Rahul Gandhi: कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम अब छात्रों के मुद्दों से ज्यादा एक मंचीय प्रस्तुति को लेकर चर्चा में है। 19 सितंबर को हुए कार्यक्रम में कॉमेडियन पुलकित मणि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैली की मिमिक्री की। राहुल गांधी उसी मंच पर मौजूद थे।कांग्रेस की ओर से साझा किए गए वीडियो के सामने आने के बाद बीजेपी ने इसे प्रधानमंत्री के अपमान और मां के अपमान से जोड़ते हुए राहुल गांधी और कांग्रेस पर निशाना साधा है।मामला सिर्फ मिमिक्री तक नहीं रुका। कार्यक्रम में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और उद्योगपतियों का नाम लेते हुए मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल उठाए।डोभाल को लेकर की गई टिप्पणी के बीच उनका पुराना सरकारी रिकॉर्ड और 1989 में राजीव गांधी की सरकार के दौरान मिला कीर्ति चक्र भी चर्चा में आ गया है।
छात्रों के मंच पर PM मोदी की मिमिक्री क्यों बनी विवाद की वजह?
‘छात्रों की गूंज’ का मकसद छात्रों से जुड़े सवालों को सामने रखना था, लेकिन इसी कार्यक्रम के दौरान पुलकित मणि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बोलने की शैली और विदेशी नेताओं के साथ उनकी बातचीत के अंदाज की नकल करते हुए प्रस्तुति दी।प्रस्तुति का वीडियो कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर साझा किया। इसके बाद बीजेपी नेताओं ने राहुल गांधी की मौजूदगी और प्रस्तुति के दौरान उनकी प्रतिक्रिया को लेकर सवाल उठाए।केंद्रीय मंत्रियों और बीजेपी नेताओं ने राहुल गांधी से माफी की मांग की और आरोप लगाया कि छात्र संवाद के मंच का इस्तेमाल प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाने के लिए किया गया।
Rahul Gandhi:‘मां को कुर्सी दो, मां’ वाली लाइन पर क्यों मचा सियासी घमासान?
इंदौर के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री के दौरान कही गई एक लाइन ने विवाद खड़ा कर दिया है। कॉमेडियन पुलकित मणि ने पीएम मोदी के अंदाज की नकल करते हुए राहुल गांधी के साथ मंच पर प्रस्तुति दी।इसी दौरान उन्होंने कहा, “मां को कुर्सी दो, मां…”बीजेपी नेताओं ने इस संवाद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिवंगत मां हीराबेन मोदी से जोड़ते हुए आपत्ति जताई है।
मिमिक्री से ज्यादा चर्चा ‘मां’ वाली लाइन की
इस पूरे मामले में विवाद की वजह सिर्फ पीएम मोदी की नकल नहीं है। राजनीतिक बहस उस वक्त तेज हुई, जब प्रस्तुति के दौरान ‘मां’ का संदर्भ आया। बीजेपी का कहना है कि प्रधानमंत्री की मां का संदर्भ आने से यह प्रस्तुति सामान्य राजनीतिक व्यंग्य से आगे निकल गई।वहीं, कांग्रेस पार्टी की दलील है कि राहुल गांधी ने खुद वह संवाद नहीं बोला था।
यानी विवाद का केंद्र दो सवाल हैं—क्या राजनीतिक व्यंग्य में प्रधानमंत्री के निजी और पारिवारिक संदर्भों को शामिल करना उचित है और क्या मंच पर मौजूद राहुल गांधी को ऐसी प्रस्तुति पर आपत्ति जतानी चाहिए थी?
Rahul Gandhi: राहुल गांधी ने अजीत डोभाल को लेकर क्या कहा?
कार्यक्रम में राहुल गांधी ने केंद्र सरकार की राजनीतिक और संस्थागत व्यवस्था पर हमला बोलते हुए कई प्रमुख नामों का उल्लेख किया। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के साथ अजीत डोभाल, मोहन भागवत तथा कुछ बड़े उद्योगपतियों को भी अपनी बात के संदर्भ में शामिल किया।राहुल गांधी का कहना था कि देश के अलग-अलग संस्थानों और क्षेत्रों में कुछ प्रभावशाली लोगों की भूमिका बढ़ी है।यह राहुल गांधी का राजनीतिक आरोप है। इसे किसी स्वतंत्र जांच या आधिकारिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता। कार्यक्रम की रिपोर्टिंग में उनके भाषण को छात्रों और सरकार के बीच ‘सिस्टम’ से जुड़े सवालों के संदर्भ में दर्ज किया गया है।
डोभाल का रिकॉर्ड क्या कहता है?
