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दिल्ली के 159 साल पुराने लोहे के पुल के दिन गिने-चुने, नया आधुनिक पुल बनाने की तैयारी तेज

Delhi Iron Bridge:
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Delhi Iron Bridge: दिल्ली की पहचान माने जाने वाले 159 साल पुराने ऐतिहासिक लोहे के पुल के दिन अब गिने-चुने रह गए हैं। ब्रिटिश कालीन इंजीनियरिंग का यह बेजोड़ नमूना अपनी उम्र पूरी कर चुका है। बढ़ते ट्रैफिक दबाव और रिंग रोड को जाम मुक्त करने के उद्देश्य से सरकार अब इसके विकल्प के तौर पर एक नए आधुनिक सड़क पुल के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रही है।

हाल ही में लोक निर्माण विभाग (PWD) की एक उच्चस्तरीय बैठक में इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के संकेत मिले हैं। अधिकारियों के मुताबिक, यह नया पुल उत्तर-पूर्वी दिल्ली से मध्य दिल्ली की कनेक्टिविटी को बेहतर बनाएगा और भविष्य के ट्रैफिक दबाव को संभालने में अहम भूमिका निभाएगा।

दिल्ली मेरठ और दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेसवे से बढ़ेगा दबाव

अधिकारियों के अनुसार, दिल्ली–मेरठ और दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेसवे का ट्रैफिक सराय काले खां पर समाप्त होगा। इससे रिंग रोड पर वाहनों का दबाव कई गुना बढ़ने की आशंका है। ऐसे में पुराने लोहे के पुल की सीमित क्षमता इस ट्रैफिक को संभालने में नाकाफी साबित होगी, जिस कारण नए पुल का निर्माण आवश्यक माना जा रहा है।

Delhi Iron Bridge:
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Delhi Iron Bridge: 1866-67 में शुरू हुआ था लोहे का पुल

पुराना लोहे का पुल, जिसे पुल नंबर 249 के नाम से भी जाना जाता है, 1866-67 में शुरू हुआ था। यह एक डबल-डेकर पुल है ऊपरी हिस्से पर रेलगाड़ियां और निचले हिस्से पर सड़क यातायात चलता है। समय के साथ इसके गर्डर और पिलर कमजोर हो चुके हैं। भारतीय रेलवे पहले ही इसके समानांतर एक नया रेल पुल बना रहा है, ताकि ट्रेनों का संचालन सुरक्षित रूप से शिफ्ट किया जा सके। PWD अब सड़क यातायात के लिए पुराने पुल के पास ही फ्लाईओवर-नुमा नया पुल बनाने की योजना पर काम कर रहा है।

Delhi Iron Bridge: सिग्नेचर ब्रिज और ITO के बीच बड़ी कमी होगी दूर

इस प्रोजेक्ट की जरूरत इसलिए भी महसूस की जा रही है क्योंकि सिग्नेचर ब्रिज और ITO के बीच फिलहाल कोई ऐसा आधुनिक वैकल्पिक मार्ग नहीं है, जो भारी ट्रैफिक को आसानी से संभाल सके। नए पुल के निर्माण से आउटर रिंग रोड और रिंग रोड पर लगने वाले लंबे जाम से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

दो संभावित लोकेशन पर विचार

PWD द्वारा ओल्ड वजीराबाद से कालिंदी कुंज तक पूरे स्ट्रेच की फिजिबिलिटी स्टडी कराई जाएगी। इसके तहत दो प्रमुख विकल्पों पर विचार हो रहा है: लोहे के पुल की मौजूदा जगह – पुराने पुल को हटाकर या उसके बिल्कुल पास नया सड़क पुल बनाना। सिग्नेचर ब्रिज के पास – वहां बढ़ते ट्रैफिक दबाव को देखते हुए एक वैकल्पिक पुल का निर्माण।

यमुना फ्लडप्लेन सबसे बड़ी चुनौती

इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी बाधा यमुना का डूब क्षेत्र (Floodplain) है। निर्माण के लिए यमुना रिवर फ्रंट अथॉरिटी और पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी लेना जरूरी होगा। इससे पहले भी 13 किलोमीटर लंबा एक एलिवेटेड प्रोजेक्ट इन्हीं मंजूरियों के चलते अटक चुका है।

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