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‘मर्द जाति पर क्या भरोसा’ नारे पर क्यों छिड़ी बहस? महिलाओं ने कहा- पुरुषों से नहीं, गलत मानसिकता से है लड़ाई

महिलाओं ने बताया ‘मर्द जात’ नारे का मतलब
महिलाओं ने बताया ‘मर्द जात’ नारे का मतलब

Women Safety Debate: दिल्ली में महिलाओं के एक आंदोलन से निकला नारा ‘एक कचौड़ी, दो समोसा, मर्द जात पर नहीं भरोसा’ सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। इस नारे को लेकर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ लोगों ने इसे महिलाओं के अनुभव और असुरक्षा की अभिव्यक्ति बताया, जबकि कई पुरुषों ने सवाल उठाया कि गलत काम करने वाले लोगों के बजाय पूरी पुरुष जाति को निशाना बनाना कितना उचित है। इसी मुद्दे को लेकर खबर इंडिया ने महिलाओं और पुरुषों के पक्ष से जुड़े सवालों को सामने रखा। इसमें यह समझने की कोशिश की गई कि इस नारे का मकसद क्या है, महिलाओं को पुरुषों पर भरोसा क्यों नहीं होता और क्या वास्तव में सभी पुरुषों को एक ही नजर से देखा जा रहा है।

Women Safety Debate: ‘क्या आप हर पुरुष पर भरोसा कर सकते हैं?’

एडवोकेट यक्ष ने इस मुद्दे पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर किसी पुरुष से पूछा जाए कि क्या वह अपनी बेटी या बहन को रात में किसी अनजान पुरुष कैब ड्राइवर के साथ भेजकर पूरी तरह निश्चिंत रह सकता है, तो क्या वह ऐसा कर पाएगा? उनके मुताबिक, महिलाओं की चिंता किसी एक व्यक्ति को लेकर नहीं, बल्कि इस बात को लेकर है कि सामने वाले व्यक्ति की सोच और मानसिकता के बारे में हमेशा पता नहीं होता।

वहीं पुरुष पक्ष से यह सवाल उठाया गया कि अगर पुरुषों पर भरोसा नहीं है तो क्या इसका मतलब यह है कि हर पुरुष गलत है? जवाब में कहा गया कि पुरुषों की तरह महिलाओं पर भी समान रूप से भरोसा किया जाना चाहिए और किसी भी लिंग को एक ही नजर से नहीं देखा जाना चाहिए। साथ ही यह भी कहा गया कि पुरुषों और महिलाओं दोनों के शोषण से जुड़े मामले सामने आते हैं।

महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर उठे सवाल

महिला पक्ष ने कहा कि अपराधों के आंकड़ों और सामने आने वाली घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कई मामले सामने आते हैं और समाज में कई बार इसे सामान्य घटना की तरह देखने की प्रवृत्ति बन जाती है।उन्होंने दिल्ली की निर्भया घटना और पश्चिम बंगाल के आरजी कर मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि इन घटनाओं के खिलाफ पुरुष भी बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे और महिलाओं के लिए आवाज उठाई। इसलिए जो पुरुष महिलाओं के साथ खड़े होते हैं, उन्हें इस नारे से व्यक्तिगत रूप से परेशान होने की जरूरत नहीं है।

महिला पक्ष का कहना था कि उनके पिता, भाई और पुरुष मित्र भी इस तरह के संदेशों को साझा करते हैं, क्योंकि वे खुद को महिलाओं के शोषण या पितृसत्तात्मक व्यवस्था का लाभ उठाने वाला नहीं मानते।

Women Safety Debate: ‘जो गलत नहीं हैं, उन्हें नारे से परेशानी क्यों?’

