Lok Sabha: लोकसभा में विपक्षी दलों की ताकत लगातार घटती दिखाई दे रही है। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में हुए राजनीतिक घटनाक्रमों ने राष्ट्रीय राजनीति का समीकरण बदल दिया है। तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना के एक बड़े वर्ग के अलग होने से विपक्षी गठबंधन की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। वहीं दूसरी ओर सत्तारूढ़ गठबंधन की स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत होती नजर आ रही है। इन घटनाक्रमों ने संसद में भविष्य के महत्वपूर्ण विधेयकों और राजनीतिक रणनीतियों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना में बड़ी टूट
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के बीस सांसदों के अलग होने के बाद पार्टी की लोकसभा में संख्या घटकर आठ रह गई है। वहीं महाराष्ट्र में शिवसेना के छह सांसदों के अलग होने की चर्चा के बीच उद्धव ठाकरे गुट के पास केवल तीन सांसद शेष रहने की स्थिति बन गई है। इन दोनों घटनाओं के कारण विपक्षी गठबंधन को सीधे तौर पर छब्बीस सांसदों का नुकसान हुआ है, जिससे उसकी संसदीय ताकत कमजोर हुई है।
Lok Sabha: दक्षिण भारत से भी मिला झटका
राजनीतिक परिदृश्य में एक और बड़ा बदलाव तब सामने आया जब द्रविड़ राजनीति की प्रमुख पार्टी ने विपक्षी गठबंधन से दूरी बनाने का निर्णय लिया। इसके साथ ही उसके बाईस सांसद भी विपक्षी खेमे की संख्या से बाहर माने जा रहे हैं। इन परिवर्तनों के बाद विपक्षी गठबंधन की कुल संख्या घटकर लगभग एक सौ सत्तासी सांसदों तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है। इससे संसद में उसकी प्रभावशीलता पर असर पड़ सकता है।
सत्तारूढ़ गठबंधन की बढ़ती ताकत
लोकसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन के पास वर्तमान में दो सौ तिरानवे सांसद हैं। यदि विभिन्न दलों से अलग हुए सांसदों का समर्थन उसे प्राप्त होता है तो यह संख्या तीन सौ उन्नीस तक पहुंच सकती है। आगे चलकर अन्य दलों का समर्थन मिलने की स्थिति में यह आंकड़ा और बढ़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे सरकार की संसदीय स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत होगी।
Lok Sabha: दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंचता समीकरण
लोकसभा में प्रभावी सदस्य संख्या पांच सौ चालीस मानी जा रही है, जिसमें दो-तिहाई बहुमत के लिए तीन सौ साठ सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है। मौजूदा परिस्थितियों में सत्तारूढ़ गठबंधन इस लक्ष्य के काफी करीब पहुंचता दिखाई दे रहा है। वहीं राज्यसभा में भी गठबंधन की स्थिति मजबूत मानी जा रही है, जहां उसके पास बहुमत के साथ-साथ दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंचने की संभावना बताई जा रही है। आने वाले समय में यह बदलता राजनीतिक गणित राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय कर सकता है।
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