Sugar Price Hike: चाय की प्याली से लेकर मिठाई की दुकानों तक इस्तेमाल होने वाली चीनी इन दिनों आम आदमी की जेब पर असर डाल रही है। केन्द्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 20 जुलाई से 20 अगस्त के बीच चीनी की कीमत ₹48.18 से बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो हो गई। यानी करीब एक महीने में कीमत में ₹7.52 प्रति किलो और लगभग 15.6% की बढ़ोतरी हुई।
लेकिन सवाल यह है कि जब देश में चीनी का उत्पादन पिछले साल से ज्यादा रहने का अनुमान है, तो फिर कीमत क्यों बढ़ रही है? क्या इसके पीछे इथेनॉल है? क्या एक्सपोर्ट ने घरेलू बाजार में उपलब्धता घटाई? त्योहारों की मांग कितनी जिम्मेदार है और क्या जमाखोरी भी कीमत बढ़ा रही है? आइए, आंकड़ों के जरिए समझते हैं पूरी कहानी।
सवाल 1: जब गन्ने का उत्पादन बढ़ा है तो चीनी महंगी क्यों हो रही है?
जवाब: यही इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात है। देश में उत्पादन पिछले साल से ज्यादा है, लेकिन शुरुआती अनुमान के मुकाबले उत्पादन काफी कम रहने वाला है। केन्द्र सरकार के मुताबिक 2025-26 चीनी सीजन में उत्पादन करीब 306 लाख टन (LMT) रहने का अनुमान है। जबकि गन्ना उत्पादक राज्यों ने शुरुआत में करीब 343 LMT उत्पादन का अनुमान लगाया था। यानी शुरुआती अनुमान से लगभग 37 LMT कम उत्पादन होने की आशंका है। इसके बावजूद उत्पादन पिछले सीजन के करीब 261 LMT से ज्यादा है। यानी देश में चीनी की पूर्ण कमी नहीं है। समस्या यह है कि बाजार में उपलब्धता को लेकर धारणा कमजोर हुई है और इसी के बीच कीमतों पर दबाव बढ़ गया।
सवाल 2: गन्ना ज्यादा होने के बावजूद चीनी का उत्पादन कम क्यों हुआ?
केन्द्र सरकार के अनुसार महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों तथा ज्यादा बारिश से हुए जलभराव ने उत्पादन को प्रभावित किया। फसल को नुकसान होने पर चीनी की रिकवरी और कुल उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं। गन्ने का क्षेत्रफल या कुल उत्पादन बढ़ जाने के बावजूद अगर गन्ने की गुणवत्ता प्रभावित होती है, तो उससे चीनी की रिकवरी कम हो सकती है। यानी ज्यादा गन्ने से अपेक्षित मात्रा में चीनी नहीं निकलती। यही वजह है कि गन्ने की उपलब्धता अच्छी होने के बावजूद चीनी उत्पादन का शुरुआती अनुमान घट गया।
सवाल 3: क्या इथेनॉल की वजह से चीनी महंगी हुई?
जवाब: सरकार कहती है- नहीं। चीनी की कीमत बढ़ते ही सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हुई कि गन्ने से चीनी बनाने के बजाय उसे इथेनॉल में इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन केंद्रीय उपभोक्ता मामले मंत्रालय ने इसे कीमत बढ़ने का कारण मानने से इनकार किया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इथेनॉल के लिए डायवर्ट होने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 में करीब 12% थी, जो 2025-26 में घटकर करीब 9% रह गई। साथ ही देश में बनने वाले इथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्का, से आता है। इसलिए मौजूदा कीमत बढ़ोतरी को केवल इथेनॉल के खाते में डालना आंकड़ों से साबित नहीं होता।
सवाल 4: फिर इथेनॉल की भूमिका क्या है?
इथेनॉल का मतलब यह नहीं है कि उसका चीनी उद्योग पर कोई असर ही नहीं है। सरकार के अनुसार सामान्य वर्षों में भारत में करीब 320-340 LMT चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत करीब 280-290 LMT रहती है। अच्छे उत्पादन वाले वर्षों में अतिरिक्त चीनी का स्टॉक मिलों के पास फंस सकता है। ऐसे में अतिरिक्त गन्ने/चीनी को इथेनॉल की ओर मोड़ने से मिलों की वित्तीय स्थिति सुधरती है और किसानों का भुगतान भी आसान होता है। 20 अगस्त 2026 तक 2025-26 सीजन के किसानों के गन्ना बकाये का करीब 97% भुगतान हो चुका था। यानी इथेनॉल नीति का असर लंबे समय में चीनी की उपलब्धता और मिलों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है, लेकिन मौजूदा तेजी का अकेला कारण इथेनॉल नहीं है।
सवाल 5: त्योहारों का चीनी की कीमत पर कितना असर?
काफी महत्वपूर्ण असर है। अगस्त से नवंबर के बीच देश में गणेश चतुर्थी, नवरात्रि, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहार आते हैं। इस दौरान मिठाइयों, बेकरी उत्पादों, पेय पदार्थों और घरेलू खपत में चीनी की मांग बढ़ना स्वाभाविक है। यानी जब बाजार में उपलब्धता को लेकर पहले से चिंता हो और उसी समय मांग बढ़ने लगे, तो कीमत पर दबाव बढ़ सकता है। सरकार ने भी मौजूदा कीमत वृद्धि के कारणों में त्योहारी मांग में बढ़ोतरी को शामिल किया है।
सवाल 6: क्या एक्सपोर्ट भी कीमत बढ़ने की वजह है?
