Janmashtami Controversy: सुल्तानपुर के कोतवाली नगर थाना क्षेत्र के पलहीपुर गांव के महेदवा में जन्माष्टमी के दौरान मूर्ति स्थापना और भंडारे को लेकर विवाद सामने आया है। आयोजन के दौरान पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई के बाद मामला और गरमा गया। ग्राम प्रधान प्रतिनिधि गोरेलाल यादव उर्फ सुमंत यादव ने प्रशासन की कार्रवाई को एकतरफा बताया, जबकि प्रशासन ने इसे सरकारी जमीन पर अनधिकृत निर्माण और गैर-परंपरागत धार्मिक आयोजन से जुड़ा मामला बताया है।
Janmashtami Controversy: प्रधान प्रतिनिधि ने कार्रवाई पर उठाए सवाल
ग्राम प्रधान प्रतिनिधि सुमंत यादव का आरोप है कि प्रशासन ने जन्माष्टमी के कार्यक्रम में बाधा डाली और पूजा-अर्चना के साथ भंडारे को भी प्रभावित किया। उनका कहना है कि यह आयोजन पिछले कई वर्षों से होता आ रहा था और उन्होंने प्रशासन से केवल 12 घंटे का समय मांगा था, ताकि भंडारे का कार्यक्रम पूरा हो सके।सुमंत यादव के मुताबिक, उन्होंने अधिकारियों से कहा था कि 12 घंटे बाद प्रशासन जो भी फैसला लेगा, वह उसे स्वीकार कर लेंगे। उनका आरोप है कि इसके बावजूद उनकी बात नहीं मानी गई और उन्हें खुद तैयार की गई खाद्य सामग्री हटाने के लिए दबाव बनाया गया।
वीडियो सामने आने के बाद मामला और गर्माया
इस विवाद के बीच एक वीडियो भी सामने आया, जिसमें कथित तौर पर ‘सनातन धर्म मुर्दाबाद’ के नारे सुनाई दे रहे हैं। वीडियो में अधिकारियों के सामने आगे से दुर्गापूजा और जन्माष्टमी जैसे पर्व नहीं मनाने की बात कहे जाने का भी दावा किया गया है।इन वीडियो और घटनाक्रम को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह के दावे किए जाने लगे। मामला धीरे-धीरे स्थानीय विवाद से निकलकर राजनीतिक बहस का विषय भी बन गया।
Janmashtami Controversy: प्रशासन ने बताई कार्रवाई की अलग वजह
प्रशासन के मुताबिक, घटना की शुरुआत 3 सितंबर 2026 की रात हुई। उप जिलाधिकारी की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, ग्राम सभा पलहीपुर की सरकारी भूमि पर गाटा संख्या 1689 और 1679 में बिना अनुमति चबूतरे का निर्माण किया गया था। प्रशासन का कहना है कि ग्राम प्रधान के पति गोरेलाल यादव और उनके समर्थकों को इस संबंध में कानूनी जानकारी दी गई।
उक्त प्रकरण के संबंध में उप जिलाधिकारी महोदया द्वारा वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए दी गई बाइट। https://t.co/gPdyQz0LCq pic.twitter.com/aOWrjIAPXP
— District Magistrate Sultanpur (@SultanpurDm) September 8, 2026
प्रशासन के अनुसार, इसके बाद आयोजकों ने खुद ही छोटी मूर्ति को सम्मानपूर्वक वहां से हटा लिया और चबूतरे को भी तोड़ दिया। हालांकि, राजस्व और पुलिस टीम के वहां से जाने के बाद गोरेलाल यादव, रमेश यादव और उनके समर्थकों द्वारा कथित तौर पर भंडारे की खाद्य सामग्री सड़क पर फेंक दी गई और नारेबाजी शुरू कर दी गई।प्रशासन का कहना है कि इस घटना का वीडियो भी बनाया गया। पुलिस के मुताबिक, शांति व्यवस्था प्रभावित करने के प्रयास को लेकर कोतवाली नगर थाने में मुकदमा संख्या 0466/2026 दर्ज किया गया।
प्रशासन ने जातिगत विद्वेष फैलाने का लगाया आरोप
क्षेत्राधिकारी नगर की ओर से दी गई जानकारी में कहा गया कि 4 सितंबर को सरकारी भूमि पर कब्जे के उद्देश्य से चबूतरा बनाए जाने और गैर-परंपरागत धार्मिक आयोजन की सूचना मिली थी। सरकारी जमीन पर किए जा रहे कथित अवैध निर्माण को हटाने के लिए कहा गया, जिसके बाद आयोजकों ने स्वयं निर्माण हटा लिया।पुलिस का कहना है कि बाद में इसी घटना को लेकर कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर असत्य और भ्रामक पोस्ट प्रसारित करना शुरू कर दिया। प्रशासन के अनुसार, इन पोस्ट के जरिए जातिगत विद्वेष पैदा करने और सामाजिक सौहार्द एवं शांति व्यवस्था बिगाड़ने का प्रयास किया गया।पुलिस ने बताया कि ऐसी पोस्ट करने वाले कुछ लोगों को चिह्नित किया गया है और 8 सितंबर को कोतवाली नगर थाने में संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।
