RSS 101 Years: 27 सितंबर 1925 को नागपुर में विजयादशमी के दिन शुरू हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 2026 में अपने 100 वर्ष पूरे कर 101वें वर्ष में प्रवेश कर गया है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से लेकर मोहन भागवत तक छह सरसंघचालक RSS की कमान संभाल चुके हैं। लेकिन जिस संगठन को आज दुनिया RSS के नाम से जानती है, उसका नाम स्थापना के करीब सात महीने बाद तय हुआ था।
नागपुर से शुरू हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज देश के प्रमुख सामाजिक-संगठनों में गिना जाता है। 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की शुरुआत की थी। संघ के अपने आधिकारिक इतिहास के अनुसार, उस समय संगठन का नाम तय नहीं हुआ था। बाद में 17 अप्रैल 1926 को डॉ. हेडगेवार के घर पर हुई बैठक में नाम को लेकर चर्चा हुई और ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम चुना गया। तो 100 साल के इस सफर में संघ की कमान किन लोगों ने संभाली? संघ का नाम कैसे तय हुआ? और RSS में सरसंघचालक की भूमिका क्या होती है? समझिए पूरी कहानी।
1. RSS की स्थापना कब और कहां हुई?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शुरुआत 27 सितंबर 1925 को नागपुर में हुई थी। यह दिन विजयादशमी का था। RSS के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने इस दिन संघ की शुरुआत की और संगठन की शुरुआती गतिविधियां नागपुर में हुईं। शुरुआती दौर में शारीरिक प्रशिक्षण, अनुशासन और राष्ट्रीय विषयों पर चर्चा जैसी गतिविधियां आयोजित की जाती थीं। यानी जिस संगठन को आज राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े नेटवर्क के रूप में देखा जाता है, उसकी शुरुआत करीब एक सदी पहले नागपुर से हुई थी।
RSS 101 Years: 2. संघ का नाम उसी दिन क्यों नहीं रखा गया?
27 सितंबर 1925 को संघ की शुरुआत तो हो गई थी, लेकिन संगठन का अंतिम नाम उस दिन तय नहीं हुआ था। करीब सात महीने बाद 17 अप्रैल 1926 को डॉ. हेडगेवार के घर पर नाम तय करने के लिए बैठक बुलाई गई। RSS के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, उस बैठक में चार नाम प्रस्तावित थे- जरिपटका मंडल, भारत उद्धारक मंडल, हिंदू सेवक संघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चर्चा के बाद ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम चुना गया।
3. क्या नाम पर वोटिंग हुई थी?
इससे जुड़ी अलग-अलग विवरण मिलते हैं। कुछ प्रकाशित विवरणों में 26 स्वयंसेवकों की बैठक और वोटिंग का उल्लेख मिलता है, जिसमें ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम को बहुमत मिलने की बात कही गई है। हालांकि RSS के आधिकारिक ऐतिहासिक रिकॉर्ड में मुख्य रूप से यह दर्ज है कि 17 अप्रैल 1926 को डॉ. हेडगेवार के घर हुई बैठक में चार नामों पर विचार के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम चुना गया।
RSS 101 Years:4. ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम का मतलब क्या है?
नाम के तीन हिस्से हैं-राष्ट्रीय, स्वयंसेवक और संघ। ‘राष्ट्रीय’ संगठन के राष्ट्र-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है, ‘स्वयंसेवक’ उन लोगों को कहा जाता है जो स्वेच्छा से संगठन की गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं और ‘संघ’ संगठन या समूह को दर्शाता है। इसी नाम का संक्षिप्त रूप आगे चलकर RSS के तौर पर व्यापक रूप से इस्तेमाल हुआ।

5. अब तक कितने सरसंघचालक हुए?
RSS के मौजूदा रिकॉर्ड के अनुसार 1925 से अब तक छह सरसंघचालक रहे हैं। मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत हैं। इनका क्रम इस तरह है- डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, 1925 से 1940 तक संघ के संस्थापक और पहले सरसंघचालक रहे। माधव सदाशिव गोलवलकर,1940 में हेडगेवार के निधन के बाद उन्होंने संघ की कमान संभाली और 1973 तक सरसंघचालक रहे। मधुकर दत्तात्रेय देवरस, 1973 में उन्होंने जिम्मेदारी संभाली और करीब दो दशक तक संघ का नेतृत्व किया। राजेंद्र सिंह,1994 से 2000 तक सरसंघचालक रहे। के. एस. सुदर्शन , 2000 से 2009 तक उन्होंने संघ का नेतृत्व किया। मोहन भागवत, 2009 से वह संघ के सरसंघचालक हैं।
RSS 101 Years: 6. हेडगेवार से भागवत तक कितने साल का सफर?