एक्सपोर्ट का असर बाजार की उपलब्धता पर पड़ सकता है, लेकिन मौजूदा तेजी को सिर्फ एक्सपोर्ट से जोड़ना सही नहीं होगा। भारत ने 2025-26 सीजन में चीनी एक्सपोर्ट की अनुमति दी है। हालांकि घरेलू बाजार की जरूरत को देखते हुए सरकार लगातार उपलब्धता और स्टॉक की निगरानी कर रही है। इस समय बड़ी चिंता घरेलू उत्पादन के शुरुआती अनुमान से कम रहने और वैश्विक बाजार में भी सप्लाई टाइट होने की है। सरकार के मुताबिक 2026-27 में वैश्विक चीनी बाजार में करीब 33 LMT का घाटा अनुमानित है। अंतरराष्ट्रीय कीमत भी 30 जून के $474 प्रति टन से बढ़कर 20 अगस्त को $552 प्रति टन हो गई, यानी करीब 16% की बढ़ोतरी।
सवाल 7: क्या जमाखोरी भी चीनी महंगी कर रही है?
सरकार और उद्योग संगठन दोनों ने इस संभावना की ओर इशारा किया है। सरकार ने कीमत बढ़ने के कारणों में कुछ हिस्सों द्वारा स्पेकुलेशन और होर्डिंग यानी जमाखोरी को भी शामिल किया है। वहीं इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) ने भी कहा है कि बाजार में वास्तविक चीनी की कमी नहीं है और मौजूदा तेजी में स्टॉकिंग और सट्टेबाजी की भूमिका है। इसका मतलब यह है कि उत्पादन और उपलब्ध स्टॉक पर्याप्त होने के बावजूद अगर व्यापारी या थोक खरीदार भविष्य में और महंगा होने की उम्मीद में ज्यादा माल रोकते हैं, तो बाजार में तत्काल उपलब्धता घट सकती है और कीमत बढ़ सकती है।
सवाल 8: अगर चीनी की कमी नहीं है तो सरकार ने इम्पोर्ट क्यों खोला?
यही सरकार के कदम का सबसे बड़ा संकेत है। बढ़ती कीमतों और त्योहारी मांग को देखते हुए केंद्र ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी (Raw Sugar) के ड्यूटी-फ्री इम्पोर्ट की अनुमति दी है। यह सुविधा 31 अक्टूबर 2026 तक लागू रहेगी। आमतौर पर भारत चीनी आयात पर भारी शुल्क लगाता है। ऐसे में ड्यूटी हटाकर आयात की अनुमति देने का मकसद घरेलू बाजार में अतिरिक्त सप्लाई लाना और कीमतों पर दबाव कम करना है।
सवाल 9: क्या इम्पोर्ट से तुरंत चीनी सस्ती हो जाएगी?
जरूरी नहीं कि अगले ही दिन खुदरा कीमत गिर जाए। इम्पोर्ट की गई चीनी को भारत पहुंचने, रिफाइन होने और बाजार में आने में समय लगेगा। सरकार ने इसलिए ऐसे आयातकों को प्राथमिकता देने की व्यवस्था की है जो अक्टूबर के मध्य तक चीनी देश में ला सकें। हालांकि आयात की घोषणा का मनोवैज्ञानिक असर भी होता है। बाजार में यह संदेश जाता है कि अगर घरेलू सप्लाई पर दबाव बढ़ा तो सरकार बाहर से चीनी मंगाकर उपलब्धता बढ़ा सकती है।
सवाल 10: क्या देश में सचमुच चीनी खत्म होने का खतरा है?
फिलहाल ऐसा नहीं है। सरकार और ISMA दोनों का कहना है कि देश में घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। इस सीजन में उत्पादन करीब 306 LMT रहने का अनुमान है, जबकि घरेलू खपत इससे थोड़ी कम या आसपास रहने की उम्मीद है। इसलिए मौजूदा स्थिति को तत्काल ‘चीनी संकट’ कहना सही नहीं होगा। असली समस्या कम अनुमानित उत्पादन, त्योहारी मांग, वैश्विक कीमतों में तेजी और बाजार में स्टॉकिंग/सट्टेबाजी के एक साथ आने की है।
तो आखिर चीनी महंगी होने की पूरी वजह क्या है?
पूरी तस्वीर को एक लाइन में समझें तो चीनी की कीमत सिर्फ इसलिए नहीं बढ़ी कि देश में चीनी कम हो गई है। इसके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। कम अनुमानित उत्पादन, मौसम और फसल की बीमारी, त्योहारी मांग , वैश्विक बाजार में तेजी और स्टॉकिंग/सट्टेबाजी = चीनी की कीमत में उछाल। इथेनॉल को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा जरूर हो रही है, लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इथेनॉल के लिए डायवर्जन की हिस्सेदारी पिछले वर्षों की तुलना में घटी है। इसलिए मौजूदा तेजी का मुख्य कारण इसे बताना सही नहीं होगा।
अब सरकार की नजर दो चीजों पर है, बाजार में पर्याप्त स्टॉक बना रहे और जमाखोरी पर नियंत्रण रहे। 10 लाख टन ड्यूटी-फ्री आयात का फैसला इसी कोशिश का हिस्सा है। अगर आयातित चीनी समय पर बाजार में आती है और त्योहारी सीजन की मांग के बीच सप्लाई बनी रहती है, तो आने वाले समय में कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
ये भी पढ़े… चीनी की कीमतों के बीच सरकार ने बदला इम्पोर्ट नियम, जानें नया नियम







