New Delhi: सोनम वांगचुक ने सरकार के आश्वासन पर 26 दिनों के बाद जिन स्थितियों में अपना अनशन समाप्त किया तो निश्चित ही यह उनका व्यावहारिक फैसला माना जाना चाहिए। उनका स्वास्थ्य जिस तेजी से प्रभावित हुआ उसे देखते हुए जनता के बीच से यह मांग उठ रही थी कि उनका जिंदा रहना समाज के लिए जरूरी है, लेकिन अब जब उन्होंने अनशन समाप्त कर लिया, तो फिर उनके फैसले और तरीके पर प्रश्न क्यों ?
सरकार पर भरोसा करना क्या गुनाह है?
आश्चर्यजनक है कि सोशल मीडिया पर कल तक जो लोग सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य को लेकर बेहद चिंतित थे, आज उन्हीं में से कई उनके खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं, तीखे कटाक्ष कर रहे हैं। कुछ लोग तो यहां तक तंज कर रहे हैं कि गांधीवादी ने भाजपाइयों के हाथ से जूस क्यों पिया? ये लोग भूल जाते हैं कि जब सत्ता में भाजपा है, तो सोनम भाजपा सरकार के मंत्रियों के आश्वासन पर ही तो अनशन वापस लेते? जब मांग सरकार से थी, तो आश्वासन भी तो उसी से चाहिए था। जब मंत्री खुद उनके पास अनशन वापस लेने की अपील के साथ पहुंचे, तो क्या वे यह कहते कि मुझे आप पर भरोसा नहीं है? जब सरकार के मंत्री उन्हें आश्वासन देकर जूस पिलाना चाहता थे, तो उस आश्वासन पर भरोसा करने में कौन सा गुनाह है? क्या उन्हें अड़ियल रवैया अपना चाहिए था?
New Delhi: तो क्या जीवन खत्म कर देते?
दुनिया देख रही है कि लगातार 26 दिनों की भूख हड़ताल से सोनम वांगचुक का वजन करीब 11 किलोग्राम घट गया था। उनका स्वास्थ्य बिगड़ता देख उन्हें मेदांता अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह के नेतृत्व में सरकार की ओर से उन्हें प्रदर्शनकारी छात्रों पर कोई कानूनी कार्रवाई (FIR) न करने और संसद में शिक्षा व परीक्षा प्रणाली पर चर्चा का भरोसा मिला। इसके अलावा विभिन्न पार्टियों के कई सांसदों ने व्यक्तिगत रूप से या पत्र के जरिये उनसे अनशन तोड़ने का अनुरोध किया। जनता के बीच से पहले ही इस तरह की मांग उठ रही थी। ऐसे में सोनम वांगचुक अनशन समाप्त नहीं करते, तो क्या जीवन खत्म कर देते?
New Delhi: व्यावहारिक फैसला
देश के एक बड़े वर्ग का मानना है कि तनाव व हिंसा टालने तथा संसद में परीक्षा प्रणाली की जवाबदेही तय करने पर सहमति बनने के बाद सोनम वांगचुक का अनशन वापस लेना एक व्यावहारिक फैसला है। इसके बावजूद कई लोग सोशल मीडिया पर सोनम वांगचुक के खिलाफ तीखी प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि उन्हें अब राज्यपाल बना दिया जाएगा, तो कोई कह रहा है कि उन्हें सीएम बना दिया जाएगा। उन पर संदेह करने से पहले यह भी सोचना होगा कि आखिरकार लोकतंत्र में संवाद से ही रास्ता निकलता है। सोनम वांगचुक ने छात्रों के समर्थन में अनशन किया और छात्रों की समस्याओं के समाधान पर अनशन वापस लिया तो यह व्यावहारिक फैसला है। जब लड़ाई सरकार से थी तो सरकार के मंत्रियों की मौजूदगी में अनशन वापस लेने में कोई हर्ज नहीं है।








