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तुष्टिकरण नहीं, समान अधिकारों का संतुष्टिकरण है UCC, उत्तर प्रदेश में इसे लागू करना क्यों जरूरी?

समान नागरिक संहिता से यूपी को क्या होंगे फायदे?
समान नागरिक संहिता से यूपी को क्या होंगे फायदे?

Uniform Civil Code: उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है। यहां की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत हजारों साल पुरानी है। इसके अलावा, देश की सबसे बड़ी विधानसभा भी उत्तर प्रदेश में है। ऐसे में राज्य में होने वाला कोई भी बड़ा कानूनी बदलाव सिर्फ प्रदेश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर पूरे देश की चर्चा और नीतियों पर भी पड़ता है। यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) यानी समान नागरिक संहिता का मुद्दा भी इसी वजह से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।विवाह, तलाक, संपत्ति, उत्तराधिकार, गोद लेने और परिवार से जुड़े मामलों में अलग-अलग धार्मिक कानून लागू हैं। यूसीसी का उद्देश्य इन मामलों में सभी नागरिकों के लिए समान नियम बनाना है। इसके समर्थकों का मानना है कि इससे लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा और संवैधानिक मूल्यों को मजबूती मिलेगी।उत्तर प्रदेश में यूसीसी की जरूरत इसलिए भी महसूस की जा रही है, क्योंकि किसी नागरिक को उसके धर्म के आधार पर अलग-अलग अधिकार मिलने के बजाय सभी को समान कानूनी अधिकार मिलने चाहिए। इससे संविधान में दिए गए समानता के सिद्धांत को जमीन पर लागू करने में मदद मिल सकती है।

Uniform Civil Code: उत्तर प्रदेश के लिए यूसीसी क्यों महत्वपूर्ण है?

समान नागरिक संहिता का मुख्य विचार यह है कि देश के सभी नागरिकों के लिए कुछ महत्वपूर्ण पारिवारिक और नागरिक मामलों में एक जैसे कानून होने चाहिए। कानून की समानता केवल प्रशासन को आसान बनाने का तरीका नहीं है, बल्कि यह नागरिकों के सम्मान और न्याय से भी जुड़ी है।उत्तराखंड ने जनवरी 2025 में समान नागरिक संहिता लागू करके इस दिशा में पहला कदम उठाया था। इसके बाद गुजरात, असम और मध्य प्रदेश ने 2026 में इससे जुड़े विधेयक पारित किए। अब उत्तर प्रदेश में भी यूसीसी को लेकर चर्चा तेज हो रही है।उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के लिए यह मुद्दा काफी अहम है। सवाल यह है कि जब प्रदेश ने कानून-व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं, तो क्या उसे सामाजिक न्याय की दिशा में भी आगे नहीं बढ़ना चाहिए? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने कानून-व्यवस्था को अपने प्रमुख एजेंडे में रखा है। ऐसे में यूसीसी को लेकर भी पहल करने की जरूरत बताई जा रही है।

‘यह तुष्टिकरण नहीं, बल्कि सभी को समान अधिकार देने की बात है’

