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दिल्ली की हवा में घुला जहर, AQI 300 पार तो कितना खतरनाक है PM2.5? समझिए प्रदूषण का पूरा गणित

Delhi Air Pollution:  दिल्ली में सर्दियों की शुरुआत के साथ वायु प्रदूषण का संकट गहराने लगा है। राजधानी के कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 300 के पार पहुंच गया है। इस स्तर पर हवा बहुत खराब श्रेणी में मानी जाती है। लेकिन प्रदूषण का खतरा सिर्फ AQI के आंकड़े तक सीमित नहीं है। हवा में मौजूद PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण भी सेहत के लिए गंभीर चुनौती हैं। आखिर AQI क्या बताता है? PM2.5 को ज्यादा खतरनाक क्यों माना जाता है? यह फेफड़ों और दिल को कैसे प्रभावित करता है और प्रदूषण से बचने के लिए क्या सावधानियां जरूरी हैं? समझिए इस एक्सप्लेनर में।

नवंबर की शुरुआत हवा की गुणवत्ता खराब हुई

दिल्ली में बारिश के बाद मिली राहत अब खत्म होती दिखाई दे रही है। नवंबर की शुरुआत में राजधानी के कई इलाकों में हवा की गुणवत्ता खराब से बहुत खराब श्रेणी में पहुंच गई। कुछ मॉनिटरिंग स्टेशनों पर AQI 400 के पार दर्ज किया गया। ऐसे हालात में बाहर निकलना खासकर बच्चों, बुजुर्गों और सांस या दिल की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए जोखिम बढ़ा सकता है। प्रदूषण की चर्चा के दौरान AQI, PM2.5 और PM10 जैसे शब्द बार-बार सुनाई देते हैं। लेकिन इनका मतलब एक जैसा नहीं है। AQI हवा की गुणवत्ता का संकेत देता है, जबकि PM2.5 और PM10 हवा में मौजूद प्रदूषक कणों के आकार को बताते हैं।

Delhi Air Pollution: AQI क्या होता है और 300 पार होने का क्या मतलब है?

AQI का पूरा नाम एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी वायु गुणवत्ता सूचकांक है। यह हवा में मौजूद प्रदूषकों के स्तर के आधार पर बताता है कि हवा कितनी साफ या प्रदूषित है और उससे स्वास्थ्य को कितना खतरा हो सकता है। भारत में इसकी गणना PM2.5, PM10, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, ओजोन, कार्बन मोनोऑक्साइड और अमोनिया जैसे प्रदूषकों के आधार पर की जाती है।

भारत में AQI की छह श्रेणियां तय हैं:

AQI स्तर               हवा की श्रेणी
0–50                            अच्छी
51–100                   संतोषजनक
101–200                    मध्यम
201–300                     खराब
301–400               बहुत खराब
401–500                    गंभीर

इसका मतलब है कि AQI 300 से ऊपर पहुंचने पर हवा बहुत खराब श्रेणी में आ जाती है। इस स्थिति में लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से सांस लेने में परेशानी हो सकती है। पहले से अस्थमा, फेफड़ों या हृदय की बीमारी से जूझ रहे लोगों की समस्या बढ़ सकती है। AQI 400 से ऊपर पहुंचने पर स्थिति गंभीर मानी जाती है और स्वस्थ लोगों पर भी इसका असर पड़ सकता है।

Delhi Air Pollution
                                                                Delhi Air Pollution
PM2.5 और PM10 क्या हैं, इनमें क्या अंतर है?

हवा में मौजूद धूल, धुएं, राख और दूसरे पदार्थों के छोटे-छोटे कणों को पार्टिकुलेट मैटर यानी PM कहा जाता है। इन्हें इनके आकार के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है। PM2.5 और PM10 इनमें प्रमुख हैं।

PM10 क्या है?

PM10 ऐसे कण होते हैं जिनका व्यास 10 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। सड़क की धूल, मिट्टी, निर्माण कार्य और औद्योगिक गतिविधियां इनके प्रमुख स्रोत हैं। ये सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। इनसे नाक और गले में जलन, खांसी और सांस लेने में परेशानी हो सकती है। इनके कुछ कण फेफड़ों तक भी पहुंच सकते हैं।

PM2.5 क्या है?

