New Delhi: केजरीवाल के सामने अब अहम चुनौतियां, क्या भविष्य में कर पाएंगे कोई करिश्मा ? आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता अरविंद केजरीवाल को झटके पर झटके लगते जा रहे हैं।पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में हुई हार और अब पार्टी में टूट। सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि पार्टी के नेता जिस तरह उनसे छिटककर अलग होते जा रहे हैं, क्या ऐसी स्थिति में अब आम आदमी पार्टी की पहले जैसी साख बरकरार रह पाएगी ? हालांकि केजरीवाल एवं उनके करीबी सहयोगी दावा कर सकते हैं कि 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों के चले जाने से पार्टी कमजोर नहीं होगी, लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी पार्टी में होने वाली बड़ी टूट के गहरे मायने हैं। इस टूट से न सिर्फ पार्टी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठते हैं , बल्कि कार्यकर्ताओं का मनोबल भी गिरता है।
पार्टी के लिए बड़ा झटका
किसी भी पार्टी को टूट से इतना बड़ा नुकसान होता है कि भविष्य में उसके उबर पाने की संभावनाएं क्षीण हो जाती हैं। टूट के बाद कोई भी पार्टी तभी उबर सकती है, जबकि उसका नेतृत्व मजबूत हो अथवा करिश्माई हो।एक समय जब कांग्रेस में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसे मजबूत नेता थे, तो तब कोई पार्टी से अलग होने की सोचता भी नहीं था।यदि कोई नेता गए भी तो पार्टी फिर से पटरी पर वापस आई, लेकिन बाद के वर्षों में कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ खुलकर असंतोष के स्वर उठे।पार्टी में बड़ी टूट तक हुई।छोटे से लेकर बड़े स्तर के नेताओं का पार्टी छोड़ने का सिलसिला भी शुरू हुआ।इसका कांग्रेस को काफी नुकसान हुआ। इसी तरह एक समय उत्तर प्रदेश में बसपा में टूट हुई थी, लेकिन तब स्वर्गीय कांशीराम का करिश्माई व्यक्तित्व ही था कि उस टूट के बावजूद बसपा का जनाधार बना रहा। यहां तक कि मायावती ने उस जनाधार के बूते यूपी में बड़ी शान से शासन किया।
New Delhi: सवाल जो जवाब मांगते हैं
शायद केजरीवाल को यह आत्मविश्वास है या फिर अहं कि वे पार्टी को अपने बूते फिर से खड़ा कर सकते हैं।शायद उन्हें लगता होगा कि प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, कुमार विश्वास सरीखे कई अन्य नेताओं के चले जाने के बावजूद वे मजबूती से टिके रहे, लेकिन इस मजबूती के पीछे की ठोस वजह यह है कि उन्हें जन विश्वास हासिल था। इसी जन विश्वास के बूते अन्ना आंदोलन के गर्भ से उपजी आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल का दिल्ली में लंबे समय तक काफी अच्छा जलवा रहा।आज पंजाब में भी पार्टी की सरकार है। कुछ अन्य राज्यों में भी आम आदमी पार्टी ने अपनी बेहतर संभावनाएं जगाई, लेकिन यह भी सच है कि आज अरविंद केजरीवाल का वह पहले जैसा करिश्माई व्यक्तित्व नहीं रहा। केजरीवाल के लिए आत्ममंथन का विषय है कि एक समय दिल्ली की जिस जनता ने उन्हें एकतरफा ऐतिहासिक विजय दिलाई, क्या कारण है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में उसी जनता ने उन्हें सत्ता से उतार भी दिया ? क्यों इस चुनाव में उनकी पार्टी केवल 22 सीटों पर सिमट गई ? ऐसे में उन्हें सोचना होगा कि क्या जनता के बीच उनकी पहले जैसी छवि बरकरार है ? कथित शराब नीति घोटाले के मामले में बेशक निचली अदालत ने उन्हें राहत दी हो, लेकिन जनता में इसका गलत संदेश गया तो दिल्ली विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को नुकसान हो गया।केजरीवाल ने शुरू में सादगी से रहने का संदेश दिया था, लेकिन उनके आवास ‘शीशमहल’ को लेकर उठे सवालों ने आम आदमी वाली उनकी छवि को काफी प्रभावित किया।वे मानें या न मानें आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता उनमें करिश्माई नेतृत्व की जो छवि देखता था, आज वह छवि काफी हद तक धूमिल पड़ चुकी है। अब केजरीवाल के सामने यही चुनौती है कि वह कैसे भविष्य में खुद को बेहतर साबित कर पाते हैं।
New Delhi: किसी के सिर ठीकरा फोड़ देना ही काफी नहीं
आज केजरीवाल एवं उनके वरिष्ठ सहयोगी बेशक पार्टी सांसदों की टूट का ठीकरा भाजपा के सिर फोड़ लें, लेकिन सवाल यह भी उठ सकता है कि राज्यसभा के जिन सांसदों ने पार्टी से अलग होने का फैसला लिया, उसके लिए क्या सारा दोष उन्हीं को दिया जाना चाहिए? क्या उनके सिर पर दोष मढ़ देने मात्र से पल्ला झाड़ा जा सकता है? क्या इतने भर से पार्टी मुखिया या वरिष्ठ नेताओं के कर्तव्य की इतिश्री हो जाएगी ? आम आदमी पार्टी के नेताओं का असंतोष समय-समय पर सामने आता रहा, मीडिया की सुर्खियों में भी बना रहा, लेकिन क्या पार्टी मुखिया या वरिष्ठ नेताओं ने उनके असंतोष को दूर करने की कोशिश की ? जब पार्टी का कोई नेता मुख्यमंत्री के आवास पर खुद से मारपीट और बदसलूकी होने की शिकायत करे, तो उसकी बात को गंभीरता से लिया गया नहीं ? केजरीवाल अच्छी तरह जान लें कि पार्टी में हुई यह टूट पार्टी के लिए बड़ा झटका और भविष्य के लिए गंभीर चुनौती है।








