Pakistan Taliban Meeting: पाकिस्तान ने एक बार फिर अफगानिस्तान में भारत की राजनयिक मौजूदगी पर सवाल उठाते हुए तालिबान से जलालाबाद स्थित भारतीय कांसुलेट बंद कराने की मांग की है। हालांकि, तालिबान ने पाकिस्तान की इस मांग का ऐसा जवाब दिया कि इस्लामाबाद की रणनीति उसी पर भारी पड़ती नजर आई। तालिबान ने साफ कहा कि अगर जलालाबाद में भारत का कांसुलेट बंद कराया जाता है तो वहां पाकिस्तान का कांसुलेट भी बंद करना होगा। इतना ही नहीं, कंधार में हुई एक कथित गुप्त बैठक में पाकिस्तान ने रूस और ईरान को लेकर भी कई मांगें रखीं, जिन्हें तालिबान ने खारिज कर दिया।
Pakistan Taliban Meeting: 22 अक्टूबर को कंधार पहुंचा पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल
अफगानिस्तान के न्याय मंत्री फजल अहमद मेनई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सूत्रों के हवाले से इस बैठक की जानकारी साझा की। उनके मुताबिक, 22 अक्टूबर को जनरल इनायत हुसैन के नेतृत्व में पाकिस्तान का एक सुरक्षा और राजनयिक प्रतिनिधिमंडल कंधार पहुंचा था। इस प्रतिनिधिमंडल में सुरक्षा क्षेत्र के चार अधिकारी और पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का एक प्रतिनिधि शामिल था। इसके अलावा काबुल और कंधार में तैनात पाकिस्तानी कांसुलर मामलों के अधिकारी भी बैठक में मौजूद बताए गए। दावे के मुताबिक, पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल सुबह करीब 9 बजे स्पिन बोल्डक सीमा के रास्ते अफगानिस्तान में दाखिल हुआ। इसके बाद उसने कंधार में तालिबान के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की और रात करीब 10 बजे क्वेटा लौट गया।
Pakistan Taliban Meeting: बैठक में तालिबान के कई बड़े नेता रहे मौजूद
कंधार में हुई इस बैठक में तालिबान की ओर से कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। इनमें कंधार के गवर्नर मुल्ला शिरीन, मुल्ला तालिब, तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद, उप गृह मंत्री सद्र इब्राहिम, रक्षा मंत्रालय के मुख्य निरीक्षक मुफ्ती लुत्फुल्लाह हकीमी और सैन्य खुफिया प्रमुख मुल्ला अब्दुल कादूस के नाम शामिल हैं। बताया गया है कि इस बैठक में पाकिस्तान ने पांच बड़े मुद्दे उठाए। इनमें भारत की राजनयिक मौजूदगी, रूस से ईरान को मिलने वाली लॉजिस्टिक सहायता और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से जुड़े मुद्दे प्रमुख थे।
भारतीय कांसुलेट बंद कराने की पाकिस्तान की मांग
पाकिस्तान लंबे समय से अफगानिस्तान में भारत की राजनयिक मौजूदगी पर आपत्ति जताता रहा है। इस बार भी उसने जलालाबाद स्थित भारतीय कांसुलेट को बंद कराने की मांग उठाई। हालांकि, तालिबान ने इस मांग को स्वीकार करने के बजाय पाकिस्तान के सामने ही सवाल खड़ा कर दिया। उसने कहा कि अगर जलालाबाद में भारतीय कांसुलेट बंद किया जाता है तो उसी शहर में पाकिस्तान का कांसुलेट भी बंद करना पड़ेगा। इस जवाब से पाकिस्तान की मांग पर सवाल खड़े हो गए। दरअसल, अफगानिस्तान में भारतीय राजनयिक मिशनों को लेकर पाकिस्तान की आपत्ति काफी पुरानी है।
2007 में भी उठा था भारतीय मिशनों का मुद्दा
भारत के राजनयिक मिशनों को लेकर पाकिस्तान पहले भी सवाल उठाता रहा है। 2007 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय भी तालिबान की ओर से ऐसी मांग की गई थी। तब अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति हामिद करजई ने पाकिस्तान की आपत्ति पर सवाल उठाए थे। उन्होंने पूछा था कि अगर अफगानिस्तान में भारतीय राजनयिक मिशन पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए खतरा हैं तो फिर पाकिस्तान ने अपनी जमीन पर भारतीय राजनयिक मिशनों की मौजूदगी क्यों स्वीकार की है? उन्होंने इस्लामाबाद स्थित भारतीय दूतावास का भी जिक्र किया था।
रूस से ईरान को मिलने वाली मदद रोकने की मांग
कंधार की बैठक में पाकिस्तान ने रूस और ईरान से जुड़ा मुद्दा भी उठाया। उसने तालिबान से मांग की कि अफगानिस्तान के रास्ते रूस से ईरान तक पहुंचने वाली लॉजिस्टिक सहायता को रोका जाए। हालांकि, तालिबान ने पाकिस्तान की इस मांग को साफ तौर पर खारिज कर दिया। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तान किस तरह की लॉजिस्टिक सहायता को रोकने की मांग कर रहा था। इसलिए इसे सीधे तौर पर हथियारों की आपूर्ति से जोड़ना सही नहीं होगा।
TTP के मुद्दे पर भी तालिबान ने रखी शर्त
बैठक में पाकिस्तान ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के नेताओं को सौंपने की मांग भी उठाई। इस मुद्दे पर तालिबान ने कथित तौर पर सकारात्मक रुख दिखाया, लेकिन इसके बदले पाकिस्तान के सामने अपनी शर्त रख दी। तालिबान ने पाकिस्तान से अपनी जमीन पर तालिबान विरोधी संगठनों के कार्यालय और प्रशिक्षण केंद्र बंद करने की मांग की।
पाकिस्तान को दिखाए गए कथित दस्तावेज
रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान ने पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल को कुछ दस्तावेज भी दिखाए। इन दस्तावेजों में पाकिस्तान की जमीन पर तालिबान विरोधी संगठनों के कार्यालयों और प्रशिक्षण केंद्रों की मौजूदगी का जिक्र होने का दावा किया गया। इस तरह TTP के मुद्दे पर भी तालिबान ने पाकिस्तान की मांग को बिना शर्त स्वीकार नहीं किया। उसने साफ कर दिया कि अगर पाकिस्तान अफगानिस्तान से सहयोग चाहता है तो उसे भी अपनी जमीन पर सक्रिय तालिबान विरोधी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी।
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