
कहां है संसद की गरिमा?
वर्तमान बजट सत्र के दौरान संसद में जिस तरह का व्यवहार देखने को मिल रहा है, उसने लोकतंत्र की गरिमा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। रचनात्मक संवाद की जगह आरोप-प्रत्यारोप ने ले ली है। विपक्ष की भूमिका, राष्ट्रपति के भाषण की परंपरा और संविधान की भावना को समझने की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है। यह स्थिति न केवल वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी चिंताजनक है।