PM2.5 का व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये PM10 के मुकाबले काफी छोटे होते हैं। वाहनों और कारखानों का धुआं, ईंधन जलना, कचरा जलाना, पराली और आतिशबाजी इनके प्रमुख स्रोत हो सकते हैं। आकार छोटा होने के कारण PM2.5 के कण सांस के साथ फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंच सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से श्वसन तंत्र और हृदय से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।

Delhi Air Pollution: PM2.5 को साइलेंट किलर क्यों कहा जाता है?

PM2.5 के कण इतने छोटे होते हैं कि सांस के साथ फेफड़ों के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंच सकते हैं। यही वजह है कि इन्हें स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा माना जाता है। इनका असर केवल खांसी, गले में जलन या सांस फूलने तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क में रहने से अस्थमा और सीओपीडी जैसी सांस की बीमारियां बढ़ सकती हैं। फेफड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और हृदय रोगों का जोखिम भी बढ़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायु प्रदूषण को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम माना है। बाहरी वायु प्रदूषण में मौजूद सूक्ष्म कणों का लंबे समय तक संपर्क फेफड़ों के कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों से भी जुड़ा है। इसका असर केवल बुजुर्गों या पहले से बीमार लोगों तक सीमित नहीं है। बच्चे, गर्भवती महिलाएं और स्वस्थ व्यक्ति भी लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए PM2.5 को कई बार ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है।

दिल्ली में PM2.5 का स्तर बढ़ने की वजह क्या है?

दिल्ली में प्रदूषण किसी एक कारण से नहीं बढ़ता। इसके पीछे स्थानीय और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले कई स्रोत जिम्मेदार होते हैं। इनमें प्रमुख हैं: वाहनों का धुआं: पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों से निकलने वाले प्रदूषक हवा की गुणवत्ता बिगाड़ते हैं। निर्माण कार्य और सड़क की धूल: निर्माण स्थलों, खुदाई और सड़कों से उड़ने वाली धूल PM10 के स्तर को बढ़ा सकती है। औद्योगिक गतिविधियां: कारखानों और ऊर्जा उत्पादन से निकलने वाला धुआं प्रदूषण में योगदान देता है। पराली और कचरा जलाना: फसल अवशेष और कचरा जलने से धुआं और सूक्ष्म कण हवा में पहुंचते हैं।
पटाखे: आतिशबाजी से निकलने वाला धुआं और रासायनिक कण प्रदूषण बढ़ा सकते हैं।

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                                                                  Delhi Air Pollution

दिल्ली के प्रदूषण में इन सभी स्रोतों का योगदान हर दिन एक जैसा नहीं रहता। हवा की दिशा, गति, तापमान और मौसम की स्थिति के अनुसार भी प्रदूषण का स्तर बदलता है। इसलिए किसी एक स्रोत को पूरी समस्या का जिम्मेदार मानना सही नहीं होगा।

सर्दियों में दिल्ली की हवा ज्यादा जहरीली क्यों हो जाती है?

सर्दियों में तापमान कम होने और हवा की गति धीमी पड़ने से प्रदूषक कणों का फैलाव प्रभावित होता है। कई बार प्रदूषण जमीन के करीब जमा रहने लगता है और धुंध जैसी स्थिति बन जाती है।

इसे समझने के लिए तापमान की उलट स्थिति यानी टेम्परेचर इन्वर्जन को जानना जरूरी है। सामान्य तौर पर जमीन के पास की गर्म हवा ऊपर उठती है और प्रदूषकों को फैलने में मदद करती है। लेकिन कुछ मौसमी परिस्थितियों में ऊपर गर्म हवा की परत बन जाती है। यह नीचे की ठंडी हवा और उसमें मौजूद प्रदूषकों को ऊपर फैलने से रोकती है। इसके अलावा पड़ोसी राज्यों से आने वाला धुआं, वाहनों का उत्सर्जन, निर्माण गतिविधियां और पटाखे भी प्रदूषण बढ़ा सकते हैं। इन कारणों से सर्दियों में दिल्ली-एनसीआर की हवा की गुणवत्ता तेजी से बिगड़ सकती है।

Delhi Air Pollution: AQI 300 या 400 होने पर खुद को प्रदूषण से कैसे बचाएं?

