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मध्य प्रदेश किसान कर्ज संकट, सरकारी दावों के बीच फंसा अन्नदाता

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Mp news: मध्य प्रदेश में किसानों की आर्थिक स्थिति को लेकर सरकार बड़े-बड़े दावे करती रही है। जीरो प्रतिशत ब्याज पर लोन और समर्थन मूल्य पर पूरी फसल खरीदने की बात की जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी अलग दिखाई दे रही है। करीब 6 लाख 20 हजार किसान अब डिफॉल्टर की श्रेणी में पहुंच चुके हैं और बैंकिंग सिस्टम से बाहर हो गए हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह गेहूं खरीद में हुई देरी और समय पर भुगतान न होना बताया जा रहा है।

मंडियों में MSP से कम दाम, किसानों को झटका

भोपाल की करौंद मंडी समेत प्रदेश की कई मंडियों में किसानों को उनकी फसल का सही दाम नहीं मिल रहा है। सरकार ने गेहूं का समर्थन मूल्य ₹2,625 प्रति क्विंटल तय किया है, लेकिन किसानों को मंडियों में 2000 से 2200 रुपये प्रति क्विंटल तक ही भाव मिल रहा है। किसानों का कहना है कि मेहनत का पूरा फायदा उन्हें नहीं मिल पा रहा, जिससे उनकी आर्थिक हालत और खराब हो रही है।

Mp news: तुलाई में देरी से बढ़ा संकट

इस साल गेहूं की सरकारी खरीदी पिछले साल की तुलना में 20 से 25 दिन देर से शुरू हुई है। कई जिलों में खरीद प्रक्रिया अप्रैल के दूसरे हफ्ते में शुरू हो पाई। इस देरी के कारण किसान अपनी फसल समय पर नहीं बेच पाए और उन्हें मजबूरी में कम दाम पर निजी व्यापारियों को गेहूं बेचना पड़ा। इसका सीधा असर उनकी कर्ज चुकाने की क्षमता पर पड़ा है।

Mp news: कर्ज की समस्या और बढ़ता ब्याज बोझ

नियमों के अनुसार यदि किसान 31 मार्च तक अपना पुराना कर्ज नहीं चुका पाता है, तो उसे डिफॉल्टर मान लिया जाता है। इस स्थिति में किसानों पर 12% तक ब्याज का बोझ बढ़ जाता है। कई किसानों का कहना है कि जब तक फसल बिकेगी नहीं, तब तक वे बैंक की किस्त कैसे चुकाएं। मजबूरी में उन्हें साहूकारों से कर्ज लेना पड़ रहा है, जिससे स्थिति और बिगड़ रही है।

सरकारी आंकड़े और जमीनी सच्चाई

आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश के 55 जिलों में लगभग 6 लाख 20 हजार किसान डिफॉल्टर हो चुके हैं। इनमें बड़ी संख्या छोटे किसानों की है। इन पर करीब 450 करोड़ रुपये का बकाया बताया जा रहा है। किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) के तहत लिए गए कर्ज समय पर न चुकाने की वजह से वे बैंकिंग सुविधा से बाहर हो गए हैं।

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज

इस मुद्दे पर राजनीति भी गर्म हो गई है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार ने जानबूझकर खरीदी में देरी की, जिससे बड़े व्यापारियों और बिचौलियों को फायदा हुआ। वहीं सरकार की तरफ से कहा गया है कि बारदाने की कमी और तकनीकी कारणों की वजह से खरीद प्रक्रिया में देरी हुई है, और जल्द ही स्थिति सुधारी जाएगी।

सिस्टम में फंसा अन्नदाता

Mp news: प्रदेश में करीब 19 लाख किसानों ने गेहूं बेचने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया था और सरकार ने बड़े लक्ष्य तय किए थे, लेकिन खरीद प्रक्रिया की धीमी रफ्तार ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। आज स्थिति यह है कि किसान अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचने और बढ़ते ब्याज का बोझ उठाने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि इस व्यवस्था में आखिर किसान कब तक यूं ही फंसता रहेगा?

 

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