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भारतीयों को बाहर निकालो, कंपनियों पर बैन और H-1B पर शिकंजा! अमेरिका में भारत के खिलाफ क्यों बढ़ रहा गुस्सा?

US-India Tensions: अमेरिका में भारतीयों और भारत से जुड़े कारोबार को लेकर हाल के घटनाक्रमों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। नस्लीय टिप्पणी वाले पोस्ट से लेकर भारतीय कंपनियों पर प्रतिबंध की मांग और H-1B वीजा नियमों में संभावित सख्ती तक, अलग-अलग घटनाओं का असर भारतीयों पर पड़ता दिखाई दे रहा है। ऐसे में सवाल है कि क्या अमेरिका में भारत के खिलाफ माहौल बदल रहा है, या इसके पीछे घरेलू राजनीति, इमिग्रेशन और आर्थिक हितों की बड़ी भूमिका है?

अमेरिका और भारत के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक तौर पर मजबूत हुए हैं, लेकिन हाल के कुछ घटनाक्रमों ने इस रिश्ते के दूसरे पहलू पर बहस छेड़ दी है। एक तरफ अमेरिका में भारतीय मूल के लोग टेक्नोलॉजी, कारोबार और राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, तो दूसरी तरफ इमिग्रेशन, H-1B वीजा, व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भारत और भारतीयों को लेकर सख्त रुख भी देखने को मिल रहा है। यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है- क्या यह सिर्फ अलग-अलग नीतिगत फैसले हैं या इनके पीछे अमेरिका में भारत को लेकर बदलती राजनीतिक सोच भी काम कर रही है?

पहले समझिए, मामला क्या है?

हाल में अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग की ओर से सोशल मीडिया पर ऐसा कंटेंट सामने आया, जिसमें ‘Mr Singh’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। पोस्ट को लेकर अमेरिका में नस्लीय भेदभाव के आरोप लगे और कई संगठनों ने इसकी आलोचना की। विवाद बढ़ने के बाद संबंधित पोस्ट हटा दिए गए।

आलोचकों ने इसे भारतीय और दक्षिण एशियाई समुदाय को निशाना बनाने वाला संदेश बताया। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन की ओर से इसका संदर्भ अवैध प्रवास और अपराधों के आरोपों से जुड़े मामलों से जोड़ा गया था। यहीं से विवाद का सवाल बड़ा हो गया- क्या अपराध या इमिग्रेशन पर कार्रवाई का संदेश किसी खास नस्ल या समुदाय की पहचान से जोड़ना उचित है?

US-India Tensions: भारतीय कंपनियों पर क्यों उठे सवाल?

इसके बाद तीन अमेरिकी सांसदों की ओर से अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हावर्ड लुटनिक को पत्र लिखकर तीन भारतीय कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने की मांग किए जाने की खबर सामने आई। सांसदों ने आरोप लगाया कि भारत में सक्रिय कुछ साइबर समूह लंबे समय से अमेरिकी नागरिकों, कारोबारियों और उनके वकीलों को निशाना बनाकर जासूसी गतिविधियों में शामिल रहे हैं। इसी आधार पर संबंधित भारतीय कंपनियों की जांच और कार्रवाई की मांग की गई है।

पहले भी भारतीय कंपनियों पर कार्रवाई कर चुका है अमेरिका

अमेरिका इससे पहले भी कुछ भारतीय कंपनियों और व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगा चुका है। ऐसी कार्रवाइयों के पीछे ईरान के साथ कथित कारोबार और अमेरिकी प्रतिबंधों के उल्लंघन जैसे आरोप बताए गए हैं। यानी हर अमेरिकी कार्रवाई को सीधे तौर पर “भारत विरोधी” कहना भी सही नहीं होगा। अमेरिका अपनी विदेश नीति और प्रतिबंध व्यवस्था के तहत अलग-अलग देशों और कंपनियों पर कार्रवाई करता रहा है। लेकिन जब ऐसी कार्रवाइयों का असर बार-बार भारतीय कंपनियों पर दिखाई देता है, तो भारत में इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

US-India Tensions
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US-India Tensions: अब H-1B वीजा पर क्यों बढ़ी चिंता?

सबसे बड़ा असर भारतीय पेशेवरों पर H-1B वीजा से जुड़े संभावित बदलावों का पड़ सकता है। अमेरिकी कंपनियां लंबे समय से H-1B कार्यक्रम के जरिए विदेशी कुशल कर्मचारियों को नियुक्त करती हैं। भारतीय पेशेवर इस व्यवस्था के सबसे बड़े लाभार्थी समूहों में रहे हैं।नौकरी जाने के बाद H-1B कर्मचारियों को मौजूदा व्यवस्था में आम तौर पर सीमित अवधि का ग्रेस पीरियड मिलता है, जिसमें वे नई नौकरी खोज सकते हैं या अमेरिका से बाहर जाने की तैयारी कर सकते हैं। अगर इस व्यवस्था को खत्म या काफी सीमित किया जाता है, तो नौकरी गंवाने वाले विदेशी कर्मचारियों पर तत्काल दबाव बढ़ सकता है।

भारतीय IT कंपनियों पर इसका क्या असर पड़ेगा?

