Home » एक्सप्लनेर » 41 साल सेना में रहे, जंग में बेटा खोया… अब नेतन्याहू को टक्कर दे रहे गादी आइजेनकोट कौन हैं?

41 साल सेना में रहे, जंग में बेटा खोया… अब नेतन्याहू को टक्कर दे रहे गादी आइजेनकोट कौन हैं?

Israel News Explainer: इजराइल की राजनीति में बेंजामिन नेतन्याहू के सामने गादी आइजेनकोट एक प्रमुख चुनौती के रूप में उभरे हैं। करीब चार दशक तक सेना में सेवा देने वाले आइजेनकोट ने गाजा युद्ध में अपना बेटा और दो भतीजे खो दिए। जून 2024 में नेतन्याहू की वॉर कैबिनेट से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने सरकार की युद्ध नीति और सुरक्षा संबंधी फैसलों पर सवाल उठाए। सितंबर 2025 में अपनी पार्टी ‘याशर’ बनाने वाले आइजेनकोट अब प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नेतन्याहू को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। आखिर कौन हैं गादी आइजेनकोट, उनकी राजनीतिक विचारधारा क्या है और क्या वह नेतन्याहू की सत्ता को चुनौती दे सकते हैं? समझिए पूरी कहानी।

कौन हैं गादी आइजेनकोट, कैसे शुरू हुआ सेना का सफर?

गादी आइजेनकोट का जन्म 19 मई 1960 को इजराइल के टिबेरियस शहर में हुआ था। उनके माता-पिता मोरक्को से इजराइल आए थे। वह मिजराही यहूदी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। बचपन में उनका परिवार लाल सागर के किनारे बसे इलात शहर में रहने लगा। 1978 में आइजेनकोट ने इजराइली सेना जॉइन की। उन्होंने गोलानी ब्रिगेड से अपने सैन्य करियर की शुरुआत की और धीरे-धीरे कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। सैन्य अभियानों और कमान के विभिन्न पदों पर काम करते हुए वह इजराइल की सेना के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचे।

फरवरी 2015 में उन्हें इजराइली सेना का 21वां चीफ ऑफ जनरल स्टाफ बनाया गया। इस पद पर वह जनवरी 2019 तक रहे। अपने सैन्य करियर के दौरान उन्होंने सुरक्षा और सैन्य रणनीति से जुड़े कई अहम फैसलों में भूमिका निभाई। सेना से रिटायर होने के बाद आइजेनकोट कुछ समय तक थिंक टैंक और अन्य संस्थानों से जुड़े रहे। बाद में उन्होंने राजनीति में कदम रखा। उनका सैन्य अनुभव आगे चलकर उनकी राजनीतिक पहचान का अहम हिस्सा बना।

Israel News Explainer: 2006 की लेबनान जंग और ‘दाहिया डॉक्ट्रिन’ से क्यों जुड़ा नाम?

आइजेनकोट के सैन्य करियर का एक महत्वपूर्ण अध्याय 2006 की इजराइल-लेबनान जंग से जुड़ा है। उस समय वह इजराइली सेना के ऑपरेशंस डायरेक्टरेट में वरिष्ठ पद पर थे। युद्ध के बाद उन्होंने नॉर्दर्न कमांड की जिम्मेदारी भी संभाली। जुलाई 2006 में हिजबुल्लाह के लड़ाकों ने सीमा पार कर इजराइल में हमला किया। इस घटना के बाद इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच संघर्ष तेज हो गया। इजराइल ने लेबनान में सैन्य कार्रवाई की, जिसमें बेरूत के पास स्थित दाहिया इलाके को भारी नुकसान पहुंचा। यह क्षेत्र हिजबुल्लाह का प्रमुख गढ़ माना जाता था। 2008 में आइजेनकोट के एक इंटरव्यू में दिए गए बयान को बाद में ‘दाहिया डॉक्ट्रिन’ के नाम से जाना जाने लगा। इस रणनीति को दुश्मन के उन इलाकों में व्यापक सैन्य ताकत के इस्तेमाल से जोड़ा गया, जहां से इजराइल पर हमले किए जाते हैं।

