबिनेट बैठक होने वाली है। बैठक गवर्नर हाउस में होनी थी। इस सूचना को भारतीय सेना के लिए रणनीतिक मौका माना गया। योजना बनी कि बैठक के दौरान गवर्नर हाउस पर ऐसा हवाई हमला किया जाए, जिससे वहां मौजूद नेतृत्व पर मनोवैज्ञानिक दबाव बने और उन्हें यह अहसास हो कि ढाका अब सुरक्षित नहीं है। लेकिन इस मिशन में सबसे बड़ा खतरा था- टारगेट की पहचान।

Air Force Day: आखिरी वक्त में बदला टारगेट

हमले के लिए गुवाहाटी की 28 स्क्वाड्रन के MiG-21 और हाशिमारा की 37 स्क्वाड्रन के Hunter विमान तैयार किए गए। लेकिन जल्दबाजी में पायलटों को गवर्नर हाउस के बजाय सर्किट हाउस को निशाना बताए जाने की बात सामने आई। विमान उड़ान भरने ही वाले थे कि उन्हें सही जानकारी दी गई कि असली लक्ष्य गवर्नर हाउस है। समस्या यह थी कि पायलटों के पास लक्ष्य की नई लोकेशन समझने के लिए लगभग कोई समय नहीं था। उनके पास विस्तृत आधुनिक डिजिटल मैप भी नहीं थे। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, ढाका का टूरिस्ट मैप ही नेविगेशन में मददगार बना। जब विमान ढाका पहुंचे तो पायलटों ने सरकारी परिसर के बाहर खड़ी गाड़ियों और इमारत की पहचान के आधार पर गवर्नर हाउस को लक्ष्य बनाया। इसके बाद कुछ ही मिनटों में 128 रॉकेट दागे गए।

ऐतिहासिक विवरणों में भी 128 रॉकेटों से गवर्नर हाउस पर हमले का उल्लेख मिलता है। हमले का मकसद सिर्फ इमारत को नुकसान पहुंचाना नहीं था। असली निशाना था- पूर्वी पाकिस्तान के प्रशासनिक और राजनीतिक नेतृत्व का मनोबल। हमले के बाद गवर्नर मलिक ने इस्तीफा दे दिया और उनके मंत्रिमंडल ने संयुक्त राष्ट्र के झंडे के नीचे शरण ली।  दो दिन बाद, 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी ने भारतीय कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण किया। इसके साथ ही बांग्लादेश के निर्माण का रास्ता साफ हुआ। यानी ढाका का यह हवाई हमला अकेला युद्धक हमला नहीं था, बल्कि सैन्य दबाव के साथ मनोवैज्ञानिक युद्ध का भी उदाहरण बन गया।

2. जब भारतीय वायुसेना जाफना में राहत लेकर पहुंची

1971 के करीब डेढ़ दशक बाद भारतीय वायुसेना के सामने बिल्कुल अलग तरह का मिशन आया। 1987 में श्रीलंका का जाफना प्रायद्वीप LTTE के नियंत्रण में था। श्रीलंकाई सेना ने इलाके को घेर रखा था और भोजन, दवा तथा दूसरी जरूरी चीजों की सप्लाई प्रभावित हो गई थी। भारत ने राहत सामग्री पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन समुद्र के रास्ते भेजे गए भारतीय राहत बेड़े को श्रीलंकाई नौसेना ने रोक दिया। इसके बाद भारत ने फैसला किया कि राहत समुद्र से नहीं, आसमान से पहुंचाई जाएगी।

Air Force Day: ऑपरेशन पूमलाई क्या था?