महिलाओं की ओर से यह तर्क दिया गया कि जो पुरुष अपनी पत्नी को केवल घर संभालने के लिए सीमित नहीं रखना चाहते, उसे पढ़ने और नौकरी करने की आजादी देते हैं, बहन की पढ़ाई सिर्फ इस डर से नहीं रुकवाते कि बाहर के पुरुषों पर भरोसा नहीं है और महिलाओं को अपनी बराबरी का इंसान मानते हैं, उन्हें ऐसे नारे से बुरा नहीं लगना चाहिए।उनका कहना था कि अगर कोई पुरुष पितृसत्तात्मक सोच को खुद स्वीकार नहीं करता और महिलाओं को बराबरी देता है, तो उसे इस नारे को अपने ऊपर लेने की जरूरत नहीं है।

रावण और सीता का उदाहरण देकर समझाई बात

महिला पक्ष ने अपने तर्क को समझाने के लिए रामायण का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि रावण बेहद प्रतिभाशाली और विद्वान था, लेकिन सीता को लेकर उसकी मानसिकता गलत थी। उसके इस व्यवहार का परिणाम उसके पूरे परिवार के विनाश के रूप में सामने आया।इसी तरह द्रौपदी के साथ हुए अपमान का उदाहरण देते हुए कहा गया कि महाभारत का युद्ध भी इसी घटना से जुड़े घटनाक्रम के बाद हुआ। उनका तर्क था कि केवल किसी पुरुष की अच्छी पहचान, शिक्षा, पद या प्रतिभा से उसकी मानसिकता का पता नहीं लगाया जा सकता।

उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति अच्छा दोस्त, सहकर्मी या प्रतिभाशाली छात्र हो सकता है, लेकिन उसके मन में महिलाओं के प्रति क्या सोच है, यह हमेशा सामने से पता नहीं चलता। यही वजह है कि महिलाएं अनजान पुरुषों के साथ अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क रहती हैं।

Women Safety Debate: ‘सीता के चरित्र पर सवाल क्यों?’

सीता का उदाहरण आगे बढ़ाते हुए महिला पक्ष ने कहा कि समाज में कई बार पीड़िता के चरित्र पर ही सवाल उठाए जाते हैं। उन्होंने उस प्रसंग का उल्लेख किया जिसमें एक धोबी के सवाल के बाद सीता के चरित्र को लेकर संदेह पैदा हुआ और उन्हें घर से बाहर जाना पड़ा।उनके मुताबिक, महिलाओं की लड़ाई इसी तरह के चरित्र हनन, पीड़िता को दोष देने और उसे शर्मिंदा करने वाली सोच के खिलाफ है।

वहीं दूसरी ओर यह सवाल उठाया गया कि सीता के लिए राम ने युद्ध भी किया था, इसलिए पुरुषों की भूमिका को केवल नकारात्मक तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए। इसके जवाब में महिला पक्ष ने कहा कि किसी महिला के सम्मान और सुरक्षा के लिए खड़ा होना कोई एहसान नहीं, बल्कि इंसान और परिवार के सदस्य के तौर पर जिम्मेदारी है।

‘पांच पांडव भी द्रौपदी को नहीं बचा पाए’

महिला पक्ष ने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि पांच पांडव मौजूद होने के बावजूद द्रौपदी का चीरहरण नहीं रोका जा सका। इसी तरह राम स्वयं एक बड़े राजा थे, लेकिन सीता के अपहरण को पहले से रोक नहीं पाए।इस उदाहरण के जरिए उनका कहना था कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए हर समय कोई पुरुष उनके साथ मौजूद नहीं रह सकता। इसलिए महिलाओं को खुद मजबूत और आत्मनिर्भर बनाना जरूरी है।उनके मुताबिक, परिवार के पुरुषों की भूमिका महिलाओं को केवल ‘सुरक्षा देने वाले’ के रूप में देखने की नहीं, बल्कि उन्हें इतना सक्षम बनाने की होनी चाहिए कि वे जरूरत पड़ने पर खुद अपनी लड़ाई लड़ सकें।

Women Safety Debate: ‘लड़ाई पुरुषों के खिलाफ नहीं, मानसिकता के खिलाफ है’

महिलाओं ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध हर पुरुष से नहीं है। उनका कहना था कि असली लड़ाई उस मानसिकता के खिलाफ है जिसमें महिलाओं को पुरुषों से कमतर समझा जाता है।उन्होंने पितृसत्तात्मक, स्त्री-विरोधी और लैंगिक भेदभाव वाली सोच का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसी सोच रखने वाले पुरुषों के साथ-साथ वे महिलाएं भी इस व्यवस्था को मजबूत करती हैं, जो संस्कार और संस्कृति के नाम पर दूसरी महिलाओं की आजादी रोकती हैं।उन्होंने घरों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार सास अपनी बहू को पढ़ने, काम करने या अपने सपने पूरे करने की आजादी नहीं देती। इसलिए समस्या सिर्फ पुरुषों तक सीमित नहीं है।