इस रणनीति की आलोचना भी हुई। मानवाधिकार संगठनों ने आबादी वाले इलाकों और नागरिक बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाने वाली सैन्य कार्रवाई पर सवाल उठाए। आलोचकों के मुताबिक, इस तरह की रणनीति में आम नागरिकों को नुकसान पहुंचने और सामूहिक सजा जैसे गंभीर मुद्दे पैदा होते हैं। उनकी मौजूदा राजनीतिक पहचान को केवल सैन्य रणनीति के आधार पर नहीं समझा जा सकता। उनकी राजनीति में सरकार की जवाबदेही, सुरक्षा व्यवस्था और युद्ध के बाद की योजना जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं।

नेतन्याहू से कैसे बने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी?

आइजेनकोट और नेतन्याहू का परिचय उनके सैन्य करियर के दौरान का है। फरवरी 2015 में जब आइजेनकोट को इजराइली सेना का प्रमुख बनाया गया, तब नेतन्याहू प्रधानमंत्री थे। सेना प्रमुख के तौर पर आइजेनकोट ने सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों में काम किया। हालांकि, समय के साथ दोनों के बीच राजनीतिक और नीतिगत मतभेद सामने आने लगे। 2017 में वेस्ट बैंक में एक यहूदी बस्ती को खाली कराने के मामले में नेतन्याहू और सेना के नेतृत्व के बीच मतभेद की खबरें सामने आई थीं। इस प्रकरण से जुड़ी रिपोर्टों के मुताबिक, आइजेनकोट ने सैन्य कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया के बीच सेना की संस्थागत जिम्मेदारी पर जोर दिया। 2022 में आइजेनकोट ने औपचारिक रूप से राजनीति में प्रवेश किया और बेनी गैंट्ज के नेतृत्व वाले नेशनल यूनिटी गठबंधन से जुड़े। उसी साल हुए चुनाव में वह इजराइली संसद नेसेट के सदस्य बने।

Israel News Explainer
                                                     Israel News Explainer

7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजराइल और हमास के बीच युद्ध शुरू हुआ। अक्टूबर 2023 में आइजेनकोट नेतन्याहू की वॉर कैबिनेट से जुड़े। लेकिन युद्ध की दिशा, बंधकों की रिहाई और आगे की रणनीति को लेकर मतभेद बढ़ते गए। जून 2024 में उन्होंने वॉर कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार के पास गाजा युद्ध के बाद की स्थिति को लेकर स्पष्ट योजना नहीं है और बंधकों की रिहाई जैसे मुद्दों पर पर्याप्त प्रगति नहीं हो रही है। उनके इस्तीफे ने नेतन्याहू सरकार से उनकी बढ़ती राजनीतिक दूरी को उजागर किया।

Israel News Explainer: गाजा युद्ध में बेटे और दो भतीजों को खोया

आइजेनकोट की जिंदगी का सबसे दर्दनाक अध्याय गाजा युद्ध से जुड़ा है। दिसंबर 2023 में उनके छोटे बेटे गाल मीर आइजेनकोट की उत्तरी गाजा में एक सैन्य अभियान के दौरान मौत हो गई थी। वह इजराइली सेना में तैनात थे और जबालिया इलाके में एक विस्फोट में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। बेटे की मौत की खबर ने आइजेनकोट के परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया। उनके अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। इस दौरान आइजेनकोट के भावुक होने की तस्वीरें भी सामने आई थीं। इसी युद्ध में उनके दो भतीजों की भी मौत हुई। इस तरह आइजेनकोट ने अपने बेटे और परिवार के दो अन्य सदस्यों को खो दिया।