Janmashtami Controversy: अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर उठाया मुद्दा
इस पूरे मामले पर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ वर्चस्ववादी लोगों ने जन्माष्टमी के आयोजन में बाधा डालकर पूजा-अर्चना रुकवाई। उन्होंने इसे किसी समुदाय की आस्था पर हमला बताते हुए गंभीर मामला कहा और इसे पाप तथा अपराध तक करार दिया।
अखिलेश यादव ने मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग भी की। उन्होंने कहा कि जिम्मेदार लोगों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए, जिससे भविष्य में कोई सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास न करे। उन्होंने घटना को ‘घोर निंदनीय’ बताया।
नेताओं के लिए भी जिम्मेदारी का सवाल
यहां एक अहम सवाल राजनीतिक नेताओं की जिम्मेदारी को लेकर भी उठता है। अखिलेश यादव कोई सामान्य सोशल मीडिया यूजर नहीं हैं, बल्कि देश के प्रमुख राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और विपक्ष के बड़े नेताओं में शामिल हैं। ऐसे में उनके सोशल मीडिया पर लिखे गए शब्दों का असर आम व्यक्ति की तुलना में कहीं ज्यादा होता है।
किसी भी घटना पर प्रतिक्रिया देना लोकतांत्रिक अधिकार है और विपक्ष का काम सरकार तथा प्रशासन से सवाल पूछना भी है। लेकिन संवेदनशील धार्मिक या जातिगत मामलों में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों की पुष्टि करना भी उतना ही जरूरी है। खासकर तब, जब घटना से जुड़े अलग-अलग पक्षों के बयान सामने आ रहे हों।
यदि किसी घटना की पूरी जानकारी सामने आने से पहले सोशल मीडिया पर एक पक्ष को सही मानकर टिप्पणी की जाती है, तो उससे लोगों के बीच गलत धारणा बन सकती है। धार्मिक और जातिगत विवादों में ऐसी सूचनाएं सामाजिक तनाव को और बढ़ा सकती हैं। इसलिए सिर्फ अखिलेश यादव ही नहीं, बल्कि हर राजनीतिक दल के नेता और जनप्रतिनिधि जब भी ऐसे संवेदनशील मामलों पर सार्वजनिक बयान दें, तो उन्हें तथ्यों की जांच और अपनी जिम्मेदारी दोनों का ध्यान रखना चाहिए।
Janmashtami Controversy: प्रशासन की अपील
प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि इस मामले से जुड़ी किसी भी असत्य, भ्रामक, तथ्यहीन या जातिगत विद्वेष फैलाने वाली सामग्री को सोशल मीडिया पर साझा न करें। पुलिस ने खास तौर पर इंस्टाग्राम, फेसबुक और ‘X’ जैसे प्लेटफॉर्म पर बिना सत्यापन के वीडियो या पोस्ट आगे बढ़ाने से बचने की सलाह दी है।प्रशासन का कहना है कि अपुष्ट जानकारी या भ्रामक वीडियो को बिना जांच के साझा करने से सामाजिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर भ्रामक जानकारी फैलाता पाया जाता है, तो उसके खिलाफ संबंधित धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
थाना कोतवाली नगर क्षेत्रान्तर्गत ग्राम पलहीपुर स्थित सरकारी भूमि पर अनधिकृत निर्माण एवं गैर-परंपरागत आयोजन के संबंध में भ्रामक एवं जातिगत विद्वेष फैलाने के प्रकरण में की गई पुलिस कार्यवाही के संबंध में क्षेत्राधिकारी नगर द्वारा दी गयी बाइटः- pic.twitter.com/1XtpldVNlD
— SULTANPUR POLICE (@sultanpurpolice) September 8, 2026
फिलहाल, इस पूरे विवाद में ग्राम प्रधान प्रतिनिधि और प्रशासन की ओर से अलग-अलग दावे सामने आए हैं। ऐसे में मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए निष्पक्ष जांच और आधिकारिक तथ्यों के आधार पर ही किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना उचित होगा।
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