TCS, Infosys, HCLTech और LTIMindtree जैसी भारतीय IT कंपनियों का अमेरिकी बाजार में बड़ा कारोबार है। अमेरिका उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण बाजारों में से एक है। H-1B नियमों में सख्ती का असर सिर्फ भारतीय कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा। अमेरिकी कंपनियां भी इससे प्रभावित हो सकती हैं, क्योंकि उन्हें हाई-स्किल कर्मचारियों की भर्ती और उपलब्धता को लेकर अतिरिक्त दबाव का सामना करना पड़ सकता है। यही वजह है कि H-1B को लेकर होने वाली हर नीति चर्चा भारतीय IT सेक्टर के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन जाती है।

US-India Tensions: क्या अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ सचमुच नफरत बढ़ रही है?

इसका जवाब सीधा ‘हां’ देना जल्दबाजी होगी। अमेरिका में करीब 50 लाख से ज्यादा भारतीय मूल के लोग रहते हैं और भारतीय-अमेरिकी समुदाय राजनीति, टेक्नोलॉजी, चिकित्सा, शिक्षा और कारोबार में प्रभावशाली भूमिका निभाता है। इसलिए हाल के कुछ विवादों को पूरे अमेरिकी समाज की सोच मान लेना सही नहीं होगा। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि इमिग्रेशन को लेकर अमेरिकी राजनीति में सख्ती बढ़ी है। अवैध प्रवास, अमेरिकी नौकरियों, सीमा सुरक्षा और विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति जैसे मुद्दे घरेलू राजनीति के बड़े विषय बन चुके हैं। भारतीय पेशेवर इसी व्यापक इमिग्रेशन बहस के दायरे में आते हैं।

फिर भारत ही क्यों चर्चा में आता है?

इसका एक कारण भारत और अमेरिका के बीच बढ़ता आर्थिक संपर्क भी है। भारतीय IT कंपनियां अमेरिकी कंपनियों के साथ बड़े स्तर पर काम करती हैं। बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर अमेरिका में काम करते हैं और भारत-अमेरिका के बीच टेक्नोलॉजी, निवेश और सेवाओं का बड़ा कारोबार है। इसलिए जब अमेरिका विदेशी कर्मचारियों या आउटसोर्सिंग को लेकर सख्त नीति बनाता है, तो उसका असर भारत पर अपेक्षाकृत ज्यादा दिखाई देता है।

US-India Tensions: टैरिफ ने पहले ही बढ़ाई थी तल्खी

इन घटनाक्रमों के बीच भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में टैरिफ का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। ट्रंप प्रशासन ने भारत पर रूसी तेल खरीद को लेकर अतिरिक्त शुल्क लगाने का रुख अपनाया था। अमेरिकी अधिकारियों की ओर से भारत की रूस नीति और रूसी तेल खरीद को लेकर तीखी टिप्पणियां भी सामने आई थीं। इससे दोनों देशों के रिश्तों में व्यापार और रणनीतिक हितों को लेकर मतभेद की एक नई परत जुड़ गई।

क्या यह भारत-अमेरिका रिश्तों के लिए खतरे की घंटी है?

अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, तकनीक, इंडो-पैसिफिक, ऊर्जा, निवेश और चीन को लेकर रणनीतिक सहयोग के कई साझा हित हैं। लेकिन इसके साथ-साथ व्यापार, टैरिफ, इमिग्रेशन और भारतीय कंपनियों की अमेरिकी बाजार में भूमिका जैसे मुद्दों पर मतभेद भी मौजूद हैं। इसलिए मौजूदा स्थिति को “दुश्मनी” से ज्यादा हितों के टकराव और अमेरिकी घरेलू राजनीति के प्रभाव के रूप में देखना ज्यादा सटीक होगा।

US-India Tensions: भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल क्या है?

भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत रखते हुए अपने नागरिकों और कंपनियों के हितों की भी मजबूती से पैरवी करे। H-1B जैसे मुद्दों पर भारतीय पेशेवरों के हित, कंपनियों पर कार्रवाई में पारदर्शिता, कारोबार पर टैरिफ और नस्लीय टिप्पणियों जैसे मामलों को अलग-अलग स्तर पर उठाना होगा। कूटनीतिक रिश्ते मजबूत रह सकते हैं, लेकिन साझेदारी का मतलब यह नहीं कि हर अमेरिकी नीति को भारत बिना सवाल स्वीकार करे।

US-India Tensions: रिश्ते दोस्ती के हैं, लेकिन हित अपने-अपने

भारत और अमेरिका के संबंध आज पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। लेकिन हाल के घटनाक्रम यह भी दिखाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में स्थायी दोस्ती से ज्यादा स्थायी हित मायने रखते हैं। अमेरिका अपने रोजगार, इमिग्रेशन, सुरक्षा और आर्थिक हितों को प्राथमिकता देगा। भारत को भी अपने नागरिकों, IT कंपनियों और कारोबारी हितों की रक्षा करनी होगी।

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