इस निजी त्रासदी का असर उनके राजनीतिक संदेश में भी दिखाई दिया। उन्होंने युद्ध के फैसलों, सुरक्षा व्यवस्था और 7 अक्टूबर 2023 को हुई सुरक्षा संबंधी नाकामी की जांच की मांग उठाई। उनके मुताबिक, हमास के हमले से पहले और उसके दौरान हुई चूकों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। आइजेनकोट ने युद्ध में जान गंवाने वाले सैनिकों की कुर्बानी और देश की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर जवाबदेही पर जोर दिया है। हालांकि, किसी नेता का निजी नुकसान अपने आप में चुनावी जीत की गारंटी नहीं होता। मतदाता उसकी नीतियों, नेतृत्व और सरकार चलाने की क्षमता को भी परखते हैं।

Israel News Explainer
                                                          Israel News Explainer
‘याशर’ पार्टी बनाकर नेतन्याहू को चुनौती

नेतन्याहू की सरकार से अलग होने के बाद आइजेनकोट ने अपनी राजनीतिक पहचान बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया। सितंबर 2025 में उन्होंने ‘याशर’ नाम से अपनी पार्टी बनाई। हिब्रू भाषा में ‘याशर’ का अर्थ सीधा या ईमानदार होता है। पार्टी के नाम और राजनीतिक संदेश के जरिए आइजेनकोट ने खुद को जवाबदेही, साफ-सुथरी राजनीति और पेशेवर नेतृत्व की वकालत करने वाले नेता के रूप में पेश किया है। उन्होंने नेतन्याहू सरकार के कामकाज, युद्ध के बाद की योजना और सुरक्षा संबंधी फैसलों पर सवाल उठाए हैं।

आइजेनकोट ऐसे मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, जो सुरक्षा के मुद्दे पर मजबूत नेतृत्व चाहते हैं, लेकिन मौजूदा सरकार के कामकाज से असंतुष्ट हैं। उनका सैन्य अनुभव उन्हें सुरक्षा मामलों में विश्वसनीयता का दावा करने का आधार देता है। वहीं, बेटे और भतीजों को युद्ध में खोने का अनुभव भी उनकी राजनीतिक अपील का हिस्सा बना है। हालांकि, पार्टी को कितना समर्थन मिलता है और वह दूसरे दलों के साथ किस तरह का गठबंधन बना पाती है, यह उसकी राजनीतिक सफलता तय करने वाले महत्वपूर्ण पहलू होंगे।

Israel News Explainer: आइजेनकोट के चार बड़े वादे क्या हैं?

आइजेनकोट ने अपनी राजनीति में सुरक्षा व्यवस्था, सरकारी जवाबदेही और संस्थागत सुधारों को केंद्र में रखा है। उनके प्रमुख मुद्दे इस प्रकार हैं। पहला- 7 अक्टूबर की नाकामी की जांच: आइजेनकोट ने हमास के हमले से पहले और उसके दौरान हुई सुरक्षा संबंधी नाकामियों की जांच के लिए निष्पक्ष राज्य जांच आयोग बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि देश को यह जानना चाहिए कि सुरक्षा व्यवस्था कहां और क्यों विफल हुई। दूसरा- अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदियों को सैन्य सेवा में छूट का मुद्दा: इजराइल में धार्मिक समुदायों के कुछ वर्गों को अनिवार्य सैन्य सेवा से मिलने वाली छूट लंबे समय से विवाद का विषय है। आइजेनकोट इस छूट को खत्म करने के पक्ष में हैं। यह मुद्दा सेना में समान जिम्मेदारी और सैनिकों पर पड़ने वाले बोझ से भी जुड़ा है।

