Home » देश-विदेश » होर्मुज संकट का सीरिया ने खोजा तोड़, 1,600 किमी पाइपलाइन से दौड़ेगा तेल; भारत को क्यों नहीं मिलेगा फायदा?

होर्मुज संकट का सीरिया ने खोजा तोड़, 1,600 किमी पाइपलाइन से दौड़ेगा तेल; भारत को क्यों नहीं मिलेगा फायदा?

सीरिया के तेल रूट से भारत को क्या फायदा?

Hormuz Bypass Plan: ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर दुनिया की चिंता बढ़ गई है। पश्चिम एशिया से होने वाली तेल सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में होर्मुज में किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर कई देशों की तेल जरूरतों पर पड़ सकता है। तेल की कमी और बढ़ती कीमतों की आशंका के बीच कई देश इसका वैकल्पिक रास्ता तलाश रहे हैं।

इसी बीच सीरिया ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बायपास करने की एक बड़ी योजना सामने रखी है। इस प्रस्ताव में समुद्री और जमीनी रास्तों का इस्तेमाल करते हुए इराक के तेल को भूमध्य सागर तक पहुंचाने की योजना है। अमेरिका समेत कई पश्चिमी देश इसे होर्मुज का विकल्प मान रहे हैं। हालांकि, भारत के नजरिए से देखें तो यह योजना उतनी फायदेमंद नहीं है, जितनी पहली नजर में दिखाई देती है।

1,600 किलोमीटर की पाइपलाइन का प्रस्ताव

सीरिया की योजना के तहत इराक के बसरा शहर से सीरिया के बनियास बंदरगाह तक करीब 1,600 किलोमीटर लंबी तेल पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव है। इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 5.7 अरब डॉलर यानी लगभग 48 हजार करोड़ रुपये बताई गई है। प्रस्तावित पाइपलाइन के जरिए हर दिन करीब 20 लाख बैरल कच्चा तेल भेजने की क्षमता विकसित करने की योजना है।इस रास्ते से इराक का तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरे बिना सीरिया के बनियास बंदरगाह तक पहुंचाया जाएगा। इसके बाद तेल को जहाजों के जरिए भूमध्य सागर से दूसरे देशों तक भेजा जा सकेगा। इस तरह इराक के तेल के लिए होर्मुज के अलावा एक वैकल्पिक रास्ता तैयार हो जाएगा।

Hormuz Bypass Plan: ट्रंप ने बताया शानदार प्लान

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रस्ताव पर उत्साह जताया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इस खबर को साझा करते हुए इसे शानदार बताया। ट्रंप के विशेष दूत टॉम बैरक ने भी दावा किया कि अगर यह पाइपलाइन बन जाती है तो होर्मुज की खाड़ी की मौजूदा अहमियत काफी कम हो सकती है।पश्चिमी मीडिया में भी इस परियोजना को होर्मुज संकट का संभावित समाधान बताया जा रहा है। यूरोप के लिए यह योजना इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे इराक का तेल होर्मुज को पार किए बिना भूमध्य सागर तक पहुंच सकता है।

भारत के लिए क्यों अलग है मामला?

भारत के लिए इस योजना का गणित पश्चिमी देशों से बिल्कुल अलग है। भारत अपनी तेल जरूरत का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। इराक से आने वाले तेल टैंकर आम तौर पर फारस की खाड़ी से निकलकर होर्मुज जलडमरूमध्य पार करते हैं और फिर अरब सागर के रास्ते भारत पहुंचते हैं।भारत की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यह रास्ता काफी सीधा और छोटा है। इसलिए इराक से भारत तक तेल पहुंचाने में मौजूदा समुद्री मार्ग अपेक्षाकृत कम समय और कम लागत वाला है।

Hormuz Bypass Plan: सीरिया के रास्ते बढ़ जाएगी दूरी

अगर भारत सीरिया के प्रस्तावित रास्ते से इराक का तेल मंगाता है तो तेल को भारत तक पहुंचने में लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा। पहले कच्चा तेल पाइपलाइन के जरिए इराक के बसरा से सीरिया के बनियास बंदरगाह तक पहुंचेगा।इसके बाद तेल लेकर जहाज भूमध्य सागर से आगे बढ़ेंगे। वहां से उन्हें स्वेज नहर या जिब्राल्टर के रास्ते से होते हुए आगे जाना होगा और फिर लाल सागर तथा अरब सागर के जरिए भारत पहुंचना होगा। इस लंबे समुद्री सफर के कारण जहाजों के ईंधन पर खर्च बढ़ेगा और तेल की डिलीवरी में भी अतिरिक्त समय लगेगा।

दोनों रास्तों में कितना फर्क?