4 जून 1987 को भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन पूमलाई, जिसे Eagle Mission 4 भी कहा गया, शुरू किया। AN-32 परिवहन विमानों में राहत सामग्री लादी गई और उनके साथ Mirage-2000 लड़ाकू विमान भेजे गए। Mirage विमानों का काम सिर्फ एस्कॉर्ट करना नहीं था, बल्कि यह संदेश भी था कि राहत मिशन को रोकने की कोशिश हुई तो भारत प्रतिक्रिया देने की क्षमता रखता है। भारतीय विमानों ने जाफना के पास जाकर करीब 25 टन राहत सामग्री पैराशूट के जरिए गिराई। Mirage-2000 के साथ AN-32 का यह अभियान भारतीय वायुसेना के इतिहास में एक अनोखा मिशन माना जाता है। श्रीलंका ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया, जबकि भारत ने इसे मानवीय सहायता का अभियान कहा।

Air Force Day
Air Force Day

इसका असर सिर्फ राहत सामग्री पहुंचाने तक सीमित नहीं रहा। इसके बाद भारत और श्रीलंका के बीच बातचीत आगे बढ़ी और 29 जुलाई 1987 को भारत-श्रीलंका समझौता हुआ। हालांकि आगे चलकर भारतीय शांति सेना और LTTE के बीच ही संघर्ष हुआ और श्रीलंका का पूरा अध्याय भारत के लिए बेहद जटिल साबित हुआ। यानी ऑपरेशन पूमलाई की खासियत थी कि यह युद्ध शुरू करने के लिए नहीं, बल्कि दबाव के बीच मानवीय सहायता पहुंचाने के लिए किया गया हवाई अभियान था।

3. ऑपरेशन कैक्टस: 2500 किलोमीटर दूर मालदीव में तख्तापलट नाकाम

अब कहानी पहुंचती है 1988 के मालदीव की। 3 नवंबर 1988 को हथियारबंद लड़ाकों ने मालदीव की राजधानी माले में तख्तापलट की कोशिश की। राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम की सरकार खतरे में थी। हमलावरों ने महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठानों पर कब्जा कर लिया और राष्ट्रपति को भी तलाश रहे थे। गयूम ने कई देशों से मदद मांगी। लेकिन भारत ने सबसे तेज प्रतिक्रिया दी। भारत ने ऑपरेशन कैक्टस शुरू किया। विदेश मंत्रालय के ऐतिहासिक रिकॉर्ड में भी इसे मालदीव सरकार के अनुरोध पर तख्तापलट रोकने के लिए भारतीय सैन्य हस्तक्षेप के रूप में दर्ज किया गया है।

Air Force Day: मुश्किल थी 2500 किलोमीटर की दूरी

आगरा से IL-76 परिवहन विमान तैयार किए गए। इनमें भारतीय पैराट्रूपर्स, हथियार और जरूरी सामान था। Mirage-2000 विमानों को भी मिशन में शामिल किया गया। सबसे बड़ी चुनौती थी- मालदीव के हुलहुले एयरपोर्ट पर भारी IL-76 को उतारना। रनवे छोटा था और रात का समय था। बताया जाता है कि रनवे की लाइटें बेहद थोड़े समय के लिए जलाई गईं। पहला IL-76 रात करीब 9:48 बजे हुलहुले में उतरा। इसके बाद भारतीय सैनिकों ने तेजी से एयरपोर्ट को सुरक्षित किया और फिर नावों के जरिए माले की ओर बढ़े।राष्ट्रपति गयूम को सुरक्षित निकाला गया और कुछ ही घंटों में तख्तापलट की कोशिश विफल हो गई। इस ऑपरेशन की खासियत सिर्फ उसकी गति नहीं थी। असल चुनौती थी-भारत से हजारों किलोमीटर दूर एक छोटे द्वीपीय देश में बिना किसी लंबी तैयारी के सैनिकों को पहुंचाना और एयरपोर्ट से लेकर राजधानी तक नियंत्रण स्थापित करना। बाद में भाग रहे हमलावरों को भारतीय नौसेना ने भी रोका और बंधकों को छुड़ाया। विदेश मंत्रालय आज भी ऑपरेशन कैक्टस को भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा भूमिका के उल्लेखनीय उदाहरणों में गिनता है।

