FIR and NCR Rules: पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराने के दौरान अक्सर FIR (First Information Report) का नाम सुनने को मिलता है। हालांकि, हर शिकायत एफआईआर में दर्ज नहीं होती। कई मामलों में पुलिस NCR (Non-Cognizable Report) दर्ज करती है। दोनों प्रक्रियाओं में पुलिस के अधिकार, जांच का तरीका और कानूनी प्रक्रिया अलग-अलग होती है।
FIR and NCR Rules: क्या होती है FIR-
एफआईआर गंभीर या संज्ञेय अपराधों (Cognizable Offence) में दर्ज की जाती है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में इसके लिए वही व्यवस्था है, जो पहले दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 154 के तहत थी। हत्या, बलात्कार, डकैती, अपहरण, चोरी, गंभीर मारपीट और बड़े स्तर की धोखाधड़ी जैसे मामलों में पुलिस एफआईआर दर्ज करती है। ऐसे मामलों में पुलिस बिना अदालत की अनुमति के जांच शुरू कर सकती है और जरूरत पड़ने पर आरोपी को गिरफ्तार भी कर सकती है।
FIR and NCR Rules: NCR क्या होती है-
NCR यानी Non-Cognizable Report कम गंभीर अपराधों में दर्ज की जाती है। इसमें गाली-गलौज, मामूली मारपीट, छोटे विवाद या सामान्य झगड़े जैसे मामले शामिल होते हैं। ऐसे मामलों में पुलिस शिकायत दर्ज तो करती है, लेकिन मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना जांच शुरू नहीं कर सकती। इसलिए NCR में पुलिस के अधिकार सीमित होते हैं।
FIR और NCR में मुख्य अंतर-
FIR गंभीर अपराधों के लिए होती है, जबकि NCR कम गंभीर मामलों में दर्ज की जाती है। FIR दर्ज होने के बाद पुलिस तुरंत जांच और कानूनी कार्रवाई शुरू कर सकती है, जबकि NCR में जांच शुरू करने से पहले अदालत की अनुमति आवश्यक होती है।
अगर पुलिस FIR दर्ज करने से मना करे तो क्या करें-
यदि मामला गंभीर अपराध का है और पुलिस FIR दर्ज करने से इनकार करती है, तो पीड़ित संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट के पास शिकायत कर सकता है। वहीं, गैर-संज्ञेय मामलों में पुलिस आमतौर पर NCR दर्ज कर शिकायतकर्ता को आगे की कानूनी प्रक्रिया अपनाने की सलाह देती है।







