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सफेद बर्फ पर काली कालिख का कहर! हिमालय के ग्लेशियर तेजी से क्यों पिघल रहे?

Himalaya Glacier Melting: हिमालय की सफेद बर्फ अब सिर्फ बढ़ते तापमान की मार नहीं झेल रही, बल्कि हवा में मौजूद काली कालिख यानी ब्लैक कार्बन भी ग्लेशियरों के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। वाहनों, कोयला आधारित उद्योगों, ईंट-भट्ठों, घरेलू चूल्हों और जंगल व खेतों में लगने वाली आग से निकलने वाले ब्लैक कार्बन के कण हवा के साथ ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों तक पहुंचते हैं। बर्फ की सतह पर जमने के बाद ये कण सूर्य की ऊर्जा को अधिक सोखते हैं, जिससे बर्फ के पिघलने की रफ्तार बढ़ सकती है।

सवाल: सफेद बर्फ पर कालिख का असर इतना गंभीर क्यों?

बर्फ और हिम की सफेद सतह सूर्य की रोशनी का बड़ा हिस्सा वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देती है। लेकिन जब उस पर काले कार्बन या धूल के कण जम जाते हैं तो सतह गहरी होने लगती है। गहरी सतह ज्यादा सौर ऊर्जा अवशोषित करती है और इससे बर्फ का तापमान बढ़ सकता है। यानी प्रदूषण के बेहद छोटे कण हिमालय जैसे ऊंचे और ठंडे इलाके में भी ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया को तेज करने में भूमिका निभा सकते हैं।

Himalaya Glacier Melting: कहां से आती है यह कालिख?

ब्लैक कार्बन मुख्य रूप से अधूरे दहन से पैदा होता है। इसके प्रमुख स्रोतों में डीजल वाहन, कोयला आधारित बिजलीघर और उद्योग, ईंट-भट्ठे, लकड़ी या अन्य ठोस ईंधन से चलने वाले घरेलू चूल्हे तथा जंगल और फसल अवशेषों की आग शामिल हैं। दक्षिण एशिया के मैदानी इलाकों में पैदा होने वाला प्रदूषण हवा के साथ हिमालय की ऊंची चोटियों तक पहुंच सकता है। इसके साथ खनिज धूल भी बर्फ पर जमा होती है। दोनों मिलकर बर्फ की परावर्तन क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।

ग्लेशियर पिघले तो खतरा सिर्फ पानी तक सीमित नहीं

हिमालयी ग्लेशियर एशिया की कई महत्वपूर्ण नदियों के जल स्रोत हैं। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से शुरुआती दौर में नदियों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है, लेकिन लंबे समय में ग्लेशियरों में जमा पानी का भंडार कम होने का खतरा रहता है। इसके अलावा तेजी से पिघलती बर्फ और ग्लेशियरों के पीछे बन रही झीलें भी चिंता बढ़ाती हैं। यदि ऐसी झीलों की प्राकृतिक या कृत्रिम सीमाएं टूटती हैं तो ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) यानी अचानक भारी बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। इससे पर्वतीय क्षेत्रों में जान-माल और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है।

Himalaya Glacier Melting: क्या ग्लेशियर पिघलने की अकेली वजह कालिख है?

नहीं। हिमालयी ग्लेशियरों के पीछे सबसे बड़ा दीर्घकालिक दबाव जलवायु परिवर्तन और बढ़ता तापमान है। ब्लैक कार्बन को इस व्यापक समस्या के अतिरिक्त एक ऐसा कारक माना जाता है जो कुछ क्षेत्रों में बर्फ और हिम के पिघलने को और तेज कर सकता है। इसलिए ग्लेशियरों की स्थिति को केवल प्रदूषण या केवल तापमान से जोड़ना सही नहीं होगा। तापमान में बढ़ोतरी, बर्फबारी में बदलाव, धूल और ब्लैक कार्बन जैसे कई कारक मिलकर ग्लेशियरों की सेहत को प्रभावित करते हैं।

Himalaya Glacier Melting
                                                   Himalaya Glacier Melting
ब्लैक कार्बन पर नियंत्रण से मिल सकती है जल्दी राहत

कार्बन डाइऑक्साइड के विपरीत ब्लैक कार्बन वातावरण में अपेक्षाकृत कम समय तक रहता है। इसलिए इसके उत्सर्जन में कमी लाने का असर जलवायु और हिम क्षेत्रों पर अपेक्षाकृत तेजी से दिखाई दे सकता है। डीजल वाहनों से निकलने वाले धुएं पर नियंत्रण, स्वच्छ ईंधन और ऊर्जा का इस्तेमाल, ईंट-भट्ठों की तकनीक में सुधार, उद्योगों में बेहतर दहन व्यवस्था और खेतों व जंगलों में आग की घटनाओं में कमी जैसे कदम ब्लैक कार्बन को कम करने में मदद कर सकते हैं।

Himalaya Glacier Melting: हिमालय की सुरक्षा क्यों जरूरी?

हिमालय केवल बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखला नहीं है। यह दक्षिण एशिया की जल सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार है। करोड़ों लोगों की कृषि, पेयजल, ऊर्जा और आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हिमालयी जल स्रोतों पर निर्भर है। इसलिए ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना केवल पर्वतीय क्षेत्रों की समस्या नहीं है। इसका असर मैदानी इलाकों की नदियों, खेती, जल उपलब्धता और आपदा जोखिम तक पहुंच सकता है।

हिमालय के ग्लेशियरों को बचाने की चुनौती दो मोर्चों पर है- एक तरफ बढ़ते वैश्विक तापमान को नियंत्रित करना और दूसरी तरफ ब्लैक कार्बन तथा धूल जैसे प्रदूषकों को हिमालय तक पहुंचने से रोकना। सफेद बर्फ पर जमने वाली काली कालिख भले ही बेहद छोटे कणों से बनी हो, लेकिन हिमालय के भविष्य पर इसका असर बड़ा हो सकता है।

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