प्रदूषण पूरी तरह खत्म होने तक इंतजार करना संभव नहीं है, लेकिन कुछ सावधानियां अपनाकर इसके संपर्क को कम किया जा सकता है। बाहर निकलते समय मास्क पहनें: प्रदूषण ज्यादा होने पर अच्छी फिटिंग वाला N95 या FFP2 मास्क इस्तेमाल करें। मास्क नाक और मुंह को ठीक से ढकना चाहिए।
बाहर व्यायाम करने से बचें: AQI बहुत खराब या गंभीर श्रेणी में हो तो दौड़ने, तेज वॉक और भारी कसरत के बजाय घर के अंदर व्यायाम करें। बच्चों और बुजुर्गों का ध्यान रखें: बच्चों, बुजुर्गों और सांस या हृदय रोग से पीड़ित लोगों को प्रदूषित हवा में लंबे समय तक रहने से बचाएं। घर के अंदर प्रदूषण कम रखें: घर में धूम्रपान और धुआं पैदा करने वाली गतिविधियों से बचें। जरूरत के अनुसार HEPA फिल्टर वाले एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल किया जा सकता है। स्थानीय AQI पर नजर रखें: बाहर जाने से पहले अपने इलाके की वायु गुणवत्ता जांचें और प्रदूषण के स्तर के हिसाब से बाहर रहने का समय तय करें।

क्या AQI और PM2.5 एक ही चीज हैं?

नहीं, दोनों अलग-अलग चीजें हैं। AQI हवा में मौजूद कई प्रदूषकों के स्तर को मिलाकर तैयार किया गया सूचकांक है, जबकि PM2.5 हवा में मौजूद एक खास तरह के सूक्ष्म कण हैं। इसे आसान भाषा में ऐसे समझिए: AQI बताता है: हवा की गुणवत्ता कितनी खराब या अच्छी है। PM2.5 बताता है: हवा में 2.5 माइक्रोमीटर या उससे छोटे कण कितनी मात्रा में मौजूद हैं। PM10 बताता है: हवा में 10 माइक्रोमीटर या उससे छोटे कण कितनी मात्रा में हैं। AQI एक सूचकांक है, जबकि PM2.5 और PM10 की सांद्रता माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर में मापी जाती है।

Delhi Air Pollution: भारत में PM2.5 की सुरक्षित सीमा कितनी तय है?

भारत के राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (NAAQS) के मुताबिक PM2.5 की वार्षिक औसत सीमा 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 24 घंटे की औसत सीमा 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। वहीं PM10 की वार्षिक औसत सीमा 60 और 24 घंटे की औसत सीमा 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तय की गई है। इन मानकों की तुलना में किसी एक घंटे या दिन का आंकड़ा देखकर पूरे साल की हवा का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। वार्षिक औसत और 24 घंटे के औसत के मानक अलग-अलग समयावधि के लिए होते हैं। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन के वायु गुणवत्ता दिशानिर्देश भारत के राष्ट्रीय मानकों से अधिक सख्त हैं।

प्रदूषण सिर्फ दिल्ली की नहीं, सेहत की भी बड़ी चुनौती

दिल्ली में बढ़ता वायु प्रदूषण केवल धुंध या आंखों में जलन की समस्या नहीं है। हवा में मौजूद PM2.5 जैसे सूक्ष्म कण लंबे समय तक शरीर के संपर्क में रहने पर फेफड़ों और हृदय की सेहत को प्रभावित कर सकते हैं। AQI 300 के पार पहुंचना इस बात का संकेत है कि सावधानी बरतने की जरूरत है। हालांकि, प्रदूषण से निपटने की जिम्मेदारी केवल लोगों के मास्क पहनने या घरों में एयर प्यूरीफायर लगाने तक सीमित नहीं हो सकती। वाहनों और उद्योगों से निकलने वाले उत्सर्जन पर नियंत्रण, निर्माण स्थलों की धूल कम करना, कचरा और पराली जलाने पर रोक तथा बेहतर सार्वजनिक परिवहन जैसे कदम भी जरूरी हैं। साफ हवा हर नागरिक की जरूरत है और इसे सुनिश्चित करने के लिए सरकार, उद्योगों और आम लोगों को मिलकर प्रयास करना होगा।

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