‘पुरुष दूसरे पुरुष को गलत व्यवहार पर रोकें’

महिला पक्ष ने कहा कि बदलाव में पुरुषों की भी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। अगर किसी पुरुष का दोस्त सोशल मीडिया पर किसी लड़की के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करता है, उसके बारे में गलत मजाक करता है या किसी महिला के सपनों को रोकने और उसका फायदा उठाने की कोशिश करता है, तो दूसरे पुरुषों को भी उसे रोकना चाहिए।उनका कहना था कि जिस दिन पुरुष अपने दोस्त, भाई या बेटे के गलत व्यवहार पर सवाल उठाना शुरू करेंगे, उस दिन महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा और भेदभाव के खिलाफ लड़ाई को ज्यादा मजबूती मिलेगी।

Women Safety Debate: ‘गलत पुरुष ही नहीं, गलत महिला भी अपराधी है’

इस चर्चा में महिलाओं पर लगाए जाने वाले झूठे आरोपों और पुरुषों के खिलाफ कथित गलत मामलों का मुद्दा भी उठाया गया।एडवोकेट यक्ष ने कहा कि कानून की नजर में अपराधी का कोई जाति, धर्म या लिंग नहीं होता। अगर किसी महिला ने किसी पुरुष की हत्या की है तो वह भी अपराधी है और उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। इसी तरह अगर कोई पुरुष बलात्कार को सही या अपना अधिकार मानता है, तो उसके व्यवहार को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि अपराध को सही ठहराने के लिए यह नहीं देखा जा सकता कि आरोपी पुरुष है या महिला, किस जाति या धर्म से आता है या किस विचारधारा को मानता है। गलत काम करने वाला व्यक्ति अपराधी है और उसे उसके लिंग के आधार पर बचाया नहीं जाना चाहिए।

‘झूठे मामलों से पुरुषों को भी सुरक्षा मिले’

पुरुष पक्ष की ओर से सवाल किया गया कि अगर किसी पुरुष को गलत तरीके से किसी मामले में फंसा दिया जाए तो क्या महिलाएं उसके साथ खड़ी होंगी?इस पर एडवोकेट ने कहा कि अगर उनके सामने ऐसा मामला आता है तो वह कानून के मुताबिक पुरुष का भी पक्ष रखेंगी। उन्होंने कहा कि अगर उनके भाई पर झूठा मामला लगाया गया और उन्हें पता है कि वह निर्दोष है, तो वह चाहेंगी कि उसे भी न्याय मिले।

साथ ही उन्होंने कहा कि महिलाओं द्वारा झूठे मामले दर्ज कराने की घटनाओं को लेकर जितना शोर होता है, उसके पीछे कई बार पुरुष-केंद्रित सामाजिक नजरिया भी काम करता है। उनके मुताबिक, कई महिला उत्पीड़न के मामले तब तक सामने नहीं आते जब तक वे सोशल मीडिया पर वायरल न हों।

Women Safety Debate: जमुई और आस्था कुंज पार्क जैसी घटनाओं का जिक्र

महिला पक्ष ने जमुई और आस्था कुंज पार्क से जुड़े मामलों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई घटनाएं सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद ही व्यापक चर्चा का हिस्सा बनती हैं।उन्होंने बिहार का उदाहरण देते हुए कहा कि एक तरफ महिलाओं के खिलाफ घटनाओं पर सवाल उठते हैं, वहीं दूसरी तरफ सार्वजनिक आयोजनों में महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार और अश्लील इशारों से जुड़े वीडियो भी सामने आते हैं।

उन्होंने कांवड़ यात्रा से जुड़े कुछ वायरल वीडियो का उल्लेख करते हुए दावा किया कि इनमें कम उम्र के लड़कों से लेकर पुलिसकर्मियों तक पर महिलाओं के प्रति गलत व्यवहार से जुड़े सवाल उठे हैं। उत्तर प्रदेश का जिक्र करते हुए उन्होंने वहां के कुछ सार्वजनिक बयानों और महिलाओं के खिलाफ सामने आए मामलों का भी उल्लेख किया।महिला पक्ष का कहना था कि केवल एनकाउंटर या तत्काल कार्रवाई से समस्या की जड़ खत्म नहीं होती। असली जरूरत उस मानसिकता में बदलाव लाने की है, जिसके कारण महिलाओं के खिलाफ अपराध होते हैं।

