EDITIORIAL NEWS: लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति की कलम सरकारों को जवाब देने पर मजबूर कर सकती है, वही पत्रकार आज अपने अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहा है। समाज किसी भी अन्य पेशे की तरह पत्रकारिता को भी आवश्यक मानता है, लेकिन जब बात पत्रकार के श्रम, सुरक्षा और आर्थिक स्थिति की आती है, तो अक्सर उसकी अनदेखी कर दी जाती है।
जब जनता की आवाज बनता है पत्रकार
जब किसी गरीब की आवाज प्रशासन तक नहीं पहुंचती, जब किसी किसान को न्याय नहीं मिलता, जब किसी पीड़ित की सुनवाई नहीं होती या किसी सरकारी कार्यालय में आम नागरिक भटकता रहता है, तब उसकी आखिरी उम्मीद एक पत्रकार ही बनता है। एक निष्पक्ष खबर प्रशासन को कार्रवाई के लिए मजबूर कर सकती है और वर्षों से लंबित समस्याओं का समाधान भी निकल सकता है। लेकिन जो पत्रकार दूसरों की लड़ाई लड़ता है, उसकी अपनी लड़ाई लड़ने वाला शायद ही कोई होता है।
EDITIORIAL NEWS: पत्रकारिता सिर्फ खबर नहीं, जिम्मेदारी भी है
पत्रकारिता केवल समाचार लिखने या कैमरे के सामने खड़े होकर रिपोर्टिंग करने का नाम नहीं है। यह समाज और सत्ता के बीच एक जिम्मेदार सेतु है। पत्रकार हर मौसम, हर परिस्थिति और हर जोखिम में जनता तक सच पहुंचाने का प्रयास करता है। कई बार उसे धमकियों, मुकदमों, राजनीतिक दबाव और सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद वह लोकतंत्र को मजबूत बनाने के अपने दायित्व से पीछे नहीं हटता।
समाज सेवा के नाम पर पत्रकार के श्रम की अनदेखी क्यों?
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि समाज डॉक्टर, वकील, इंजीनियर और अन्य पेशेवरों की सेवाओं का आर्थिक मूल्य सहजता से स्वीकार करता है, लेकिन पत्रकार से अपेक्षा की जाती है कि वह केवल “समाज सेवा” की भावना से काम करे। निस्संदेह पत्रकारिता का उद्देश्य खबर के बदले धन लेना नहीं हो सकता, क्योंकि इससे उसकी निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि पत्रकार को सम्मानजनक वेतन, सुरक्षित कार्य वातावरण और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा मिले।
EDITIORIAL NEWS: छोटे मीडिया संस्थानों के पत्रकारों की बड़ी चुनौती
देश के अनेक छोटे और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों में कार्यरत पत्रकार बेहद सीमित संसाधनों में काम कर रहे हैं। कई जगह नियमित वेतन तक नहीं मिलता, न स्वास्थ्य बीमा की सुविधा होती है, न दुर्घटना सुरक्षा और न ही कोई स्थायी सामाजिक संरक्षण। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जो व्यक्ति समाज के अधिकारों की रक्षा करता है, उसके अधिकारों की रक्षा कौन करेगा?

पत्रकारों के अधिकारों पर भी हो गंभीर चर्चा
आज आवश्यकता केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता की बात करने की नहीं, बल्कि पत्रकारों के पेशेवर और आर्थिक अधिकारों को भी सुनिश्चित करने की है। न्यूनतम वेतन, समय पर भुगतान, स्वास्थ्य और दुर्घटना बीमा, कानूनी सहायता तथा सुरक्षित कार्य परिस्थितियां अब सुविधा नहीं, बल्कि आवश्यकता हैं। आर्थिक रूप से सुरक्षित पत्रकार ही सत्ता, अपराध और दबाव से मुक्त होकर निर्भीक पत्रकारिता कर सकता है।
EDITIORIAL NEWS: कलम की स्वतंत्रता के साथ श्रम का सम्मान भी जरूरी
पत्रकार की कलम बिकनी नहीं चाहिए, लेकिन उसकी मेहनत का सम्मान अवश्य होना चाहिए। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब उसे मजबूत बनाने वाले पत्रकार भी सम्मान, सुरक्षा और गरिमापूर्ण जीवन जी सकें। आखिरकार, पत्रकार की कलम केवल शब्द नहीं लिखती, बल्कि समाज की पीड़ा, जनता की उम्मीद और लोकतंत्र की आत्मा को आवाज़ देती है। अब समय आ गया है कि समाज इस आवाज़ का मूल्य समझे और पत्रकारों को केवल खबर लिखने वाला नहीं, बल्कि लोकतंत्र का जिम्मेदार प्रहरी मानकर उसके अधिकारों पर भी गंभीरता से विचार करे।
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