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दिग्विजय सिंह की धार्मिक यात्रा के पीछे क्या है सियासी गणित? कांग्रेस की दूरी से UP चुनाव तक, समझिए पूरा मामला

Digvijaya Singh Yatra: मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने उज्जैन के महाकाल मंदिर से अयोध्या के राम मंदिर तक ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ शुरू की है। करीब 930-950 किलोमीटर की इस यात्रा को 70 दिनों में पूरा करने का लक्ष्य है। दिग्विजय इसे अपनी निजी यात्रा बता रहे हैं, लेकिन इसके धार्मिक प्रतीकों, भाजपा पर हमलों और उत्तर प्रदेश में होने वाले 2027 के विधानसभा चुनाव के संदर्भ ने इसे राजनीतिक चर्चा का विषय बना दिया है। सवाल यह है कि इस यात्रा से दिग्विजय क्या हासिल करना चाहते हैं और कांग्रेस इससे दूरी क्यों बनाए हुए है?

सवाल 1: दिग्विजय सिंह ने अभी धार्मिक यात्रा क्यों शुरू की?

दिग्विजय सिंह की यात्रा के पीछे कई संभावित राजनीतिक और धार्मिक संदर्भ दिखाई देते हैं। इनमें राम मंदिर में चढ़ावे की गिनती से जुड़ा मामला, दिग्विजय की राजनीतिक भूमिका और उत्तर प्रदेश का चुनावी कैलेंडर प्रमुख हैं। राम मंदिर में चढ़ावे का मामला: उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, राम मंदिर में दान की गिनती के दौरान कथित चोरी का मामला 4 जून 2026 को सामने आया था। इसके बाद 25 जून को FIR दर्ज हुई और गिनती से जुड़े आठ कर्मचारियों की गिरफ्तारी की खबर आई। रिपोर्टों के मुताबिक, SIT ने सितंबर में चार्जशीट दाखिल की, जिसमें CCTV फुटेज से जुड़ी 105 से अधिक घटनाओं और 79.85 लाख रुपये की बरामदगी का उल्लेख है।

कांग्रेस ने इस मामले में उच्च स्तर पर जवाबदेही तय करने और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच कराने की मांग की है। दिग्विजय सिंह ने कथित गड़बड़ी की रकम 200-300 करोड़ रुपये होने और आठ महीने की CCTV फुटेज मिटाए जाने का दावा भी किया है। हालांकि, इन दावों को चार्जशीट में दर्ज तथ्यों से अलग समझना जरूरी है।

राजनीतिक प्रासंगिकता का सवाल: दिग्विजय सिंह 2019 में भोपाल और 2024 में राजगढ़ से लोकसभा चुनाव हार चुके हैं। वे राज्यसभा में तीसरा कार्यकाल नहीं लेने की बात भी कह चुके हैं। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक राशिद किदवई के मुताबिक, यह यात्रा उन्हें सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा में बनाए रखने का माध्यम भी हो सकती है। उत्तर प्रदेश चुनाव: यूपी में 2027 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने की संभावना है। यात्रा का निर्धारित कार्यक्रम दिसंबर के आखिर तक जा सकता है। इसलिए इसका एक हिस्सा चुनावी माहौल के करीब पड़ेगा।

Digvijaya Singh Yatra: सवाल 2: महाकाल से अयोध्या तक यात्रा निकालने का क्या संदेश है?

इस यात्रा का धार्मिक और राजनीतिक, दोनों तरह का प्रतीकात्मक पक्ष है। इसे ‘शिवधाम से रामधाम’ की यात्रा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। शुरुआत में दिग्विजय सिंह ने चिंतामन गणेश के दर्शन, पार्थिव शिवलिंग पूजन और कन्या पूजन के बाद महाकालेश्वर मंदिर में पूजा की। यात्रा के रथ पर राम दरबार रखा गया है। साथ ही गंगा, यमुना, शिप्रा, कावेरी और नर्मदा नदियों का जल भी शामिल होने की जानकारी दी गई है। यात्रा को कुछ संतों का आशीर्वाद मिलने की बात भी सामने आई है। दिग्विजय सिंह का तर्क है कि मंदिरों में आने वाले चढ़ावे का हिसाब पारदर्शी होना चाहिए और गड़बड़ी की जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। वे मतदाता सूची और कथित वोट चोरी के मुद्दे पर निष्पक्ष जांच की मांग भी उठा रहे हैं। इसके साथ ही वे EVM की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग करते रहे हैं।

