Opinion: भारत दुनिया का एक बड़ा लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र में (Leader of the Opposition) का बहुत बड़ा महत्व होता है। उसे ‘छाया प्रधानमंत्री’ (Shadow Prime Minister) के तौर पर देखा जाता है। जनहित के मुद्दों पर उससे सदैव रचनात्मक भूमिका निभाने की अपेक्षा रहती है। अपेक्षाओं पर खरा उतरने के बाद जनता उसके हाथों में देश का भविष्य भी सौंप देती है, लेकिन इसके लिए विपक्ष के नेता को सदैव अपनी गरिमा का अहसास रखना होता है। उसे यह भी ध्यान रखना होता है कि लोकतंत्र में अपनी आवाज उठाने का जो तरीका वह अपनाएगा, देश की जनता भी उसी का अनुसरण करती है। अनुसरण हमेशा बड़े का ही किया जाता है।
राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर (FIR) क्यों?
मंगलवार 6 अक्टूबर को विपक्षी दलों के नेताओं ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में संसद भवन से चुनाव आयोग मुख्यालय तक विरोध मार्च निकाला।संसद मार्ग पर उन्हें बैरिकेड्स लगाकर रोक दिया गया।पुलिस का आरोप है कि रोके जाने के बाद राहुल गांधी विपक्षी सांसदों और सुरक्षाकर्मियों के साथ जबरन संसद मार्ग स्थित आकाशवाणी भवन के परिसर में घुस गए और वहां धरना शुरू कर दिया। यह धरना लगभग आठ घंटे से अधिक समय तक चला।इस पर पुलिस ने राहुल गांधी, सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा सहित कई अन्य नेताओं के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की है, तो कांग्रेस एवं विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। उन्होंने इसका जोर-शोर से विरोध करने का ऐलान किया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या देश की जनता राहुल गांधी और अन्य नेताओं के आकाशवाणी भवन परिसर में जाकर धरने पर बैठने का आँख मूँदकर समर्थन कर लेगी?
Opinion: क्या पुलिस अपना फर्ज भी न निभाए?
यह सच है कि अतीत में भी कई बार विपक्षी दलों और उनके नेताओं ने बिना अनुमति लिये या प्रशासन का प्रतिबंध होने के बावजूद विरोध-प्रदर्शन व आंदोलन किए हैं। आपातकाल के दौरान और उसके बाद भी कई मौकों पर विपक्षी नेताओं ने प्रशासनिक प्रतिबंधों की परवाह किए बिना विरोध-प्रदर्शन कर गिरफ्तारियां दी।तमाम जनांदोलनों में निषेधाज्ञा के उल्लंघन पर पुलिस द्वारा हिरासत में लिये जाने की घटनाएं आम रही हैं, लेकिन विरोध-प्रदर्शन का मतलब यह भी नहीं कि जिस दिशा में जाना हो, उसके बजाए कहीं और चले जाएं? विपक्षी दलों के नेता भले ही कुछ भी तर्क दें, वे पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर (FIR) को राजनीतिक प्रतिशोध करार दे सकते हैं, लेकिन आखिर पुलिस एफआईआर भी तो किसी आधार पर ही दर्ज कर सकती है? जब हमारे जिम्मेदार नेता विरोध मार्च निकालते वक्त रोके जाने पर जबरन किसी सरकारी भवन के परिसर में जाकर वहां धरने पर बैठ जाएं, तो क्या पुलिस उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का फर्ज भी न निभाए?
जनता आँख मूँदकर क्यों समर्थन करेगी?
सवाल उठ सकता है कि आखिर राहुल गांधी का लक्ष्य चुनाव आयोग तक जाने का था या आकाशवाणी भवन जाने का था? किसी विरोध- प्रदर्शन के दौरान युवा या छात्र ऐसा कर दें, तो माना जा सकता है कि यह उनके भीतर का जोश था। युवाओं में जोश होता भी है, लेकिन क्या विपक्ष के नेता को ऐसा जोश दिखाना उचित होगा? राहुल गांधी अपनी आत्मा से पूछें कि महत्वपूर्ण विषयों पर उन्हें ZEN-G की तर्ज पर जोश दिखाने की जरूरत है या फिर विपक्ष के नेता की गरिमा के अनुकूल विरोध-प्रदर्शन करना चाहिए? ठीक है कि वे चुनाव आयोग मुख्यालय जाना चाहते थे, उन्हें रोका गया तो वे आकाशवाणी भवन का रुख करने के बजाय वहीं गिरफ्तारी देकर जनता तक अपना संदेश पहुंचा सकते थे। देश की जनता भी यह अपेक्षा रखती है कि विपक्षी नेताओं के साथ पुलिस का व्यवहार सम्मानजनक हो, लेकिन यदि विपक्षी नेता अपने वास्तविक गंतव्य के बजाए जबरन कहीं और चले जाएं, तो भला जनता आँख मूँदकर क्यों उनके पीछे चल देगी? जनता अपने नेताओं से प्रेरित अवश्य होती है, लेकिन सोच-विचार के साथ…।