यूसीसी का उद्देश्य किसी खास धर्म के खिलाफ कानून बनाना नहीं, बल्कि सभी नागरिकों को बराबर अधिकार और सुरक्षा देना है। इसके समर्थकों के अनुसार, इसका सबसे बड़ा फायदा महिलाओं को मिल सकता है।केंद्र सरकार ने तीन तलाक जैसी प्रथा को खत्म करके मुस्लिम महिलाओं को एक बड़ी कानूनी राहत दी थी। पहले इस प्रथा के तहत पति के एक बार में तीन तलाक कहने से महिला का वैवाहिक जीवन प्रभावित हो सकता था। अब यूसीसी के जरिए महिलाओं को परिवार और विवाह से जुड़े दूसरे मामलों में भी समान अधिकार देने की बात कही जा रही है।प्रस्तावित यूसीसी में बहुविवाह, निकाह, हलाला और बिना कानूनी प्रक्रिया के एकतरफा तलाक पर रोक लगाने का प्रावधान बताया गया है। इसके अलावा, पैतृक संपत्ति में बेटियों को बेटों के बराबर हिस्सा देने की बात भी शामिल है।इसमें ‘अवैध संतान’ जैसे शब्दों को कानून से हटाकर सभी बच्चों को समान उत्तराधिकार का अधिकार देने का प्रावधान भी बताया गया है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि किसी बच्चे के साथ उसके जन्म या पारिवारिक स्थिति के आधार पर भेदभाव न हो।इस तरह यूसीसी के समर्थक इसे किसी एक समुदाय के खिलाफ कदम मानने के बजाय सभी धर्मों की महिलाओं और बच्चों को समान अधिकार देने की पहल बताते हैं। उनका कहना है कि यह तुष्टिकरण नहीं, बल्कि हर नागरिक को बराबर सम्मान और सुरक्षा देने का प्रयास है।

Uniform Civil Code: यूपी में समान नागरिक संहिता क्यों है जरूरी?
यूपी में समान नागरिक संहिता क्यों है जरूरी?
Uniform Civil Code: यूसीसी से कानून-व्यवस्था को कैसे मजबूती मिलेगी?

यूसीसी का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष कानून का समान रूप से पालन कराना है। योगी सरकार की कार्यशैली में कानून-व्यवस्था को विशेष महत्व दिया गया है। इसका उद्देश्य ऐसा माहौल बनाना है, जहां कानून सभी नागरिकों पर एक समान लागू हो।वर्तमान में विवाह, तलाक और संपत्ति से जुड़े मामलों में अलग-अलग धार्मिक नियम लागू होते हैं। यूसीसी के समर्थकों का मानना है कि इन अलग-अलग व्यवस्थाओं के कारण कई बार कानूनी प्रक्रियाओं में गड़बड़ी, धोखाधड़ी और शोषण की संभावना बनी रहती है।प्रस्तावित संहिता में हर शादी और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य करने की बात कही गई है। इससे विवाह और तलाक से जुड़े रिकॉर्ड व्यवस्थित रहेंगे और फर्जीवाड़े की गुंजाइश कम हो सकती है।इसके अलावा, लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए एक महीने के भीतर पंजीकरण कराना भी जरूरी बताया गया है। पहचान छिपाकर शादी करने, दबाव या धोखे से संबंध बनाने और नाबालिगों के विवाह को रोकने के लिए भी इसमें प्रावधान शामिल किए गए हैं।इन नियमों का उद्देश्य खासतौर पर युवाओं और महिलाओं को धोखाधड़ी, दबाव और शोषण से बचाने के लिए कानूनी सुरक्षा देना बताया जा रहा है।

यूसीसी का उद्देश्य किसी की संस्कृति खत्म करना नहीं

समान नागरिक संहिता को लेकर एक बड़ी चिंता यह भी जताई जाती है कि इससे अलग-अलग समुदायों की परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान पर असर पड़ सकता है। हालांकि, इसके समर्थकों का कहना है कि यूसीसी का मकसद किसी की संस्कृति को खत्म करना नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों में समानता लाना है।इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रस्तावित व्यवस्था में संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत आने वाली सभी अनुसूचित जनजातियों और उनके पारंपरिक अधिकारों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखने की बात कही गई है।इसका मतलब है कि जनजातीय समुदायों की परंपराओं और उनके विशेष अधिकारों को संवैधानिक सुरक्षा दी जाएगी। यूसीसी के पक्ष में दिए जाने वाले तर्कों के अनुसार, यह प्रावधान दिखाता है कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य सांस्कृतिक पहचान को मिटाना नहीं, बल्कि नागरिकों को समान कानूनी अधिकार देना है।