भाजपा नेताओं ने इस यात्रा की आलोचना की है। उज्जैन से भाजपा सांसद अनिल फिरोजिया ने इसे ‘राजनीतिक नौटंकी’ बताया। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने भी राम मंदिर और सनातन धर्म को लेकर कांग्रेस की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। इस तरह यात्रा में धार्मिक आस्था के प्रतीकों के साथ मंदिरों की जवाबदेही, चुनाव प्रक्रिया और भाजपा-RSS की विचारधारा से जुड़े राजनीतिक सवाल भी शामिल हैं।

Digvijaya Singh Yatra
                                                                             Digvijaya Singh Yatra
सवाल 3: क्या दिग्विजय सिंह भाजपा की हिंदुत्व राजनीति को चुनौती दे रहे हैं?

दिग्विजय सिंह का कहना है कि उनकी लड़ाई हिंदू धर्म से नहीं, बल्कि भाजपा और RSS की विचारधारा से है। वे सनातन धर्म के मूल संदेश को सभी प्राणियों के कल्याण और सद्भाव से जोड़कर देखते हैं। राजनीतिक विश्लेषक राशिद किदवई के मुताबिक, दिग्विजय इस यात्रा के जरिए मंदिरों में चढ़ावे के हिसाब और कथित वोट चोरी जैसे मुद्दों को चर्चा में बनाए रखना चाहते हैं। इस दृष्टि से यात्रा धार्मिक आस्था के साथ राजनीतिक जवाबदेही का सवाल भी उठाती है।दूसरी ओर, भाजपा नेता दिग्विजय के पुराने बयानों और राम मंदिर से जुड़े उनके रुख का हवाला देकर उन पर सवाल उठा रहे हैं। भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने भी उनके सनातन धर्म के प्रति रुख पर आपत्ति जताई है।

दिग्विजय सिंह इससे पहले 2017-18 में नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। उस यात्रा के दौरान उन्होंने धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया था और अलग-अलग विचारधाराओं के लोगों से संपर्क भी बनाया था। मौजूदा यात्रा में वे भाजपा और RSS की विचारधारा पर ज्यादा सीधा राजनीतिक हमला कर रहे हैं। हालांकि, यह यात्रा भाजपा की हिंदुत्व राजनीति को कितनी चुनौती दे पाएगी, इसका आकलन केवल धार्मिक प्रतीकों या बयानों से नहीं किया जा सकता। इसके लिए स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया, यात्रा में शामिल होने वालों की संख्या और राजनीतिक संगठनों की भागीदारी देखनी होगी।

Digvijaya Singh Yatra: सवाल 4: कांग्रेस इस यात्रा से दूरी क्यों बनाए हुए है?

दिग्विजय सिंह ने यात्रा को निजी बताया है और कांग्रेस की ओर से इसे औपचारिक पार्टी कार्यक्रम के रूप में पेश नहीं किया गया है। इसके बावजूद मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी यात्रा के पहले दिन मौजूद रहे। यही बात कांग्रेस के रुख को चर्चा में ला रही है। सेकुलर छवि का सवाल: राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, कांग्रेस के लिए धार्मिक यात्रा से औपचारिक रूप से जुड़ने और उससे दूरी बनाए रखने के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। पार्टी एक ओर मंदिर में कथित चढ़ावा गड़बड़ी के मामले में जांच की मांग कर रही है, दूसरी ओर वह अपनी राजनीतिक पहचान और सामाजिक आधार को भी ध्यान में रखती है।

उत्तर प्रदेश में संगठन की रणनीति: यूपी में कांग्रेस को अपना संगठन मजबूत करने और सामाजिक आधार बढ़ाने की चुनौती है। ऐसे में दिग्विजय की यात्रा को पार्टी की आधिकारिक रणनीति मानना सही नहीं होगा, जब तक कांग्रेस नेतृत्व खुद इसकी पुष्टि न करे। समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन: कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने 2024 का लोकसभा चुनाव साथ लड़ा था। आगामी विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे और चुनावी रणनीति को लेकर दोनों दलों के बीच बातचीत महत्वपूर्ण होगी। ऐसे में दिग्विजय की यात्रा से गठबंधन की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

