Bengal Election Result 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एकतरफा जीत दर्ज करते हुए 207 सीटें हासिल कीं, जबकि तृणमूल कांग्रेस (TMC) को 80 सीटों पर ही जीत मिली। वोटों के आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा को कुल 2 करोड़ 92 लाख 24 हजार 804 वोट मिले, जबकि TMC को 2 करोड़ 60 लाख 13 हजार 377 वोट प्राप्त हुए। इस तरह भाजपा को कुल 32 लाख 11 हजार 427 वोटों की बढ़त मिली। अगर इसे औसत में समझें तो 293 सीटों के हिसाब से हर सीट पर भाजपा को करीब 10,960 वोट ज्यादा मिले, जो उसकी मजबूत स्थिति को दर्शाता है।
SIR प्रक्रिया और वोट कटने का असर
राज्य में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के दौरान लगभग 91 लाख वोटर लिस्ट से हटाए गए, यानी हर सीट पर औसतन करीब 30 हजार वोटरों के नाम काटे गए। चुनाव परिणामों में देखा गया कि 293 सीटों में से 176 सीटों पर जीत का अंतर 30 हजार से कम रहा, जबकि 117 सीटों पर यह अंतर 30 हजार से ज्यादा था। ऐसे में यह मुद्दा महत्वपूर्ण बन गया है और इसी आधार पर TMC अब चुनाव नतीजों को कोर्ट में चुनौती दे सकती है।

कम और ज्यादा मार्जिन वाली सीटों का गणित
अगर सीटों को जीत के अंतर के आधार पर देखें तो 30 हजार से कम अंतर वाली 176 सीटों में भाजपा ने 128 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि TMC को 44 सीटें मिलीं। वहीं 30 हजार से ज्यादा अंतर वाली 117 सीटों में भाजपा को 79 सीटों पर जीत मिली और TMC को 36 सीटें मिलीं। यह आंकड़े बताते हैं कि कम मार्जिन वाली सीटों पर भाजपा की पकड़ काफी मजबूत रही।
Bengal Election Result 2026: 2021 के मुकाबले बदला चुनावी ट्रेंड
2021 के चुनाव में भाजपा की 77 सीटों में से 72 सीटों पर जीत का अंतर 30 हजार से कम था, यानी लगभग 93.5% सीटें कम मार्जिन वाली थीं। लेकिन इस बार यह आंकड़ा घटकर 62% रह गया, जो बताता है कि भाजपा ने कुछ सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत की है। वहीं 2021 में TMC की 121 सीटों पर जीत का अंतर 30 हजार से कम था और 94 सीटों पर 30 हजार से ज्यादा था। इस तुलना से साफ होता है कि इस बार चुनावी रुझान में बदलाव आया है।
इस चुनाव में भाजपा की 25 सीटें ऐसी रहीं, जहां हटाए गए या अयोग्य घोषित वोटरों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी। ऐसे मामलों में चुनाव परिणामों पर सवाल उठ सकते हैं, क्योंकि अगर ये वोट शामिल होते तो नतीजे बदल भी सकते थे।
सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट राय
SIR को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि अगर हटाए गए वोटों की संख्या जीत के अंतर से कम है, तो कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगा, क्योंकि इससे परिणाम पर कोई असर नहीं पड़ता। लेकिन अगर हटाए गए वोटों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा है, तो कोर्ट इस पर विचार कर सकता है, क्योंकि इससे चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।
मान लीजिए किसी उम्मीदवार को 1 लाख वोट मिले और उसके प्रतिद्वंद्वी को 95 हजार वोट मिले, तो जीत का अंतर 5 हजार वोट हुआ। अब अगर हटाए गए वोट 5 हजार से कम हैं, तो परिणाम पर असर नहीं पड़ेगा। लेकिन अगर हटाए गए वोट 5 हजार से ज्यादा हैं, तो इससे नतीजे बदल सकते हैं।
वोट शेयर में बड़ा बदलाव
इस चुनाव में भाजपा का वोट शेयर 7.50% बढ़ा है, जबकि TMC का वोट शेयर लगभग उतना ही घटा है। यह बदलाव दर्शाता है कि मतदाताओं का रुझान इस बार भाजपा की ओर ज्यादा रहा।
इन नतीजों के बाद अब देश की लगभग 78% आबादी और 72% क्षेत्र पर भाजपा और उसके सहयोगियों का शासन हो गया है। गंगासागर से लेकर कन्याकुमारी तक हुए चुनावों ने विपक्ष के बड़े नेताओं को झटका दिया है। ममता बनर्जी और एमके स्टालिन जैसे नेता भाजपा के प्रमुख विरोधी चेहरे माने जाते थे, लेकिन इन नतीजों से उनकी स्थिति कमजोर हुई है।
विपक्ष के सामने नई चुनौती
बंगाल की 42 और तमिलनाडु की 39 लोकसभा सीटें मिलकर कुल 81 सीटों को प्रभावित करती हैं। इन राज्यों में कमजोर प्रदर्शन से विपक्षी गठबंधन पीछे चला गया है। हालांकि केरल में कांग्रेस की जीत ने थोड़ी राहत जरूर दी है, लेकिन इससे विपक्ष के भीतर नई खींचतान शुरू हो सकती है। अब विपक्ष की लड़ाई केवल सत्ता हासिल करने की नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की भी हो गई है।
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