तीसरा- प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा: आइजेनकोट प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा तय करने और लिखित संविधान तैयार करने जैसे संस्थागत सुधारों का समर्थन करते हैं। इन प्रस्तावों का उद्देश्य सत्ता और शासन व्यवस्था को लेकर स्पष्ट नियम तय करना है। चौथा- नीतियों पर आधारित सरकार: उनका कहना है कि सरकार का संचालन राजनीतिक जोड़-तोड़ के बजाय पेशेवर समझ और स्पष्ट नीतियों के आधार पर होना चाहिए। इन मुद्दों का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है, क्योंकि इजराइल में सुरक्षा, सैन्य सेवा, न्यायिक व्यवस्था और प्रधानमंत्री की जवाबदेही लंबे समय से बहस के बड़े विषय रहे हैं।

 क्या गादी आइजेनकोट नेतन्याहू को हरा सकते हैं?

इजराइल के चुनावी मुकाबले में आइजेनकोट की याशर पार्टी को लेकर चर्चा तेज रही है। अक्टूबर 2026 में सामने आए कुछ ओपिनियन पोल में याशर को नेतन्याहू की लिकुड पार्टी से आगे या उसके आसपास दिखाया गया। कुछ सर्वेक्षणों में याशर को नेसेट की 120 सीटों में से लगभग 22 से 23 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया। हालांकि, ओपिनियन पोल को चुनाव परिणाम नहीं माना जा सकता। ये सर्वेक्षण एक खास समय पर मतदाताओं की पसंद का अनुमान देते हैं। चुनाव से पहले राजनीतिक घटनाक्रम, मतदाताओं का रुख और छोटी पार्टियों का प्रदर्शन अंतिम तस्वीर बदल सकता है।

इजराइल की राजनीतिक व्यवस्था में प्रधानमंत्री का चुनाव सीधे किसी एक उम्मीदवार को वोट देकर नहीं होता। मतदाता संसद यानी नेसेट के लिए पार्टियों को चुनते हैं। नेसेट में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए सामान्य तौर पर कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। इसलिए किसी पार्टी का सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरना और उसके नेता का प्रधानमंत्री बनना दो अलग बातें हैं। अगर आइजेनकोट की याशर पार्टी सबसे ज्यादा सीटें जीत भी लेती है, तब भी उसे सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों का समर्थन जुटाना होगा। सरकार बनाने की प्रक्रिया में राष्ट्रपति उस सांसद को मौका देते हैं, जिसके पास गठबंधन बनाकर बहुमत जुटाने की सबसे मजबूत संभावना मानी जाती है। ऐसे में चुनाव के बाद होने वाली बातचीत और छोटे दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है।

गठबंधन की राजनीति में कहां फंस सकती है आइजेनकोट की राह?

इजराइल में चुनाव के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया अक्सर जटिल हो जाती है। अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियां अपने राजनीतिक हितों और नीतिगत शर्तों के आधार पर गठबंधन बनाती हैं। आइजेनकोट के सामने चुनौती केवल लिकुड से अधिक सीटें हासिल करने की नहीं, बल्कि बहुमत के लिए जरूरी समर्थन जुटाने की भी है। उन्हें उन दलों के साथ समझौते करने पड़ सकते हैं, जिनके विचार सुरक्षा, धार्मिक नीतियों, फिलिस्तीन और सरकारी सुधारों जैसे मुद्दों पर अलग हैं।

अरब पार्टियों के समर्थन का सवाल भी गठबंधन की गणित को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, किसी संभावित गठबंधन का बनना उसके सदस्यों के बीच नीतिगत सहमति और राजनीतिक फैसलों पर निर्भर करेगा। दूसरी तरफ नेतन्याहू और उनकी लिकुड पार्टी भी अपने सहयोगी दलों के साथ सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं। इसलिए केवल सीटों का अनुमान यह तय नहीं करता कि अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा।

ये भी पढ़े… आखिर होटल लीज के विवाद में ऐसा क्या हुआ कि 5 लोगों की चली गई जान? जानें गुवाहाटी गोलीकांड की पूरी कहानी