अजीत डोभाल का सार्वजनिक रिकॉर्ड राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफिया सेवाओं से जुड़े लंबे करियर का रहा है। भारत सरकार के उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार, डोभाल 1968 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे और उन्होंने आतंकवाद से जुड़े कई संवेदनशील अभियानों में काम किया।सरकारी रिकॉर्ड में उल्लेख है कि 1980 के दशक के अंत में आतंकवादियों के खिलाफ एक संवेदनशील अभियान के दौरान उन्होंने अपनी जान को गंभीर खतरे के बावजूद अभियान की योजना बनाई और कुछ वांछित आतंकवादियों को पकड़ने में सफलता हासिल की।इसी सेवा और साहस के लिए उन्हें कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया था।इसलिए राहुल गांधी के राजनीतिक आरोपों और डोभाल के सेवा रिकॉर्ड को अलग-अलग संदर्भ में देखना जरूरी है।
Rahul Gandhi: 1989 का कीर्ति चक्र और राजीव गांधी का दौर
अजीत डोभाल को 1989 में कीर्ति चक्र मिला था। उपलब्ध रिकॉर्ड में उनका नाम उस वर्ष के कीर्ति चक्र प्राप्तकर्ताओं में दर्ज है।यहां एक तथ्य साफ करना जरूरी है। कीर्ति चक्र किसी प्रधानमंत्री का निजी सम्मान नहीं, बल्कि भारत सरकार की ओर से दिया जाने वाला वीरता पुरस्कार है। इसलिए इसे सीधे तौर पर यह कहना कि ‘राजीव गांधी ने निजी तौर पर डोभाल को कीर्ति चक्र दिया’, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।इतना जरूर है कि डोभाल को यह सम्मान 1989 में मिला, जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे।
यही वजह है कि डोभाल को लेकर किसी राजनीतिक बहस में उनके पूरे सेवा रिकॉर्ड को नजरअंदाज करना तस्वीर को अधूरा बना सकता है।
PM मोदी पर टिप्पणी को लेकर पहले भी विवाद
राहुल गांधी के राजनीतिक भाषणों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली और विदेश नीति को लेकर तीखी टिप्पणियां पहले भी सामने आती रही हैं। अगस्त में एक कांग्रेस कार्यक्रम में उन्होंने प्रधानमंत्री की विदेशी नेताओं से मुलाकात और अभिवादन की शैली पर व्यंग्य किया था।उस टिप्पणी को लेकर भी बीजेपी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी हुई थी।
इंदौर की घटना ने इस बहस को फिर हवा दी है। इस बार विवाद की वजह राहुल गांधी के भाषण के साथ मंच पर हुई कॉमेडी प्रस्तुति भी है। बीजेपी इसे राहुल गांधी की राजनीतिक जिम्मेदारी से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस और कुछ विपक्षी नेता इसे व्यंग्य तथा राजनीतिक हास्य के दायरे में रख रहे हैं।
Rahul Gandhi: छात्रों के सवालों से ज्यादा चर्चा मंचीय विवाद की
‘छात्रों की गूंज’ में राहुल गांधी ने युवाओं की शिक्षा, रोजगार और भर्ती से जुड़े सवाल उठाए थे। उनका फोकस छात्रों में व्यवस्था के प्रति भरोसा बहाल करने और उनके सवालों को राजनीतिक विमर्श में जगह देने पर था।लेकिन कार्यक्रम के बाद सार्वजनिक चर्चा का केंद्र PM मोदी की मिमिक्री, उसमें मां का अपमान और उस पर राहुल गांधी की मौजूदगी बन गई। इसके साथ डोभाल को लेकर राहुल गांधी की टिप्पणी ने उनके पुराने सेवा रिकॉर्ड को भी बहस में ला दिया है।राजनीतिक विरोध में सरकार और प्रधानमंत्री की आलोचना स्वाभाविक है। लेकिन विपक्ष के नेता के सार्वजनिक मंच पर इस्तेमाल होने वाली भाषा, हास्य और प्रस्तुति भी राजनीतिक संदेश का हिस्सा बनती है।इंदौर की घटना ने राहुल गांधी की राजनीति के सामने एक बार फिर यही सवाल रखा है कि क्या विपक्ष की भूमिका का सबसे प्रभावी रास्ता सरकार की नीतियों और फैसलों पर ठोस सवाल उठाना है, या राजनीति के नाम पर मजाक उड़ाना।
लेखिका: स्वाति शर्मा
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