Petrol-Diesel Price: होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव और वैश्विक तेल संकट के बीच भारत के लिए नई मुश्किल खड़ी हो गई है। अमेरिका ने रूसी तेल खरीद पर दी गई अस्थायी छूट को आगे नहीं बढ़ाया है, जिससे भारतीय रिफाइनरियों पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने बड़े पैमाने पर रियायती रूसी कच्चा तेल खरीदा था। इससे देश को महंगे वैश्विक तेल बाजार के असर से काफी राहत मिली थी। लेकिन अब अमेरिकी छूट खत्म होने के बाद भारत को फिर महंगे मध्य-पूर्वी तेल पर निर्भर होना पड़ सकता है।
105 डॉलर के पार पहुंचा कच्चा तेल
रिपोर्ट्स के मुताबिक, होर्मुज संकट के चलते वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। संघर्ष शुरू होने से पहले जहां तेल करीब 72 डॉलर प्रति बैरल था, वहीं अब इसकी कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुकी है। तेल टैंकरों की आवाजाही धीमी होने और इंश्योरेंस लागत बढ़ने से स्थिति और गंभीर हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव लंबा खिंचता है तो भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ सकता है।
Petrol-Diesel Price: रूस बना था भारत का सबसे बड़ा सप्लायर
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने भारत और चीन को रियायती दरों पर तेल उपलब्ध कराया था। इसी वजह से रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर बन गया। डेटा के अनुसार, मई में भारत का रूसी तेल आयात रिकॉर्ड 2.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया था। कुछ महीनों में भारत के कुल तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी लगभग आधी हो गई थी।
आम जनता पर पड़ सकता है असर
अगर भारतीय कंपनियां रूस से खरीद कम करती हैं, तो इसका सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ सकता है। पेट्रोल-डीजल, एलपीजी, हवाई किराया और ट्रांसपोर्ट लागत में बढ़ोतरी की आशंका है। सरकार के सामने अब टैक्स कटौती, सब्सिडी या सरकारी तेल कंपनियों पर बोझ डालने जैसे विकल्प हैं, लेकिन हर विकल्प का आर्थिक दबाव भी जुड़ा हुआ है।
Petrol-Diesel Price: ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ी चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब ऊर्जा सुरक्षा के लिए नए स्रोतों और दीर्घकालिक रणनीति पर तेजी से काम करना होगा। क्योंकि देश अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है और वैश्विक संकट का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
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