Uniform Civil Code: उत्तर प्रदेश के पास देश के सामने उदाहरण पेश करने का मौका

उत्तर प्रदेश के लिए यूसीसी का चौथा बड़ा पहलू यह है कि वह इसे बड़े स्तर पर लागू करके देश के सामने एक उदाहरण पेश कर सकता है।उत्तराखंड की आबादी लगभग सवा करोड़ है, जबकि उत्तर प्रदेश की आबादी करीब 24 करोड़ है। ऐसे में अगर उत्तर प्रदेश में यूसीसी लागू किया जाता है, तो इसका प्रभाव और अनुभव काफी बड़े स्तर पर देखने को मिलेगा।इसलिए इसे केवल एक राज्य का कानून नहीं, बल्कि देश के लिए एक बड़े मॉडल के रूप में देखा जा सकता है। आने वाले समय में दूसरे राज्य भी इसके अनुभवों से सीख सकते हैं अगर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में यूसीसी लागू होता है, तो इससे यह संदेश जाएगा कि राज्य केवल आबादी के मामले में ही नहीं, बल्कि न्याय और सुशासन के क्षेत्र में भी देश का नेतृत्व करना चाहता है।

संपत्ति और उत्तराधिकार में समान अधिकार क्यों जरूरी?

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में संपत्ति को लेकर विवाद अक्सर परिवारों के बीच तनाव और झगड़े की वजह बनते हैं। कई मामलों में जमीन और पैतृक संपत्ति के बंटवारे को लेकर परिवारों में लंबे समय तक विवाद चलता रहता है।यूसीसी के समर्थकों का मानना है कि जब संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े नियम धर्म के आधार पर अलग-अलग होते हैं, तो इससे अधिकारों में असमानता पैदा हो सकती है।अगर सभी नागरिकों के लिए समान नियम बनाए जाते हैं, तो हर व्यक्ति को बराबर कानूनी अधिकार मिल सकते हैं। इससे संपत्ति के बंटवारे से जुड़े विवादों को कम करने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।इसका एक उद्देश्य बेटियों को भी पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार दिलाना है। समर्थकों के अनुसार, किसी एक समुदाय को विशेष छूट देने के बजाय सभी को समान अधिकार देना समाज में एकता और समानता को बढ़ावा दे सकता है।

Uniform Civil Code: यूसीसी का कांग्रेस, सपा और एआईएमआईएम क्यों कर रहे हैं विरोध?

समान नागरिक संहिता को लेकर राजनीतिक दलों के बीच भी मतभेद देखने को मिलते हैं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और एआईएमआईएम जैसे दल इसका विरोध करते रहे हैं।इन दलों की ओर से संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का हवाला दिया जाता है। इन अनुच्छेदों में नागरिकों को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन से जुड़े अधिकार दिए गए हैं।हालांकि, यूसीसी के समर्थकों का तर्क है कि धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब अपनी पूजा-पद्धति और धार्मिक मान्यताओं को मानने की आजादी है। इसका अर्थ महिलाओं के साथ भेदभाव या उनके शोषण को जारी रखने की छूट देना नहीं है।इस नजरिए से देखें तो यूसीसी को उत्तर प्रदेश के लिए केवल एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, महिला सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को मजबूत करने के अवसर के रूप में पेश किया जा रहा है।

समान नागरिक संहिता से देश को मिल सकता है नया संदेश

अगर यूसीसी को सही सोच, संवेदनशीलता और सभी समुदायों के साथ बातचीत करके लागू किया जाता है, तो उत्तर प्रदेश देश के सामने एक नई मिसाल पेश कर सकता है। इससे राज्य के करीब 24 करोड़ लोगों को समान नागरिक अधिकार देने की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है।डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान को केवल देश चलाने का दस्तावेज नहीं माना था, बल्कि उसे समाज में बदलाव लाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी बताया था। इसी सोच के साथ समान नागरिक संहिता पर चर्चा करने की जरूरत है।इसका मूल विचार यह है कि हर व्यक्ति की धार्मिक पहचान और आस्था अलग हो सकती है, लेकिन नागरिक अधिकारों के मामले में सभी को समान अवसर, सम्मान और न्याय मिलना चाहिए।