भारत के लिए मौजूदा और प्रस्तावित रास्ते को आसान तरीके से समझें तो इराक से तेल का मौजूदा रास्ता फारस की खाड़ी, होर्मुज जलडमरूमध्य और अरब सागर होते हुए सीधे भारत तक आता है।वहीं सीरिया वाला रास्ता इराक से पाइपलाइन के जरिए सीरिया के बनियास पोर्ट तक जाएगा। वहां से तेल भूमध्य सागर के रास्ते आगे भेजा जाएगा और फिर स्वेज नहर या जिब्राल्टर, लाल सागर और अरब सागर से होते हुए भारत पहुंचेगा।इस तुलना से साफ है कि भारत के लिए सीरिया का प्रस्तावित रास्ता कोई शॉर्टकट नहीं है। दूरी और परिवहन लागत के लिहाज से मौजूदा होर्मुज मार्ग भारत के लिए ज्यादा सुविधाजनक है।

Hormuz Bypass Plan: सुरक्षा भी बड़ी चुनौती

सीरिया की इस परियोजना के सामने सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। प्रस्तावित 1,600 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन ऐसे इलाकों से होकर गुजर सकती है जहां उग्रवादी संगठनों और ईरान समर्थित लड़ाकों की मौजूदगी बताई जाती है।युद्ध प्रभावित क्षेत्र में इतनी लंबी पाइपलाइन की सुरक्षा करना आसान नहीं होगा। इसे लगातार निगरानी और सुरक्षा की जरूरत होगी। किसी भी तरह की तोड़फोड़ या हमले से तेल की पूरी सप्लाई प्रभावित हो सकती है।

Hormuz Bypass Plan: सीरिया का बुनियादी ढांचा भी सवालों में

सीरिया पिछले कई वर्षों से गृहयुद्ध की वजह से बुरी तरह प्रभावित रहा है। युद्ध के कारण वहां बंदरगाहों, सड़कों और रिफाइनरियों समेत कई महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है।ऐसे में बनियास बंदरगाह को रोजाना लाखों बैरल तेल संभालने के लिए तैयार करना एक बड़ी चुनौती होगी। इसके लिए बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत पड़ेगी। इस वजह से 5.7 अरब डॉलर की अनुमानित शुरुआती लागत के अलावा भी परियोजना पर काफी अतिरिक्त खर्च हो सकता है।

सीरिया की इस योजना की एक और बड़ी समस्या इसका निर्माण समय है। इस परियोजना को पूरा होने में कम से कम ढाई साल लगने का अनुमान है।इसका मतलब है कि अगर होर्मुज में आज तेल सप्लाई प्रभावित होती है तो सीरिया की यह पाइपलाइन तुरंत किसी देश की मदद नहीं कर पाएगी। इसके निर्माण और संचालन में लंबा समय लगेगा।

एशियाई देशों के लिए महंगा विकल्प

सीरिया का यह नया रूट मुख्य रूप से यूरोप और पश्चिमी देशों के लिए ज्यादा उपयोगी साबित हो सकता है। भारत और चीन जैसे बड़े एशियाई तेल खरीदारों के लिए यह रास्ता दूरी और लागत दोनों बढ़ा सकता है।यानी जिस योजना को पश्चिमी देशों के लिए होर्मुज का विकल्प बताया जा रहा है, वही भारत और दूसरे एशियाई देशों के लिए महंगा और लंबा रास्ता बन सकती है।

अमेरिका क्यों चाहता है होर्मुज का विकल्प?

अमेरिका की दिलचस्पी इस योजना में इसलिए भी है क्योंकि इससे पश्चिमी देशों की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है। अमेरिका चाहता है कि यूरोप को इराक का तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरे बिना मिल सके।अगर इराक का तेल पाइपलाइन के जरिए सीरिया और फिर भूमध्य सागर तक पहुंचने लगेगा तो यूरोप के पास तेल आयात का एक अतिरिक्त रास्ता होगा। इससे होर्मुज पर निर्भरता कम हो सकती है और ईरान के पास होर्मुज को बंद करने के जरिए पश्चिमी देशों पर दबाव बनाने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।

Hormuz Bypass Plan: भारत के लिए होर्मुज ही बेहतर

भारत की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह छोड़ना फिलहाल व्यावहारिक नहीं है। फारस की खाड़ी भारत के काफी करीब है और अरब सागर के जरिए तेल की सप्लाई आसानी से भारतीय बंदरगाहों तक पहुंच सकती है।इसलिए भारत के लिए सबसे बेहतर स्थिति यही होगी कि होर्मुज जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता बनी रहे और फारस की खाड़ी से तेल की सीधी सप्लाई जारी रहे।सीरिया की योजना यूरोप और पश्चिमी देशों के लिए एक वैकल्पिक रास्ता जरूर बन सकती है, लेकिन भारत के लिए दूरी, लागत, सुरक्षा और समय को देखते हुए यह मौजूदा होर्मुज मार्ग का बेहतर विकल्प नजर नहीं आती।

ये भी पढ़ें…ग्राउंड रिपोर्ट: कृष्ण जन्म से पहले भक्तिमय हुआ मथुरा, मंगला आरती में उमड़ा सैलाब, रात 12 बजे होगा महाअभिषेक