करीब 101वें वर्ष में प्रवेश कर चुके RSS के इतिहास में नेतृत्व के स्तर पर छह प्रमुख सरसंघचालक रहे हैं। डॉ. हेडगेवार ने 1925 में संगठन की नींव रखी। उनके बाद गोलवलकर ने लंबे समय तक संगठन का नेतृत्व किया। फिर देवरस, राजेंद्र सिंह और के. एस. सुदर्शन के बाद 2009 में मोहन भागवत ने सरसंघचालक का पद संभाला। इस तरह संघ के इतिहास में नेतृत्व परिवर्तन हुआ, लेकिन सरसंघचालक का पद संगठन की केंद्रीय नेतृत्व व्यवस्था का प्रमुख हिस्सा बना रहा।

7. क्या सरसंघचालक ही RSS का रोजमर्रा का पूरा काम देखते हैं?
संघ में अलग-अलग स्तर पर कई पद और जिम्मेदारियां होती हैं। सरसंघचालक संगठन के सर्वोच्च मार्गदर्शक पद पर होते हैं, जबकि संगठन के दैनिक और प्रशासनिक कामकाज में सरकार्यवाह और अन्य पदाधिकारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। RSS की आधिकारिक संरचना में क्षेत्रीय और प्रांतीय स्तर पर भी अलग-अलग जिम्मेदारियां तय हैं। इसलिए संघ का संचालन सिर्फ एक व्यक्ति के माध्यम से नहीं होता।
RSS 101 Years: 8. संघ की पहली शाखा कब शुरू हुई?
नाम तय होने के बाद संगठन की गतिविधियां भी व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ीं। RSS के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, नागपुर के मोहितेवाड़ा मैदान में 28 मई 1926 से नियमित दैनिक शाखा शुरू हुई। शुरुआती दौर में शारीरिक प्रशिक्षण और संगठनात्मक गतिविधियां शाखा का हिस्सा थीं। इसके बाद शाखाओं का विस्तार नागपुर से बाहर भी हुआ और धीरे-धीरे संघ का संगठनात्मक नेटवर्क बढ़ता गया।
9. RSS की खास संगठनात्मक व्यवस्था क्या है?
RSS की सबसे पहचानी जाने वाली गतिविधियों में शाखा शामिल है। शाखाओं में स्वयंसेवक नियमित रूप से मिलते हैं और शारीरिक तथा बौद्धिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं। संघ की संगठनात्मक व्यवस्था में शाखा से लेकर नगर, जिला, प्रांत और अखिल भारतीय स्तर तक अलग-अलग जिम्मेदारियां होती हैं। यही विकेंद्रीकृत ढांचा RSS के लंबे संगठनात्मक विस्तार की एक महत्वपूर्ण विशेषता माना जाता है।
RSS 101 Years: 10. 100 साल पूरे होने के बाद RSS कहां खड़ा है?
27 सितंबर 2025 को RSS ने स्थापना के 100 वर्ष पूरे किए थे और 27 सितंबर 2026 से वह 101वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। संघ ने अपने शताब्दी वर्ष के दौरान देश और विदेश में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए। RSS की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, संगठन ने शताब्दी वर्ष के दौरान विदेशों में भी कार्यक्रमों और गतिविधियों का विस्तार किया। आज RSS का प्रभाव केवल अपनी शाखाओं तक सीमित नहीं माना जाता। उससे जुड़े या उसके विचारों से प्रभावित कई सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संगठन अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय हैं।
11. RSS और राजनीति का क्या संबंध है?
RSS स्वयं को एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है और सीधे चुनाव लड़ने वाला राजनीतिक दल नहीं है। हालांकि भारतीय राजनीति में RSS की चर्चा इसलिए भी होती है क्योंकि उससे वैचारिक रूप से जुड़े संगठनों का व्यापक नेटवर्क है और भारतीय जनता पार्टी के साथ उसके संबंधों पर लंबे समय से सार्वजनिक चर्चा होती रही है। इसलिए RSS के 100 वर्षों के इतिहास को समझते समय उसके सामाजिक-संगठनात्मक काम के साथ भारतीय राजनीति में उसके प्रभाव और उससे जुड़े संगठनों की भूमिका को भी अलग-अलग समझना जरूरी है।
12. अब आगे क्या?
101वें वर्ष में प्रवेश के साथ RSS के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि आने वाले वर्षों में संगठन अपनी पुरानी शाखा-आधारित व्यवस्था और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच किस तरह तालमेल बनाएगा। शताब्दी वर्ष के बाद संघ की गतिविधियों में संगठन विस्तार, सामाजिक संपर्क और नई पीढ़ी को जोड़ना प्रमुख विषय बने रह सकते हैं। इन विषयों पर संघ की ओर से समय-समय पर अलग-अलग कार्यक्रम और अभियान भी चलाए जाते रहे हैं।
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