‘पितृसत्ता पुरुषों को भी प्रभावित करती है’

महिलाओं ने यह भी कहा कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था केवल महिलाओं को ही प्रभावित नहीं करती। उन्होंने खाप पंचायतों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार पुरुषों के फैसलों पर भी परिवार और समाज का नियंत्रण रहता है।उनके मुताबिक, कुछ जगहों पर पुरुषों को अपनी पसंद से शादी करने, प्रेम करने, पढ़ाई करने या अपनी पसंद का काम चुनने की आजादी नहीं होती। ऐसे मामलों में सामाजिक दबाव और तथाकथित सम्मान के नाम पर पुरुषों के खिलाफ भी हिंसा होती है।इसलिए उनके अनुसार पितृसत्ता एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सत्ता और नियंत्रण कुछ सामाजिक नियमों के जरिए तय किए जाते हैं और इसका असर महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों पर भी पड़ सकता है।

Women Safety Debate: महिलाओं के लिए कानून है तो पुरुषों के लिए भी होना चाहिए?

पुरुष पक्ष की ओर से सवाल उठाया गया कि जिस तरह महिलाओं की सुरक्षा के लिए महिला आयोग और विशेष कानून हैं, क्या पुरुषों के लिए भी ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए?इस पर महिला पक्ष ने कहा कि अगर पुरुषों के लिए भी किसी विशेष कानूनी सुरक्षा की जरूरत है तो उन्हें इससे आपत्ति नहीं है। उनका कहना था कि कानून का उद्देश्य किसी एक लिंग को निशाना बनाना नहीं, बल्कि गलत के खिलाफ न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए।

महिला आरक्षण पर भी हुई चर्चा

चर्चा में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण का मुद्दा भी सामने आया। महिला पक्ष ने कहा कि आज महिलाएं शिक्षा हासिल कर रही हैं, घर से बाहर निकल रही हैं और अपने राजनीतिक फैसले खुद लेने लगी हैं। इसी वजह से राजनीतिक दलों को महिला मतदाताओं की भूमिका को गंभीरता से देखना पड़ रहा है।महिला आरक्षण को लेकर उन्होंने कहा कि महिलाओं को मिलने वाला अधिकार केवल किसी पुरुष की ओर से दिया गया उपहार नहीं है, बल्कि महिलाओं ने लंबे संघर्ष के बाद इसे हासिल किया है।

इस पर पुरुष पक्ष ने सवाल उठाया कि अगर संसद में महिला आरक्षण से जुड़ा कानून पारित होता है तो उसमें पुरुष सांसदों की भी भूमिका होती है, क्योंकि संसद में पुरुषों की संख्या अभी भी अधिक है। महिला पक्ष ने जवाब दिया कि महिलाओं की आबादी देश की कुल आबादी का लगभग आधा हिस्सा है, जबकि संसद में उनका प्रतिनिधित्व इससे काफी कम रहा है।

Women Safety Debate: ‘महिलाएं पुरुषों का सहयोग नकार नहीं रहीं’

महिलाओं ने कहा कि वे इस बात से इनकार नहीं करतीं कि पुरुषों ने महिलाओं का साथ दिया है। उन्होंने अपने पिता, भाइयों और पुरुष मित्रों का जिक्र करते हुए कहा कि वे उनसे प्यार और सम्मान करती हैं।एक महिला ने बताया कि दिल्ली आने और आगे पढ़ने का फैसला करने में उनके पिता के साथ-साथ उनकी मां का भी बड़ा योगदान रहा। उनकी मां खुद ज्यादा पढ़ाई नहीं कर पाईं, इसलिए वह चाहती थीं कि उनकी बेटी पढ़े और जीवन में आगे बढ़े।महिला पक्ष का कहना था कि उन्हें पुरुषों से लगाव और सम्मान है, लेकिन महिलाओं को नियंत्रित करने वाली मानसिकता से कोई सहमति नहीं है। यही उनके आंदोलन का मूल संदेश है।