4. इस्लामाबाद के ऊपर MiG-25, फिर गूंजी सोनिक बूम की आवाज

अगर पहले तीन ऑपरेशन अपनी खुली कार्रवाई के लिए चर्चित हैं, तो चौथा मिशन अपनी गोपनीयता के लिए जाना जाता है। 27 मई 1997 को इस्लामाबाद के आसमान में अचानक तेज धमाके जैसी आवाजें सुनाई दीं। पाकिस्तान ने दावा किया कि भारतीय वायुसेना का MiG-25 उसके हवाई क्षेत्र में दाखिल हुआ था। MiG-25 कोई सामान्य लड़ाकू विमान नहीं था। भारत ने इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से हाई-एल्टीट्यूड टोही यानी reconnaissance के लिए किया था। भारत के पास 102 Squadron ‘Trisonics’ के तहत MiG-25R विमान थे। यह विमान बेहद ऊंचाई और बेहद तेज गति से उड़ सकता था।

Air Force Day: आखिर MiG-25 को इतना खास क्यों माना जाता था?

MiG-25 को NATO ने ‘Foxbat’ नाम दिया था। इसकी सबसे बड़ी ताकत थी- ऊंचाई और रफ्तार। यह लगभग 65 हजार फीट या उससे ज्यादा ऊंचाई पर उड़ सकता था और Mach 2 से अधिक की गति हासिल कर सकता था। 1997 के मिशन को लेकर लंबे समय तक आधिकारिक स्तर पर चुप्पी रही। लेकिन अक्टूबर 2026 में सामने आई नई रिपोर्टिंग में उस समय 102 Squadron से जुड़े रिटायर्ड विंग कमांडर प्रदीप जसवंत थाकुर ने पुष्टि की कि एक MiG-25 वास्तव में पाकिस्तान के ऊपर गया था।

उनके मुताबिक विमान करीब 65,617 फीट की ऊंचाई पर था और Mach 2.4 की गति से उड़ रहा था। यानी जिस घटना को दशकों तक रहस्य की तरह देखा जाता रहा, उसके बारे में अब ज्यादा स्पष्ट जानकारी सामने आई है। विमान ने संवेदनशील इलाकों की तस्वीरें लेने वाला टोही मिशन किया था। लौटते समय पैदा हुई sonic boom की आवाज ने पाकिस्तान में हलचल मचा दी। MiG-25 का भारतीय वायुसेना में सफर 2006 में खत्म हुआ। उस समय तक उपग्रहों और आधुनिक निगरानी प्रणालियों ने ऐसे विमानों की भूमिका काफी हद तक बदल दी थी।

चार ऑपरेशन, चार अलग-अलग चुनौतियां

इन चारों अभियानों को एक साथ देखें तो भारतीय वायुसेना की भूमिका का एक बड़ा चित्र सामने आता है। 1971 का ढाका दिखाता है कि हवाई शक्ति का इस्तेमाल दुश्मन के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए कैसे किया जा सकता है। 1987 का ऑपरेशन पूमलाई बताता है कि लड़ाकू विमान सिर्फ हमला करने के लिए नहीं, बल्कि मानवीय सहायता पहुंचाने वाले मिशन को सुरक्षा देने के लिए भी इस्तेमाल हो सकते हैं। 1988 का ऑपरेशन कैक्टस भारत की रणनीतिक पहुंच और एयरलिफ्ट क्षमता का उदाहरण है- जब हजारों किलोमीटर दूर कुछ घंटों में सैनिकों को पहुंचाकर एक तख्तापलट की कोशिश को नाकाम किया गया।

और 1997 का MiG-25 मिशन बताता है कि आधुनिक युद्ध में आसमान पर नियंत्रण का मतलब सिर्फ मिसाइल और बम नहीं, बल्कि दुश्मन की रणनीतिक गतिविधियों की जानकारी जुटाना भी है। यही वजह है कि भारतीय वायुसेना का इतिहास सिर्फ हवाई लड़ाइयों का इतिहास नहीं है। इसमें सटीक हमला, रणनीतिक एयरलिफ्ट, मानवीय सहायता, खुफिया निगरानी और संकट के समय त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया सब शामिल हैं। इन चार अभियानों की कहानियां इसी बदलती भूमिका की चार अलग-अलग तस्वीरें पेश करती हैं।

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