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झूठ के पैर नहीं होते; अभिजीत दीपके, दिल्ली पुलिस और वीडियो

झूठ के पैर नहीं होते; अभिजीत दीपके, दिल्ली पुलिस और वीडियो
झूठ के पैर नहीं होते; अभिजीत दीपके, दिल्ली पुलिस और वीडियो
Opinion: भारत एक ऐसा देश है जहां वैदिक-पौराणिक काल से अपनों के तो क्या शत्रु के अंतिम संस्कार में भी शामिल होने की परंपरा चली आ रही है। महाभारत युद्ध में दोनों पक्षों की सेनाएं एक-दूसरे के प्राण हरने को आतुर रहती थी, लेकिन जब किसी सैनिक की मौत होती थी, तो उसके अंतिम संस्कार में शामिल होना दोनों पक्षों के योद्धा अपना धर्म समझते थे। आज भी जब जेल में बंद किसी अपराधी के परिजन की मौत हो जाती है, तो उसे अंतिम संस्कार में शामिल होने का अवसर दिया जाता है, लेकिन यदि कोई अपनी राजनीति चमकाने की नीति और नीयत से पुलिस के सिर पर जबरन यह दोष मढ़े कि उसे उसकी दादी के अंतिम संस्कार में शामिल होने से वंचित किया गया, तो उस आदमी के बारे में क्या कहें? दुनिया में इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है? इससे बड़ा कुत्सित प्रयास और क्या हो सकता है?

अभिजीत दीपके, उनके परिजनों और समर्थकों का आरोप

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके, उनके परिजनों और समर्थकों का आरोप है कि दिल्ली पुलिस ने उन्हें उनकी दादी के निधन के बाद न तो फोन करने दिया, न वकील से बात करने दी।अभिजीत के चाचा ने तो यहां तक कहा कि उन्होंने दिल्ली पुलिस से कम से कम 10 बार विनती की कि अभिजीत को छोड़ दिया जाए, लेकिन जब उन्हें छोड़ा गया तो तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अभिजीत अपनी दादी के अंतिस संस्कार में शामिल नहीं हो सके।अभिजीत की मां को भी इस बात की शिकायत है। वास्तव में दादी और पोते का रिश्ता इतना गहरा और भावुक होता है कि दादी के अंतिम संस्कार में शामिल न हो पाना पोते को जिंदगी भर का गम दे सकता है, लेकिन जब पोता अपनी राजनीति चमकाने के लिए दादी की मौत को भी आपदा में अवसर मान ले तो इसे क्या कहा जाएगा?

Opinion: क्या दिशा देंगे देश को?

कहते हैं कि झूठ के पैर नहीं होते। वह रेंगकर चलने की कोशिश करे भी तो कितनी दूर तक जा सकता है? कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने तो झूठ की इंतिहा ही कर डाली। शायद अभिजीत दीपके ने सोचा होगा कि झूठ बोलकर वे जनता की सहानुभूति बटोर लेंगे, लेकिन जिस पुलिस को वे अमानवीय और हिंसक साबित करने की कोशिश कर रहे थे, उसी ने उनके ढोल की पोल खोलकर रख दी।कितनी दुखद बात है कि जो आदमी देश को दिशा देने और बदलाव लाने के दावे कर रहा है, उसे अपनी दादी की मौत का इस्तेमाल पुलिस की छवि खराब करने के लिए करना पड़ रहा है। अपनी राजनीति चमकाने के लिए करना पड़ रहा है। जिस आदमी का चरित्र ऐसा हो, वह देश को दिशा देने की बात करे, तो इससे ज्यादा हास्यास्पद और क्या हो सकता है?

पुलिस ने खोली ढोल की पोल

दिल्ली पुलिस ने अभिजीत दीपके, उनके परिजनों और समर्थकों के आरोपों को सिरे से खारिज किया। पुलिस का कहना है कि उन्होंने संवेदनशीलता दिखाते हुए तुरंत अभिजीत को उनकी दादी के निधन की सूचना दी, उन्हें परिजनों से बात करने का विकल्प दिया और उनके गृह नगर जाने के लिए यात्रा में मदद की पेशकश भी की गई थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया।पुलिस ने अपनी बात के समर्थन में एक वीडियो भी जारी किया है, जिसमें दीपके को उनकी दादी के निधन के बारे में बताया जा रहा है। वीडियो में साफ दिख रहा है कि दीपके एक बेंच पर बैठे हैं। एक लेडी पुलिस अधिकारी आकर उन्हें यह बताती हैं कि आपकी दादी का निधन हो गया है। इस पर दीपके  भावुक हो गए।फिर पुलिस के एक दूसरे अधिकारी उन्हें पानी की बोतल देते दिखाई देते हैं।पुलिस के अधिकारी यह कहते सुनाई पड़ रहे हैं कि यदि आप अपने घर में किसी से बात करना चाहते हैं, तो नंबर बताइए, हम आपकी बात करा देंगे।पुलिस उन्हें यात्रा में सहयोग देने की बात भी कर रही है। 

Opinion: क्या इतना साहस दिखा पाएंगे अभिजीत दीपके?

अब सवाल यह है कि अभिजीत दीपके, उनके समर्थकों और परिजनों की बात को सच मानें कि उस वीडियो पर भी विश्वास करें जिसे पुलिस ने जारी किया है। पुलिस ने जो वीडियो जारी किया है उसे देखने पर तो साफ लगता है कि अभिजीत दीपके ने पुलिस पर झूठा आरोप लगाया है। अगर अभिजीत दीपके सच्चे हैं, तो उन्हें, उनके परिजनों और समर्थकों को अब यह मांग जोर-शोर से उठानी चाहिए कि पुलिस ने जो वीडियो जारी किया है, उसकी सत्यता की जांच की जाए। क्या वे इतना साहस दिखा पाएंगे?  अगर वे इस मांग को जोरदार ढंग से उठाते हैं, तो देश के लोगों की उनके प्रति वास्तव में सहानुभूति होगी और वे फिर से जनविश्वास हासिल कर सकेंगे। पुलिस को भी चाहिए कि अभिजीत दीपके ने उसकी छवि को अमानवीय और हिसंक बनाने का जो कुत्सित प्रयास किया, उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।