‘हर पुरुष को रक्षक मानना जरूरी नहीं’

महिलाओं ने यह भी कहा कि उन्हें हमेशा किसी पुरुष के संरक्षण की जरूरत नहीं है। एक महिला ने कहा कि अगर रात में कोई महिला परेशान होती है तो यह जरूरी नहीं कि उसका भाई हर जगह मौजूद हो और उसकी रक्षा करे।उनके अनुसार, परिवार को बेटियों को इस तरह मजबूत और आत्मनिर्भर बनाना चाहिए कि वे अपनी सुरक्षा और अधिकारों के लिए खुद आवाज उठा सकें।उन्होंने यह भी कहा कि आज महिलाएं अपने अधिकारों के लिए खुद सड़कों पर उतर रही हैं। उन्हें यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि कोई दूसरा व्यक्ति हमेशा उनके लिए लड़ाई लड़ेगा।

Women Safety Debate: ‘नारे का मतलब समझने की जरूरत’

महिला पक्ष ने कहा कि ‘मर्द जात पर नहीं भरोसा’ जैसे नारे को उसके संदर्भ में समझना चाहिए। उनके मुताबिक, यह नारा उन अनुभवों और डर की अभिव्यक्ति है जिनका सामना महिलाएं लंबे समय से करती आई हैं।उन्होंने कहा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा केवल शारीरिक नहीं होती, बल्कि मौखिक और भावनात्मक हिंसा भी होती है। उनके अनुसार, समाज में पुरुषों को मिलने वाले विशेषाधिकारों को समझना और पितृसत्ता की संरचना को पहचानना जरूरी है।उन्होंने फेमिनिज्म को लेकर बनी धारणाओं पर भी सवाल उठाया और कहा कि नारीवाद का मतलब केवल महिलाओं की आजादी की बात करना नहीं है। समाज में मौजूद लैंगिक असमानता और सत्ता के असंतुलन को समझना भी इसका हिस्सा है।

सोशल मीडिया पर मिलीं गालियों और धमकियों का भी जिक्र

महिला पक्ष ने बताया कि उनके वीडियो के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियों और धमकियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि कमेंट सेक्शन में अभद्र भाषा के साथ बलात्कार की धमकियां तक दी गईं।उनका कहना था कि उन्हें अपनी बात रखने की आजादी मिली हुई है, लेकिन देश में बहुत सी महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें अपने विचार रखने या अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की इतनी स्वतंत्रता नहीं मिलती।इसी वजह से उन्होंने कहा कि जो पुरुष इस तरह के नारे से नाराज होते हैं, उन्हें पहले यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि महिलाओं के लिए ऐसे शब्दों के पीछे कौन से अनुभव और परिस्थितियां हैं।

Women Safety Debate: ‘पुरुषों की भागीदारी भी जरूरी’

अंत में दोनों पक्षों की बात में यह बात सामने आई कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा और भेदभाव को खत्म करने के लिए समाज के दोनों वर्गों की भूमिका जरूरी है।महिला पक्ष ने कहा कि उन्हें हर पुरुष से लड़ाई नहीं करनी है। उनका विरोध उन लोगों और उस सोच से है जो महिलाओं को कमतर समझती है, उन्हें नियंत्रित करती है या उनके खिलाफ हिंसा को सही ठहराती है।वहीं पुरुष पक्ष ने कहा कि जो पुरुष महिलाओं के अधिकारों के समर्थन में खड़े होते हैं, उन्हें पूरी पुरुष जाति के साथ गलत व्यवहार करने वाले लोगों की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए।

इस पूरी बहस का एक अहम बिंदु यह रहा कि महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की जिम्मेदारी केवल महिलाओं या केवल पुरुषों की नहीं हो सकती। समाज में मौजूद गलत मानसिकता, भेदभाव और हिंसा के खिलाफ पुरुषों और महिलाओं दोनों को अपनी भूमिका निभानी होगी। साथ ही, किसी भी अपराध में आरोपी का लिंग देखकर उसे सही या गलत ठहराने के बजाय कानून और तथ्यों के आधार पर फैसला होना चाहिए।