कुल मिलाकर, कांग्रेस की दूरी को पार्टी की घोषित रणनीति मानने के बजाय उसके सार्वजनिक बयानों और नेताओं की भागीदारी के संदर्भ में देखना चाहिए। यात्रा के प्रति पार्टी का वास्तविक रुख आगे की गतिविधियों से अधिक साफ हो सकता है।

Digvijaya Singh Yatra
                                                     Digvijaya Singh Yatra
सवाल 5: इस यात्रा से दिग्विजय सिंह और कांग्रेस को क्या हासिल हो सकता है?

यात्रा का राजनीतिक असर कई बातों पर निर्भर करेगा। सबसे अहम यह होगा कि मध्य प्रदेश के बाद उत्तर प्रदेश में इसे कैसी प्रतिक्रिया मिलती है। पहली संभावना- यात्रा को समर्थन मिलता है: यदि बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और कार्यकर्ता इससे जुड़ते हैं, तो दिग्विजय सिंह की राजनीतिक सक्रियता चर्चा में रह सकती है। कांग्रेस को भी मंदिरों की जवाबदेही और चुनावी पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना बन सकती है, भले ही वह यात्रा को अपना आधिकारिक कार्यक्रम न बताए।

दूसरी संभावना- यात्रा का असर यूपी में ज्यादा दिखता है: राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में यात्रा के पड़ाव और वहां के लोगों की प्रतिक्रिया अहम होगी। यदि स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता और अन्य राजनीतिक नेता इसमें शामिल होते हैं, तो यह प्रदेश में पार्टी की गतिविधियों को लेकर चर्चा बढ़ा सकती है। हालांकि, इससे सीधे चुनावी लाभ का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी।

तीसरी संभावना- यात्रा को सीमित प्रतिक्रिया मिलती है: यदि लोगों की भागीदारी कम रहती है या यात्रा का संदेश व्यापक स्तर पर नहीं पहुंचता, तो इसका राजनीतिक असर भी सीमित रह सकता है। ऐसी स्थिति में दिग्विजय की व्यक्तिगत राजनीतिक पहल पर सवाल उठ सकते हैं, जबकि कांग्रेस इसे निजी यात्रा बताकर अपना अलग रुख बनाए रख सकती है।

दिग्विजय सिंह की पिछली नर्मदा परिक्रमा का उदाहरण अक्सर इस संदर्भ में दिया जाता है। 2017-18 में उन्होंने करीब 3,300 किलोमीटर की यात्रा की थी। इसके कुछ महीनों बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में लौटी। लेकिन केवल समय के इस क्रम से यह साबित नहीं होता कि कांग्रेस की जीत का कारण परिक्रमा ही थी। चुनावी नतीजों पर कई राजनीतिक और सामाजिक कारक असर डालते हैं। दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी कुछ विश्लेषकों ने संभावनाएं जताई हैं। हालांकि, यात्रा के जरिए उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाने की मंशा का कोई पुष्ट प्रमाण सामने नहीं है। इसलिए इस पहलू को फिलहाल अटकल के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

Digvijaya Singh Yatra: यात्रा की असली परीक्षा कहां होगी?

दिग्विजय सिंह की ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ धार्मिक आस्था, मंदिरों में जवाबदेही और भाजपा की विचारधारा के विरोध को एक साथ सामने ला रही है। कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह चढ़ावे से जुड़े मामले और चुनावी पारदर्शिता पर अपना रुख बनाए रखते हुए यात्रा से अपने संबंध को कैसे स्पष्ट करती है। आखिरकार, यात्रा का राजनीतिक महत्व इस बात से तय होगा कि रास्ते में लोगों की प्रतिक्रिया कैसी रहती है, उत्तर प्रदेश में स्थानीय कार्यकर्ता और नेता कितना जुड़ते हैं और क्या इससे उठाए गए मुद्दे लंबे समय तक चर्चा में बने रहते हैं। राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़े मामले की जांच में आगे क्या सामने आता है, वह भी इस बहस को प्रभावित कर सकता है।

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